गुरुवार, 24 मई 2012

कांग्रेस की गुटबाजी और राहुल का पाठ

अभी हाल ही में कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी, जब राजधानी रायपुर आए तो छग के कांग्रेसियों में उत्साह भरने की उन्होंने भरसक कोशिश की और वरिष्ठ नेताओं को राहुल, पाठ भी पढ़ा गए कि गुटबाजी से कुछ नहीं होगा। बस, आने वाले कई बरसों तक कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकेगी ? कांग्रेस के नेता अधिकतर आलापते रहते हैं कि कांग्रेस में गुटबाजी नहीं है, मगर समय-समय पर यह खुलकर सामने आती रहती है। कभी नेताओं के बयानों से तो कभी कार्यक्रमों में एक-दूसरे से कन्नी काटते हुए। खैर, युवा बिग्रेड में राहुल गांधी के छत्तीसगढ़ आने से उत्साह भर आया है। इसका कारण भी है, उन्होंने वरिष्ठ नेताओं को जिस तरह सीधे तथा तीखे शब्दों के साथ ‘संभल’ जाने की बातें कही और युवाओं को आगे आने की बात कहीं, इसके बाद तो कई कांग्रेस के युवा नेताओं ने हुंकार भरना भी शुरू कर दिया है।
छत्तीसगढ़ की सत्ता में कांग्रेस की लुटिया डूबने का बस एक ही कारण नजर आता है, वह है बड़े नेताओं की आपसी गुटबाजी। जितने बड़े नेता, उतने फाड़। जब छग का निर्माण हुआ, उस दौरान पूरी बहुमत के साथ कांग्रेस ने सरकार बनाई, उसके बाद तो जैसे कांग्रेस को गुटबाजी का दीमक ही चट कर गया। कांग्रेस के नेता गुटबाजी की बातों को हमेशा नकारते हैं, मगर राहुल गांधी ने किसी की परवाह किए बगैर ‘चेता’ ही दिया कि अब सुधर जाओ, नहीं तो सत्ता की चाबी नहीं मिलेगी। राहुल गांधी ने इस बात पर भी जोर दिया कि कार्यकर्ता चुनाव जिताते हैं और जब सत्ता हाथ नहीं आती, उसके बाद सबसे ज्यादा निराशा कार्यकर्ताओं को ही होती है।
छग के निर्माण के बाद बीते 11 बरसों में केवल ढाई बरस ही कांग्रेस सत्ता में रही, वह भी बंटवारे के हिस्से के सहारे। छग में पहली बार चुनाव हुआ, उसके बाद कांग्रेस की जमीं खिसक गई। इसमें भी कभी कांग्रेस में रहे नेताओं ने ही ‘कांग्रेस’ की दुर्गति की और सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। कांग्रेस चाहती तो गुटबाजी और आपसी खींचतान को भूलकर सत्ता में वापसी कर सकती थी, मगर कांग्रेस की कलह से भाजपा को सत्ता मिल गई। हालात यह रहे कि भाजपा ने उस सत्ता सुख को जमकर भुनाया और इसमें सबसे बड़ा योगदान दिया, कांग्रेसियों ने। एक-दूसरे से लड़कर कांग्रेसियों ने भाजपा की राह आसान कर दिया।
यह बात भी छिपी नहीं है कि छग विधानसभा के बीते दो सत्रों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस कभी विपक्ष की भूमिका में नजर आई ही नहीं। राज्य की भाजपा सरकार को घेरने में कांग्रेस फिसड्डी ही साबित होती रही। हाल के सत्रों में जो मुद्दे कांग्रेस के हाथ लगे, उनमें से भी अधिकतर कांग्रेस के हाथों में ऐसे ही आ गए। इतना जरूर है कि उसे भुनाने की भरसक कोशिश की गई और सरकार को घेरने में कामयाब भी रही, मगर इतना जरूर है कि कांग्रेस को जिस सशक्त विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए थी, वह नहीं निभा सकी है। यहां भी कांग्रेस की गुटबाजी और आपसी कलह ही उनके दुश्मन साबित हुई। चुनावों में विपक्षी दल के प्रतिद्वंदी भले ही होते हैं, मगर कांग्रेस को पीछे ढकलने के उनके अपने ही काफी होते हैं। यह बात भी उनकी आपसी खींचतान से जगजाहिर होती रहती है।
छग में जब विधानसभा चुनाव 2003 में हुए, उस दौरान कांग्रेस सत्ता में थी, मगर कुर्सी एवं वर्चस्व की लड़ाई के चलते कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्या चरण शुक्ल ने एनसीपी में शामिल होकर चुनावी रणभेरी में कांग्रेसियों को पसीने से तर-बतर कर दिया और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई, क्योंकि जितनी सीटों की कांग्रेस को जरूरत थी, उतनी सीटें तो एनसीपी ने कांग्रेस प्रत्याशियों को हराने में अहम भूमिका अदा की। इनमें से अधिकतर वे नेता थे, जो कांग्रेस का दामन छोड़कर, एनसीपी के हो लिए थे। 90 सीटों में एनसीपी, बड़े जोर-शोर से चुनाव लड़ी और अधिकतर जगहों पर एनसीपी की टिकट पर कांग्रेस के ही बागी नेताओं ने चुनाव लड़े। इसमें महज एनसीपी के खाते में चंद्रपुर विधानसभा सीट ही आई, वह भी एनसीपी के दम पर नहीं, बल्कि प्रत्याशी के व्यक्तिगत दमखम पर। स्थिति यह रही कि कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई और उसके बाद जो पतन का काल चल रहा है, उस पर घी डालने का काम, कहीं न कहीं कांग्रेस के नेता ही कर रहे हैं। इस बात को स्वीकार करते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को सबक दिया है, उससे उन्हें सीखने की जरूरत है, तभी तो वे सत्ता सुख के भागी बन सकते हैं, नहीं तो सत्ता की ओर निहारते रहेंगे और सत्ता, पिछली दो बार की ही तरह खिसकती रहेगी।
राहुल गांधी ने यही बात कही है कि कांग्रेस खुद से हारती है। यह बात भी हमेशा चर्चा में रहती है कि कई तथाकथित कांग्रेसी, जितनी मेहनत अपने ही दल के प्रत्याशी को हराने में करते हैं या फिर कांग्रेसी, एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर गुटबाजी को हवा देने में ऊर्जा लगाते हैं, उसी तरह एकजुटता का पाठ पढ़ लें तो कांग्रेस का भला हो जाएगा। ऐसी ही कुछ बात राहुल गांधी ने कहकर नेताओं को समय रहते ‘चेत’ जाने की बात कही है।
मजेदार बात यही है कि कांग्रेस ने सत्ता का स्वाद, भाजपा को चखा दिया है और वे जान भी गए हैं कि कैसे प्रदेश की जनता को साधना है। भाजपा की सरकार बनने के बाद ऐसा नहीं है कि भाजपा में कलह सामने नहीं आई है, मगर कांग्रेसियों को जिस तरह की टांग खींचने की परिणति के चलते सत्ता से दूर होकर भुगतनी पड़ रही है, उस तरीके के हालात फिलहाल भाजपा में नहीं है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कांग्रेस के हाथों-हाथ दिए मौके को भुनाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है। उन्हें विश्वास भी है कि भाजपा की हेट्रिक बनेगी और मिशन 2013, एक बार फिर भाजपा फतह करेगी।
जो भी हो, छग में हुए पिछले दो विधानसभा चुनावों की अपेक्षा इस बार का चुनाव काफी दिलचस्प होगा, क्योंकि कांग्रेसियों को भी अब समझ में आ गया है कि सत्ता से दूरी की क्या कीमत चुकानी पड़ती है। लिहाजा सत्ता की आश में, न चाहते हुए भी कांग्रेस के नेताओं को एक मंच पर खड़ा होना होगा, जैसा कि राहुल गांधी ने पाठ पढ़ाया है।

रविवार, 29 जनवरी 2012

नकल, एक और कालिख ?

निश्चित ही छत्तीसगढ़ विकास की दिशा में अग्रसर हो रहा है, लेकिन कई रोड़े भी नजर आ रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में अनेक बदलाव के कारण यहां की प्रतिभाएं निखर कर सामने आ रही हैं। फिर भी शिक्षा नीति में कई बदलाव की जरूरत है। इसमें सबसे बड़ी जरूरत है, छग को नकल के कलंक से मुक्त करना। ऐसा लगता है, जैसे छत्तीसगढ़ का नकल से चोली-दामन का साथ हो गया है, तभी तो एक मामले को भूले भी नहीं रहते, नकल के दूसरे मामले आंखों के सामने आ जाते हैं। ऐसी स्थिति में नकल की प्रवृत्ति को खत्म करने सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए, तभी प्रदेश की प्रतिभाओं का भला होगा। नहीं तो, प्रतिभाओं के हिस्से को ‘मुन्नाभाई’ आकर चट करते रहेंगे और इससे कहीं न कहीं छग को ही नुकसान होगा। जाहिर सी बात है, ऐसे हालात में प्रतिभा पलायन भी होगा।
दरअसल, नकल का मामला एक बार फिर इसलिए गरमा गया है, क्योंकि पीडब्ल्यूडी सब इंजीनियर के लिए ली जाने वाली भर्ती परीक्षा में भी नकल के प्रकरण बने हैं और कई नकलची पकड़े गए हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कही गई है, मगर इतने भर से काम चलने वाला नहीं है, क्योंकि नकलचियों पर सख्ती नहीं बरतने का ही परिणाम है कि प्रतिभाओं का दम तोड़ने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। नकल को कहीं न कहीं हम नौकरी पाने तथा किसी परीक्षा में सफल होने के लिए ‘चोर दरवाजा’ ही मान सकते हैं। नकल के कारण प्रदेश की प्रतिभाएं ज्यादा बदनाम होती हैं, क्योंकि जब वे बाहर शिक्षा के लिए जाती हैं तो उन्हें हमेशा कमतर आंका जाता है, जिसका खामियाजा उन्हें अपने कॅरियर निर्माण में भी भुगतना पड़ता है। समय-समय पर सरकार तथा शासन में बैठे लोग भी स्वीकारते हैं, लेकिन नकल पर रोक लगाने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए जाते। लिहाजा, यह कृत्य रह-रहकर पुरानी बोतल से बाहर आते रहते हैं। नकल की दुष्प्रवृत्ति के घातक परिणाम से शिक्षाविद् आगाह भी करते हैं, लेकिन जिस तरह के हालात बनते जा रहे हैं, उससे तो लगता है कि नकल की प्रवृत्ति, एक तबके के खून में समा गई है, क्योंकि उन्हें अपनी वैतरणी पार लगाने के लिए कोई दूसरा सहारा नजर नहीं आता। कहीं न कहीं, पीडब्ल्यूडी की परीक्षा में नकल का मामला सामने आने से प्रदेश की परीक्षा तथा शिक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर कालिख पूत गई है।
ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नकल के मामले पहली बार सामने आए हैं। कुछ बरसों की स्थिति को देखें तो प्रदेश में नकल की प्रवृत्ति ने व्यापक पैमाने पर पैर पसार लिया है। यही राज्य है, जहां बारहवीं व दसवी की बोर्ड परीक्षा की मेरिट सूची में गड़बड़ हो गई। इस प्रकरण से शिक्षा प्रणाणी तथा परीक्षा में बरती गई लापरवाही को लेकर प्रदेश का काफी छिछालेदर हुआ था। उससे पहले पीएससी की परीक्षा भी विवादों में रही है। इन मामलों के मध्य पर नजर डालें तो यही राज्य है, जहां पिछले साल प्री-पीएमटी की परीक्षा तीन बार आयोजित हुई। पीएमटी परीक्षा में फर्जीवाड़े ने सरकार को हिलाकर रख दिया, क्योंकि बिलासपुर जिले के तखतपरु में फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद कई नामचीन लोगों के नाम आए, जिन्होंने अपने बेटे-बेटियों को परीक्षा पास कराने लाखों रूपये दिए थे। फिलहाल इस मामले में पुलिस जांच कर रही है, कुछ परीक्षार्थी पुलिस के हत्थे चढ़ गए हैं तो कुछ अपने रसूख तथा भूमिगत होने के कारण बचे हुए हैं। कई को कोर्ट से जमानत भी मिल गई है।
कुल-मिलाकर कहना यही है कि प्रदेश की शिक्षा की नींव, नकल के कारण कमजोर हो रही है। इसे मजबूत बनाने के लिए नकल माफिया से प्रदेश को बचाना होगा। शिक्षा के क्षेत्र में सतत् विकास हो रहा है, मगर जिस तरह नकल के सहारे तथा शॉर्टकट आजमाने की करतूत बढ़ती जा रही है। इसे विकास पथ पर अग्रसर प्रदेश के लिए बेहतर नहीं कहा जा सकता है। नकल पर लगाम लगाने के लिए सरकार को ध्यान देना होगा। प्रदेश के कई जिले हैं, जहां के प्रतिभावान छात्र इसलिए भी शंका की नजर से देखे जाते हैं कि वे उस जिले से ताल्लुक रखते हैं, जहां नकल की शिकायतें हैं। यहीं पर प्रतिभाओं का मनोबल टूटता है। ऐसी स्थिति में कहीं न कहीं सरकार और उनकी नीति जिम्मेदार मानी जा सकती है, क्योंकि देश, प्रदेश तथा समाज के हित में रोड़ा बन रही ‘नकल’ पर सरकार कहां रोक लगा पा रही है ? यदि ऐसा नहीं होता तो रह-रहकर नकल के मामले उजागर नहीं होते। सरकार की ढिलाई का ही नतीजा है कि ऐसे कृत्यों को बल मिल रहा है। आशा है कि सरकार, इस दिशा में सख्त निर्णय लेगी और प्रदेश की प्रतिभाओं को आगे लाने प्रयास करेगी, क्योंकि विकास के लिए शिक्षा की अहम भूमिका है, किन्तु ‘नकल’ बड़ा रोड़ा बनती जा रही है।

रविवार, 4 दिसंबर 2011

महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकार

केन्द्र में सत्ता पर बैठी कांग्रेसनीत यूपीए सरकार चाहे जितनी अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन महंगाई व भ्रष्टाचार के कारण सरकार जनता की अदालत में पूरी तरह कटघरे में खड़ी है। ठीक है, अभी लोकसभा चुनाव को ढाई से तीन साल शेष है, किन्तु सरकार को जनता विरोधी कार्य करने से बाज आना चाहिए। महंगाई ने तो पहले ही लोगों की कमर तोड़कर रख दी थी। फिर भी सरकार का रवैया नकारात्मक ही रहा और महंगाई की मार कम हो ही नहीं रही है। सरकार में बैठे सत्ता के मद में चूर कारिंदों के ऐसे बयान आते रहे, जिससे महंगाई नई उंचाईयां छूती रही।
कृषिमंत्री शरद पवार के बयान ही हमेशा ऐसे रहे, जिससे जमाखोरों को लाभ मिले। जरूरी चीजों की बाजार में कमी होने की बात का खुलासा होने के बाद कालाबाजारी शुरू हो जाती। बाजार में सामग्री की अनुपब्धता के कारण दर में बढ़ोतरी हो जाती। इसका सीधा फायदे उन जमाखोरों को मिलता था, जिनके हित में मंत्री जी बयान देते नजर आते थे। महंगाई के कारण सरकार के प्रति लोगों में गुस्सा है और समय-समय पर वे अपना आक्रोश जताते भी हैं। हालांकि जनता को यह भी पता है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत वोट की है, जिसके दम पर आम जन विरोधी सरकार को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। देश में महंगाई चरम पर है, सड़क से संसद तक लड़ाई हो रही है, मगर सरकार पर कोई फर्क पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। सरकार में बैठे लोग महंगाई का कारण कभी ग्लोबलाइजेन को बताते हैं तो कभी चीजों के बेतहाशा उपयोग को। महंगाई से निपटने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ने की बात कहने से सरकार बाज नहीं आती, फिर भी हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी असहाय हो गए हैं।
बढ़ती महंगाई को लेकर सरकार के प्रति कितना गुस्सा है, वह पिछले दिनों देखने को मिला, जब एक व्यक्ति ने कृषि मंत्री शरद पवार को थप्पड़ जड़ दिया। सत्तासीन लोगों ने इसे एक सनकी युवक का किया-धरा करार दिया, लेकिन उन्हें इतना स्वीकारना चाहिए कि कहीं न कहीं महंगाई के कारण आम जनता के दिलों में आग तो लगी ही है ? उसी का परिणाम है कि कुछ लोग इस हद तक विरोध करने उतारू हो जा रहे हैं। लोकतंत्र में निश्चित ही यह तरीका गलत है, लेकिन सरकार, जनता के हितों पर किस तरह कुठाराघात कर रही है, इस बारे में भी सोचने की जरूरत है। सरकार तो किसी की सुनने को तैयार नहीं है, विपक्ष जो कहना चाहे, कह ले, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। यही कारण है कि पिछली बार की तरह इस बार भी संसद की कार्रवाई, मनमानी की भेंट चढ़ रही है। सरकार की मनमौजी प्रवृत्ति भी इसके लिए जिम्मेदार है। संसद के एक दिन की कार्रवाई में करोड़ों खर्च किए जाते हैं, यह जनता का पैसा है। इसलिए सरकार को कोई न कोई रास्ता निकालना चाहिए, जिससे संसद भी चले और आम जनता के हितें भी प्रभावित न हो। संसद में अभी जो चल रहा है, उससे आम जनता का ही बिगड़ेगा, क्योंकि संसद चले, चाहे मत चले, सांसदों को क्या लेना-देना, उन्हें जो तय रकम दी जानी चाहिए, वह तो उन्हें मिलनी ही है। जनता द्वारा टैक्स के रूप में दिया गया पैसा ही बर्बाद होगा।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा, भ्रष्टाचार का है। यूपीए-2 का कार्यकाल भ्रष्टाचार के लिए ही पहचाना जाएगा और विपक्ष यह आरोप भी लगाते आ रहे हैं कि आजाद भारत की यह सबसे भ्रष्ट सरकार है ? बीते डेढ़-दो साल में एक-एक कर भ्रष्टाचार का जिन्न ऐसे निकला, जैसे बरसों से एक पुरानी बोतल में कैद हो। सरकार में शामिल कई मंत्री, सांसद तथा विपक्ष के अन्य नेताओं को भ्रष्टाचार के कारण जेल की हवा खानी पड़ी है। लिहाजा यूपीए-2 सरकार की किरकिरी हुई है, क्योंकि कॉमनवेल्थ, टूजी-स्पेक्ट्रम, इसरो समेत अन्य कई घोटालें सामने आए हैं, जिससे दूसरी बात लगातार सत्ता में आई सरकार की छवि धूमिल हुई है। भ्रष्टाचार के मामले में सरकार द्वारा पहले कार्रवाई करने आनाकानी की गई, लेकिन विपक्ष के बढ़ते दबाव के कारण कार्रवाई हुई। ये अलग बात है कि कार्रवाई करने को लेकर सरकार, बाद में अपनी पीठ खुद ही थपथपाती नजर आई।
केन्द्र की यूपीए सरकार, महंगाई तथा भ्रष्टाचार के मामले से उबर नहीं पाई थी। इसके बाद सरकार को क्या सुझी कि एफडीआई ( खुदरा व्यापार ) के लिए विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए खुली छूट देने की नीति बना दी गई। सरकार ने देश में बिना जनमत तैयार किए ही कैबिनेट में निर्णय ले लिया। इसके बाद एफडीआई के कारण देश में जो आग लगी है, उसके बाद सरकार संभल नहीं पा रही है। कहा, यहां तक जा रहा है कि सरकार, विरोध के कारण इस निर्णय को वापस ले सकती है ? आलम यह है कि कांग्रेस से जुड़े लोग ही खिलाफ में उतर गए हैं। उनके अपने ही उनकी नीति पर उंगली उठाए, ऐसे में सरकार किस तरह और कैसे काम कर रही है, यह तो समझ में आता ही है। सरकार कहती है कि एफडीआई से देश में विकास को बल मिलेगा, नई तकनीक का लाभ मिलेगा। साथ ही कम दर पर सामग्री मिलेगी, मगर सवाल यही है कि जब ये विदेशी कंपनी लाभ कमाएंगी तो फिर देश में छोटी-छोटी दुकान के सहारे अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले लोग, आखिर जाएंगे तो जाएंगे कहां ? वैसे ही देश में बेकारी व गरीबी छाई है। सरकार ने गरीबी की एक नई लकीर खींच दी है। जितनी राशि के आंकड़े बताकर गरीबी की परिभाषा दी गई है, उस पर वही नीति-नियंता, जिंदगी बिता कर बता दे ?
कुछ भी हो, यूपीए-2 के कार्यकाल में कुछ भी अच्छा नहीं हुआ है, पूरे तीन दो बरसों से यह सरकार विवादों में है। महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। भ्रष्टाचार की सुरंगे खत्म ही नहीं हो रही है। फिर भी सरकार का रवैया, जनोन्मुखी नहीं दिखती। भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले राहुल गांधी को किसानों की हालत देखकर गुस्सा आता है, लेकिन देश में छाई गरीबी, महंगाई तथा भ्रष्टाचार के प्रतिरूप दानवों को देखकर उन्हें गुस्सा क्यों नहीं आता ? देश में बरसों तक कांग्रेस सत्ता में रही है और जैसा चाहती, वैसा करती रही। कोई विपक्ष उंगली करने के लिए भी नहीं था। फिर भी गरीब वहीं के वहीं रहे और आज भी हैं। ऐसे में किसान व गरीबों की दुहाई, महज राजनीति व लफ्फाजी ही नजर आती है, क्योंकि सरकार को आम जनता की इतनी ही फिक्र होती तो बार-बार आवश्वक वस्तुओं के दाम नहीं बढ़ाती। पेट्रोल-डीजल की दर जब मन कर रही है, बढ़ा दे रही है। इससे परिवहन पर असर पड़ रहा है और उसका महंगाई पर। सरकार अपने माथे पर महंगाई की तोहमत रखना नहीं चाहती, इसलिए हर बार किसी न किसी के सिर पर महंगाई का ठिकरा फोड़ देती है और खुद को बेचारी बताने से नहीं चुकती। अब क्यों इस सरकार की, ये जनता ही बताएगी, आने वाले चुनाव में।

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

क्या होगा लापता 40 छत्तीसगढ़ियों का ?

छत्तीसगढ़ के 11 बरस होने पर राज्य सरकार जहां प्रदेश के सभी जिलों में राज्योत्सव जैसे आयोजन कर खुशियां मनाने में जुटी हैं, वहीं एक तबका ऐसा भी है, जो अपने सीने में अपनों की मौत का दर्द लिए बैठा है। समय गुजरने के बाद भी उनकी टीस कम होने का नाम नहीं ले रही है। राज्य सरकार की बेरूखी ने उनकी तकलीफों को और बढ़ा दी है।
साल भर पहले 5 अगस्त 2010 को जम्मू के ‘लेह’ में बादल फटने से जिले के दर्जनों गांवों से रोजी-रोटी की तलाश में गए मजदूरों की बड़ी संख्या में मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए, जिसका दर्द प्रभावितों को अब भी सालता है। उधर जैसे ही घटना की जानकारी जिला प्रशासन को जानकारी मिली, उसके बाद यहां से टीम भेजी गई। वहां से करीब हफ्ते भर बाद अधिकारी लौटे। लेह प्रशासन द्वारा 18 लोगों की मौत पुष्टि की गई। बाद में दो अन्य लोगों की पहचान होने के बाद उनका नाम भी सूची में दर्ज किया गया। इन 20 लोगों में 18 जांजगीर-चांपा जिले के थे और 2 रायपुर जिले के गिरौदपुरी के रहवासी थे। इसके अलावा 40 लोगों को लापता बताया गया। इनमें बच्चों की संख्या अधिक रही। इन लापता लोगों में सबसे अधिक बनारी के हैं। प्रशासन द्वारा यहां 13 लोगों को लापता बताया गया है, जबकि ग्राम महंत में इनकी संख्या 08 है। इसी तरह बोड़सरा के 04, नवागढ़ के 03, खैरा के 02, सलखन के 0, तनौद के 01 तथा गिरौदपुरी ( रायचुर ) के 02 लोग लापता हैं।
लेह में हुई हृदयविदारक घटना को हुए दो बरस से अधिक समय हो गया है, लेकिन इनकी न तो राज्य सरकार कोई खोज-खबर ले रही है और न ही जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा कोई जानकारी दी जा रही है। ऐसी स्थिति में जो लोग अपनों से बिछुड़ने का दर्द झेल रहे हैं, उन्हें मुआवजा तक नहीं मिल पा रहा है।
पिछले साल प्रभावितों लोगों के परिजनों ने कलेक्टर ब्रजेश चंद्र मिश्र से मिलकर लापता लोगों की पतासाजी की गुहार लगाई थी। इस दौरान उन्होंने राज्य सरकार को अवगत कराने की बात कही थी। इधर समय बीतने के साथ ही लेह में हुए हादसे का मामला थम गया। इस मसले पर न तो जिला प्रशासन के अधिकारियों ने दोबारा मुड़कर सुध ली और न ही राज्य सरकार की ओर से पहल होती दिखी। यही कारण है कि पिछले साल बादल फटने के बाद लापता हुए लोगों के बारे कोई निर्णय नहीं हो सका।
जिला प्रशासन के अधिकारी कहते हैं कि जब तक जम्मू-कश्मीर की सरकार, मृतकों के नाम नहीं देंगे, तब तक मुआवजा की राशि स्वीकृत नहीं हो पाएगी। दूसरी ओर अधिकारी बताते हैं कि लेह प्रशासन द्वारा शव मिलने के बाद ही मृतकों के नाम भेजने की बात कही जा रही है।
रोजी-रोटी की तलाश में गए मजदूरों को अहसास भी नहीं था कि वहां किसी की मां, किसी का भाई, किसी की पत्नी, किसी की बहन बिछड़ जाएगी। जिंदगी की लड़ाई में कई ने बाजी मार ली और वे वहां से आने के बाद यह कहते नहीं थके कि किसी भी सूरत में पलायन नहीं करेंगे। साथ ही कुछ लोगों को यह भी पता नहीं था कि वे हमेशा के लिए दफन हो जाएंगे।
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिले से हर बरस सैकड़ों की संख्या में लेह मजदूरी के लिए जाते थे। वहां कुछ महीने बिताने के बाद वापस लौटते थे। कुछ लोग बीते 15-20 सालों से लेह जा रहे हैं। उनका कहना रहता है कि गांवों में कम मजदूरी मिलती है और हर दिन काम भी नहीं मिलता, जबकि वहां काम की कोई कमी नहीं रहती। साथ ही छुट्टी के दिन भी मजदूरी मिलती है। यही लुभावनी बातें हैं, जो हर साल गरीबी की मार झेल रहे लोग लेह खींचे चले जाते थे। हालांकि उन्हें क्या पता था कि कभी उनका कोई अपना यहां खो जाएगा।
जब लेह से मजदूर लौटे तो उनकी आंखों में शरीर के जख्मों का दर्द था ही, मगर अपनों से दूर होने का दर्द उन्हें ज्यादा कसक रही थी। वह दर्द आज भी उनकी आंखों में कायम है। सरकार की गैरजिम्मेदाराना रवैया के कारण लेह में प्रभावित हुए कई परिवार के लोगों की परेशानी बढ़ गई है। परिवार के सदस्यों के खो जाने के बाद मुआवजे की आस थी, वह भी छिन गई है। जिसके चलते लोगों के आर्थिक हालात बिगड़ गए हैं। हादसे में जो जख्म मिले थे, उसका भी इलाज कराने में अक्षम साबित हो रहे हैं और गरीबी की चौतरफा मार झेलने के लिए मजबूर हैं। सरकार इस दिशा में पहल करती तो शायद इन मजदूरों की माली हालत में सुधार हो जाती है, लेकिन वह भी अकर्मण्य बनी हुई है।

तबाह हुए परिवार के परिवार
लेह के हादसे के बाद कई परिवार तबाह हो गए। कई घरों के चिराग बुझ गए। कुछ घरों में इक्के-दुक्के ही सदस्य बच पाए। चर्चा में ग्राम बनारी की गुरबारी बाई ने बताया कि लेह हादसे ने उनकी सब कुछ छिन लिया। पति, बहु तथा नातीन का अब तक पता नहीं है। साल भर बाद सरकार द्वारा इस दिशा में कोई निर्णय नहीं लिया गया है, जिससे उन्हें मुआवजा भी नहीं मिल पा रहा है। हादसे में जख्मी होने के बाद वह खुद काम नहीं कर पाती। लिहाजा परिवार के समक्ष आर्थिक संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। इसी तरह बनारी के ही पंचूराम का परिवार है, जिसने अपनी पत्नी के अलावा एक लड़के को खो दिया। उन्हें भी कोई मुआवजा नहीं मिला है। ऐसी स्थिति के चलते वे दिनों-दिन गरीबी की दलदल में चले जा रहे हैं।

कोई तो सुन ले...
लेह के हादसे में वैसे सैकड़ों लोग प्रभावित हुए और 50 से अधिक लोगों को चोटें आई थीं। कुछ लोगों का इलाज हुआ। उसके बाद केवल 32 लोगों को ही उपचरार्थ सहायता राशि साढ़े सात हजार रूपये दी गई। इसके बाद जिला प्रशासन ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि अन्य लोग, जो लोग घायल हुए थे, उन्हें मुआवजा देने क्या किया जाए ? प्रभावित लोग बताते हैं कि लोगों की सूची बनाने में अधिकारियों द्वारा लापरवाही बरती गई, जिसके चलते कई लोग सहायता राशि पाने से अछूते रहे। सोचनीय पहलू यह है कि जिन लोगों को सहायता राशि दी गई है, वह भी नाकाफी है, क्योंकि लेह में जो जख्म मिले हैं, उसका इलाज इतनी राशि से असंभव है। ऐसी स्थिति में उन्हें कई परेशानियां हो रही हैं। लेह हादसे में घायल राजेन्द्र की थोड़े से काम करने पर सांसे फूलने लगती है, वहीं और भी कई लोग हैं, जिनके हाथ-पैर नहीं चलते। जैसे-तैसे वे अपनी जिंदगी लड़ाई लड़ने मजबूर हैं। एक अन्य प्रभावित व्यक्ति लालू यादव ने बताया कि उसे साढ़े सात हजार सहायता राशि तक नहीं मिली है, जबकि उनका अस्पताल में इलाज भी हुआ। इसलिए वे गुहार लगा रहे हैं कि कोई तो उनका सुन ले...।

इन्हें तो दे दो मुआवजा !
जिला प्रशासन व सरकार कहते हैं कि लेह प्रशासन ने जिनकी मौत की पुष्टि की है, उन्हें 1 लाख रूपये मुआवजा दिया जाएगा, मगर अहम बात यह है कि जिले के जिन 18-20 लोगों की मौत को जम्मू-कश्मीर सरकार ने माना है, उन्हें तक सरकार ने मुआवजा नहीं दिया है। केवल 8 लोगों को मुआवजा दिया गया है, जिसमें 4 महंत, 3 बनारी तथा 1 खैरा के हैं। ऐसे में सोचने वाली बात है कि अन्य लोगों को आखिर क्यों मुआवजा नहीं दिया जा रहा है ? मुआवजा जिन्हें दिया गया है, वहां एक बात और सामने आ रही है कि कुछ बिचौलिएनुमा लोगों ने 1 लाख रूपये में से 25-30 हजार रूपये हजम कर लिए। प्रभावितों को रूपये चेक से दिए गए हैं, मगर कुछ लोगों द्वारा मुआवजा दिलाने के एवज में उनसे राशि ऐंठ ली गई। फिलहाल यह जांच का विषय है और इस बारे में हर कोई कुछ भी कहने से बच रहा है।

जहां जन्म, वहीं दफन
बनारी निवासी राजेन्द्र की 16 साल की बेटी पिंकी का जन्म ‘लेह’ में हुआ था। लेह के हादसे में पिंकी की भी मौत हो गई। मृतकों की सूची में नाम होने के कारण पिंकी के पिता राजेन्द्र को 1 लाख रूपये मुआवजा मिला है, मगर उनके परिवार के अन्य दो सदस्य अब भी लापता हैं। जिनका उन्हें मुआवजा नहीं मिल सका है। वैसे मृतकों में अधिकतर बच्चे रहे, मजदूरों का कहना है कि देर रात जब बादल फटने की घटना हुई, उस दौरान बच्चे अपनी मां के साथ थे।

नहीं है पलायन की जानकारी
पिछले साल जब लेह में हादसा हुआ था, उसके बाद जिला प्रशासन जागा था और कलेक्टर ब्रजेश चंद्र मिश्र ने जिले की सभी पंचायतों को पलायन संबंधी जानकारी रखने के निर्देश दिए। साथ ही रजिस्टर में मजदूरों के नाम दर्ज करने कहा गया था। बाद में लेह में हुए हादसे की आग ठण्डी पड़ गई और वह आदेश भी ठंडे बस्ते में चला गया। जिले के अधिकारी-कर्मचारी तथा पंचायत प्रतिनिधियों ने ‘एक कान ढोल-एक कान पोल’ की तर्ज पर आदेश को दरकिनार कर दिया। हालात यह है कि पंचायतों में पलायन संबंधी कोई जानकारी नहीं है और न ही इस बारे में जिला पंचायत को भी कोई सूचना दी गई है। इस तरह जब घटना हो जाती है, उस दौरान प्रशासन के अधिकारी, प्यास लगने पर कुआं खोदने का काम करते हैं। लेह में हुए हादसे के बाद मजदूरों की संख्या जानने में काफी दिक्कतें आई थीं, फिर सबक नहीं सीखा गया है।

सोमवार, 26 सितंबर 2011

टेढ़ी नजर

1. समारू - इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में ब्रेकिंग की होड़ मची है।
पहारू - और जिंदा को, मुर्दा करार दे देते हैं।

2. समारू - प्रधानमंत्री जी के अमेरिका के बाद, अब ईरान जाने की खबर है।
पहारू - घर में आग लगी है और वे लौ बुझाने, जंगल की खाक छान रहे हैं।

3. समारू - प्रधानमंत्री अपने जन्म दिवस पर क्या कह सकते हैं।
पहारू - महंगाई का केक खाओ तथा भ्रष्टाचार का गुब्बारा फोड़ो।

4. समारू - प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मिलने प्रणव मुखर्जी पहुंचे।
पहारू - नाव में पानी भर गया है, कुछ काम बनने वाल नहीं है।

5. समारू - नवरात्रि में नेताओं का माथा टेकने का सिलसिला शुरू होगा।
पहारू - जनता रूपी भगवान के पास केवल पांच साल में एक बार ही माथा टेकने आते हैं।

रविवार, 25 सितंबर 2011

टेढ़ी नजर

1. समारू - एक सर्वे के अनुसार - छग में पीडब्ल्यू सबसे भ्रष्ट विभाग है।
पहारू - तभी तो एक सीरियल में एक पात्र कहता है - वे ऐसे-वैसे नहीं हैं, पीडब्ल्यूडी वाले हैं, पीडब्ल्यूडी...।

2. समारू - भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी दुर्ग में गरज कर गए।
पहारू - दिल्ली पहुंचते ही शांत तो हो जाते हैं...???

3. समारू - राजधानी रायपुर में उठाईगिरी बढ़ गई है।
पहारू - पुलिस उठकर जागे, तब रूके ना।

4. समारू - देश के अनेक मंत्री इन दिनों अमेरिका में हैं।
पहारू - मंत्री बनने के बाद ‘विदेशी जुगाली’ जिंदगी का हिस्सा बन जाती है।

5. समारू - उड़ीसा में एक विधायक की रैली के दौरान हत्या की खबर है।
पहारू - अब, आम जनता कैसे न सहमें...।

उसने मासूम बच्ची को जिंदा नदी में फेंक दिया

जांजगीर-चांपा जिले में जो मामला आया है, उसे सुनकर किसी का भी दिल दहल सकता है। किसी व्यक्ति की हैवानियत की फितरत कितनी बेदर्दी है, इसे यह घटना कहती है। अकलतरा क्षेत्र के गोपालनगर की लाफार्ज कालोनी निवासी रेलवे कर्मचारी प्रेमूराम ठाकुर की 5 साल की मासूम बच्ची मिताली ठाकुर को एक सिरफिरे युवक ने दर्रीघाट ( बिलासपुर ) के पास अरपा नदी में फेंक दिया। इस ह्दयविदारक घटना के बारे में जिसे भी पता चला, उसे निश्चय ही गहरा सदमा लगा। दूसरी ओर मिताली को नदी की तेज धार में फेंके जाने के हादसे के बाद उसके परिवार के लोगों के आंसू थमने के नाम नहीं ले रहा है। पूरी लाफार्ज कालोनी में मातम पसरा है, वहीं हर दिन उसकी खोजबीन की जा रही है, मगर अब तक उसका कोई सुराग नहीं लगा है। जब मासूम बच्ची को नदी में फेंका गया, उस दौरान लगातार हो रही बारिश के कारण, वैसे ही अरपा नदी समेत आगे में मिलने वाली महानदी भी उफन रही थी।
दरअसल, आरोपी प्रकाश भार्गव, लाफार्ज कालोनी के अपार्टमेंट में रहा था और उसका मिताली के परिवार से जान-पहचान थी। घटना के दिन वह मिताली को घुमाने के लिए लेकर आया और बाद में फिरौती की नीयत से उसका अपहरण कर लिया और बिलासपुर जा रहा था, मगर रास्ते में उसने घर के लोगों को फोन पर तीन लाख रूपये देने की मांग की। इसके बाद मिताली के परिवार के लोग सक्रिय हुए। बाद में जिस मोबाइल नंबर से फोन आया था, उसकी जांच की गई तो वह प्रकाश भार्गव का निकला। जब पुलिस ने पूछताछ की तो उसके बयान सुनकर सभी आसमान तले जमीं खिसक गई। आरोपी प्रकाश ने बताया कि वह 80 हजार रूपये कर्ज से लदा था और इस समस्या से निपटने के लिए उसने मिताली का अपहरण का फिरौती मांगने का प्लान बनाया। रास्ते में वह दर्रीघाट के पास रूका। पुलिस को उसने जो बयान दिया है, उसके मुताबिक पहले उसने मिताली के गले दबाकर मारने का मन बनाया, इस दौरान बच्ची ने मासूमियत से गले क्यों दबाने की बात कही। इसके बाद वह बच्ची को घर छोड़ने के मूड में आ गया। इसी बीच उसकी शैतानी खोपड़ी में यह बात आ गई कि उसके घरवालों को पता चलेगा कि मिताली को वही लेकर आया था, उसके बाद उसने पकड़े जाने के भय से बच्ची को उफनती नदी अरपा में फेंक दिया।
इधर जैसे ही परिवार को फोन से मिताली के अपहरण की सूचना मिली, उसके बाद पुलिस भी जांच में जुट गई। कुछ ही घंटों में आरोपी प्रकाश को पुलिस ने दबोच लिया।
फिलहाल आरोपी प्रकाश जेल में है, मगर मानवता के दृष्टिकोण से सवाल यही है कि क्या, मासमू मिताली को तेज धार बहती नदी में फेंकने के पहले उसका हाथ नहीं कांपा ? जिस तरह घटना को उसने अंजाम दिया, उसने पूरे मानवता को शर्मशार कर दिया।


गला क्यों दबा रहे हो भैया...
आरोपी प्रकाश, दर्रीघाट के पास मिताली का गला दबाने लगा। पुलिस जांच में यह बात आई है कि जब युवक प्रकाश, उसका गला दबाने लगा तो मासूम मिताली ने बड़ी मासूमियत से पूछा- गला क्यों दबा रहे हो भैया...। इसके बाद आरोपी ने उसे घर वापस लाने का मन बनाया, लेकिन अचानक वह अपहरण का राजफास होने के डर से मासूम को अरपा नदी की तेज बहती धार में फेंक दिया।


बीई का छात्र था आरोपी
आरोपी प्रकाश भार्गव, बिलासपुर के एक कॉलेज में बीई ( इंजीनियरिंग ) का छात्र था और गोपालनगर में अपने रिश्तेदार के घर रहने के कारण रेलवे कर्मचारी प्रेमूराम के घर आना-जाना था। यही कारण है कि बच्ची, आरोपी प्रकाश के साथ चली गई, मगर उसे कहां मालूम था, जिसे वह अपना समझ रही है, वही उसकी जिंदगी को मिटाने वाला साबित होगा।