गुरुवार, 3 नवंबर 2011

क्या होगा लापता 40 छत्तीसगढ़ियों का ?

छत्तीसगढ़ के 11 बरस होने पर राज्य सरकार जहां प्रदेश के सभी जिलों में राज्योत्सव जैसे आयोजन कर खुशियां मनाने में जुटी हैं, वहीं एक तबका ऐसा भी है, जो अपने सीने में अपनों की मौत का दर्द लिए बैठा है। समय गुजरने के बाद भी उनकी टीस कम होने का नाम नहीं ले रही है। राज्य सरकार की बेरूखी ने उनकी तकलीफों को और बढ़ा दी है।
साल भर पहले 5 अगस्त 2010 को जम्मू के ‘लेह’ में बादल फटने से जिले के दर्जनों गांवों से रोजी-रोटी की तलाश में गए मजदूरों की बड़ी संख्या में मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए, जिसका दर्द प्रभावितों को अब भी सालता है। उधर जैसे ही घटना की जानकारी जिला प्रशासन को जानकारी मिली, उसके बाद यहां से टीम भेजी गई। वहां से करीब हफ्ते भर बाद अधिकारी लौटे। लेह प्रशासन द्वारा 18 लोगों की मौत पुष्टि की गई। बाद में दो अन्य लोगों की पहचान होने के बाद उनका नाम भी सूची में दर्ज किया गया। इन 20 लोगों में 18 जांजगीर-चांपा जिले के थे और 2 रायपुर जिले के गिरौदपुरी के रहवासी थे। इसके अलावा 40 लोगों को लापता बताया गया। इनमें बच्चों की संख्या अधिक रही। इन लापता लोगों में सबसे अधिक बनारी के हैं। प्रशासन द्वारा यहां 13 लोगों को लापता बताया गया है, जबकि ग्राम महंत में इनकी संख्या 08 है। इसी तरह बोड़सरा के 04, नवागढ़ के 03, खैरा के 02, सलखन के 0, तनौद के 01 तथा गिरौदपुरी ( रायचुर ) के 02 लोग लापता हैं।
लेह में हुई हृदयविदारक घटना को हुए दो बरस से अधिक समय हो गया है, लेकिन इनकी न तो राज्य सरकार कोई खोज-खबर ले रही है और न ही जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा कोई जानकारी दी जा रही है। ऐसी स्थिति में जो लोग अपनों से बिछुड़ने का दर्द झेल रहे हैं, उन्हें मुआवजा तक नहीं मिल पा रहा है।
पिछले साल प्रभावितों लोगों के परिजनों ने कलेक्टर ब्रजेश चंद्र मिश्र से मिलकर लापता लोगों की पतासाजी की गुहार लगाई थी। इस दौरान उन्होंने राज्य सरकार को अवगत कराने की बात कही थी। इधर समय बीतने के साथ ही लेह में हुए हादसे का मामला थम गया। इस मसले पर न तो जिला प्रशासन के अधिकारियों ने दोबारा मुड़कर सुध ली और न ही राज्य सरकार की ओर से पहल होती दिखी। यही कारण है कि पिछले साल बादल फटने के बाद लापता हुए लोगों के बारे कोई निर्णय नहीं हो सका।
जिला प्रशासन के अधिकारी कहते हैं कि जब तक जम्मू-कश्मीर की सरकार, मृतकों के नाम नहीं देंगे, तब तक मुआवजा की राशि स्वीकृत नहीं हो पाएगी। दूसरी ओर अधिकारी बताते हैं कि लेह प्रशासन द्वारा शव मिलने के बाद ही मृतकों के नाम भेजने की बात कही जा रही है।
रोजी-रोटी की तलाश में गए मजदूरों को अहसास भी नहीं था कि वहां किसी की मां, किसी का भाई, किसी की पत्नी, किसी की बहन बिछड़ जाएगी। जिंदगी की लड़ाई में कई ने बाजी मार ली और वे वहां से आने के बाद यह कहते नहीं थके कि किसी भी सूरत में पलायन नहीं करेंगे। साथ ही कुछ लोगों को यह भी पता नहीं था कि वे हमेशा के लिए दफन हो जाएंगे।
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिले से हर बरस सैकड़ों की संख्या में लेह मजदूरी के लिए जाते थे। वहां कुछ महीने बिताने के बाद वापस लौटते थे। कुछ लोग बीते 15-20 सालों से लेह जा रहे हैं। उनका कहना रहता है कि गांवों में कम मजदूरी मिलती है और हर दिन काम भी नहीं मिलता, जबकि वहां काम की कोई कमी नहीं रहती। साथ ही छुट्टी के दिन भी मजदूरी मिलती है। यही लुभावनी बातें हैं, जो हर साल गरीबी की मार झेल रहे लोग लेह खींचे चले जाते थे। हालांकि उन्हें क्या पता था कि कभी उनका कोई अपना यहां खो जाएगा।
जब लेह से मजदूर लौटे तो उनकी आंखों में शरीर के जख्मों का दर्द था ही, मगर अपनों से दूर होने का दर्द उन्हें ज्यादा कसक रही थी। वह दर्द आज भी उनकी आंखों में कायम है। सरकार की गैरजिम्मेदाराना रवैया के कारण लेह में प्रभावित हुए कई परिवार के लोगों की परेशानी बढ़ गई है। परिवार के सदस्यों के खो जाने के बाद मुआवजे की आस थी, वह भी छिन गई है। जिसके चलते लोगों के आर्थिक हालात बिगड़ गए हैं। हादसे में जो जख्म मिले थे, उसका भी इलाज कराने में अक्षम साबित हो रहे हैं और गरीबी की चौतरफा मार झेलने के लिए मजबूर हैं। सरकार इस दिशा में पहल करती तो शायद इन मजदूरों की माली हालत में सुधार हो जाती है, लेकिन वह भी अकर्मण्य बनी हुई है।

तबाह हुए परिवार के परिवार
लेह के हादसे के बाद कई परिवार तबाह हो गए। कई घरों के चिराग बुझ गए। कुछ घरों में इक्के-दुक्के ही सदस्य बच पाए। चर्चा में ग्राम बनारी की गुरबारी बाई ने बताया कि लेह हादसे ने उनकी सब कुछ छिन लिया। पति, बहु तथा नातीन का अब तक पता नहीं है। साल भर बाद सरकार द्वारा इस दिशा में कोई निर्णय नहीं लिया गया है, जिससे उन्हें मुआवजा भी नहीं मिल पा रहा है। हादसे में जख्मी होने के बाद वह खुद काम नहीं कर पाती। लिहाजा परिवार के समक्ष आर्थिक संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। इसी तरह बनारी के ही पंचूराम का परिवार है, जिसने अपनी पत्नी के अलावा एक लड़के को खो दिया। उन्हें भी कोई मुआवजा नहीं मिला है। ऐसी स्थिति के चलते वे दिनों-दिन गरीबी की दलदल में चले जा रहे हैं।

कोई तो सुन ले...
लेह के हादसे में वैसे सैकड़ों लोग प्रभावित हुए और 50 से अधिक लोगों को चोटें आई थीं। कुछ लोगों का इलाज हुआ। उसके बाद केवल 32 लोगों को ही उपचरार्थ सहायता राशि साढ़े सात हजार रूपये दी गई। इसके बाद जिला प्रशासन ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि अन्य लोग, जो लोग घायल हुए थे, उन्हें मुआवजा देने क्या किया जाए ? प्रभावित लोग बताते हैं कि लोगों की सूची बनाने में अधिकारियों द्वारा लापरवाही बरती गई, जिसके चलते कई लोग सहायता राशि पाने से अछूते रहे। सोचनीय पहलू यह है कि जिन लोगों को सहायता राशि दी गई है, वह भी नाकाफी है, क्योंकि लेह में जो जख्म मिले हैं, उसका इलाज इतनी राशि से असंभव है। ऐसी स्थिति में उन्हें कई परेशानियां हो रही हैं। लेह हादसे में घायल राजेन्द्र की थोड़े से काम करने पर सांसे फूलने लगती है, वहीं और भी कई लोग हैं, जिनके हाथ-पैर नहीं चलते। जैसे-तैसे वे अपनी जिंदगी लड़ाई लड़ने मजबूर हैं। एक अन्य प्रभावित व्यक्ति लालू यादव ने बताया कि उसे साढ़े सात हजार सहायता राशि तक नहीं मिली है, जबकि उनका अस्पताल में इलाज भी हुआ। इसलिए वे गुहार लगा रहे हैं कि कोई तो उनका सुन ले...।

इन्हें तो दे दो मुआवजा !
जिला प्रशासन व सरकार कहते हैं कि लेह प्रशासन ने जिनकी मौत की पुष्टि की है, उन्हें 1 लाख रूपये मुआवजा दिया जाएगा, मगर अहम बात यह है कि जिले के जिन 18-20 लोगों की मौत को जम्मू-कश्मीर सरकार ने माना है, उन्हें तक सरकार ने मुआवजा नहीं दिया है। केवल 8 लोगों को मुआवजा दिया गया है, जिसमें 4 महंत, 3 बनारी तथा 1 खैरा के हैं। ऐसे में सोचने वाली बात है कि अन्य लोगों को आखिर क्यों मुआवजा नहीं दिया जा रहा है ? मुआवजा जिन्हें दिया गया है, वहां एक बात और सामने आ रही है कि कुछ बिचौलिएनुमा लोगों ने 1 लाख रूपये में से 25-30 हजार रूपये हजम कर लिए। प्रभावितों को रूपये चेक से दिए गए हैं, मगर कुछ लोगों द्वारा मुआवजा दिलाने के एवज में उनसे राशि ऐंठ ली गई। फिलहाल यह जांच का विषय है और इस बारे में हर कोई कुछ भी कहने से बच रहा है।

जहां जन्म, वहीं दफन
बनारी निवासी राजेन्द्र की 16 साल की बेटी पिंकी का जन्म ‘लेह’ में हुआ था। लेह के हादसे में पिंकी की भी मौत हो गई। मृतकों की सूची में नाम होने के कारण पिंकी के पिता राजेन्द्र को 1 लाख रूपये मुआवजा मिला है, मगर उनके परिवार के अन्य दो सदस्य अब भी लापता हैं। जिनका उन्हें मुआवजा नहीं मिल सका है। वैसे मृतकों में अधिकतर बच्चे रहे, मजदूरों का कहना है कि देर रात जब बादल फटने की घटना हुई, उस दौरान बच्चे अपनी मां के साथ थे।

नहीं है पलायन की जानकारी
पिछले साल जब लेह में हादसा हुआ था, उसके बाद जिला प्रशासन जागा था और कलेक्टर ब्रजेश चंद्र मिश्र ने जिले की सभी पंचायतों को पलायन संबंधी जानकारी रखने के निर्देश दिए। साथ ही रजिस्टर में मजदूरों के नाम दर्ज करने कहा गया था। बाद में लेह में हुए हादसे की आग ठण्डी पड़ गई और वह आदेश भी ठंडे बस्ते में चला गया। जिले के अधिकारी-कर्मचारी तथा पंचायत प्रतिनिधियों ने ‘एक कान ढोल-एक कान पोल’ की तर्ज पर आदेश को दरकिनार कर दिया। हालात यह है कि पंचायतों में पलायन संबंधी कोई जानकारी नहीं है और न ही इस बारे में जिला पंचायत को भी कोई सूचना दी गई है। इस तरह जब घटना हो जाती है, उस दौरान प्रशासन के अधिकारी, प्यास लगने पर कुआं खोदने का काम करते हैं। लेह में हुए हादसे के बाद मजदूरों की संख्या जानने में काफी दिक्कतें आई थीं, फिर सबक नहीं सीखा गया है।

सोमवार, 26 सितंबर 2011

टेढ़ी नजर

1. समारू - इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में ब्रेकिंग की होड़ मची है।
पहारू - और जिंदा को, मुर्दा करार दे देते हैं।

2. समारू - प्रधानमंत्री जी के अमेरिका के बाद, अब ईरान जाने की खबर है।
पहारू - घर में आग लगी है और वे लौ बुझाने, जंगल की खाक छान रहे हैं।

3. समारू - प्रधानमंत्री अपने जन्म दिवस पर क्या कह सकते हैं।
पहारू - महंगाई का केक खाओ तथा भ्रष्टाचार का गुब्बारा फोड़ो।

4. समारू - प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मिलने प्रणव मुखर्जी पहुंचे।
पहारू - नाव में पानी भर गया है, कुछ काम बनने वाल नहीं है।

5. समारू - नवरात्रि में नेताओं का माथा टेकने का सिलसिला शुरू होगा।
पहारू - जनता रूपी भगवान के पास केवल पांच साल में एक बार ही माथा टेकने आते हैं।

रविवार, 25 सितंबर 2011

टेढ़ी नजर

1. समारू - एक सर्वे के अनुसार - छग में पीडब्ल्यू सबसे भ्रष्ट विभाग है।
पहारू - तभी तो एक सीरियल में एक पात्र कहता है - वे ऐसे-वैसे नहीं हैं, पीडब्ल्यूडी वाले हैं, पीडब्ल्यूडी...।

2. समारू - भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी दुर्ग में गरज कर गए।
पहारू - दिल्ली पहुंचते ही शांत तो हो जाते हैं...???

3. समारू - राजधानी रायपुर में उठाईगिरी बढ़ गई है।
पहारू - पुलिस उठकर जागे, तब रूके ना।

4. समारू - देश के अनेक मंत्री इन दिनों अमेरिका में हैं।
पहारू - मंत्री बनने के बाद ‘विदेशी जुगाली’ जिंदगी का हिस्सा बन जाती है।

5. समारू - उड़ीसा में एक विधायक की रैली के दौरान हत्या की खबर है।
पहारू - अब, आम जनता कैसे न सहमें...।

उसने मासूम बच्ची को जिंदा नदी में फेंक दिया

जांजगीर-चांपा जिले में जो मामला आया है, उसे सुनकर किसी का भी दिल दहल सकता है। किसी व्यक्ति की हैवानियत की फितरत कितनी बेदर्दी है, इसे यह घटना कहती है। अकलतरा क्षेत्र के गोपालनगर की लाफार्ज कालोनी निवासी रेलवे कर्मचारी प्रेमूराम ठाकुर की 5 साल की मासूम बच्ची मिताली ठाकुर को एक सिरफिरे युवक ने दर्रीघाट ( बिलासपुर ) के पास अरपा नदी में फेंक दिया। इस ह्दयविदारक घटना के बारे में जिसे भी पता चला, उसे निश्चय ही गहरा सदमा लगा। दूसरी ओर मिताली को नदी की तेज धार में फेंके जाने के हादसे के बाद उसके परिवार के लोगों के आंसू थमने के नाम नहीं ले रहा है। पूरी लाफार्ज कालोनी में मातम पसरा है, वहीं हर दिन उसकी खोजबीन की जा रही है, मगर अब तक उसका कोई सुराग नहीं लगा है। जब मासूम बच्ची को नदी में फेंका गया, उस दौरान लगातार हो रही बारिश के कारण, वैसे ही अरपा नदी समेत आगे में मिलने वाली महानदी भी उफन रही थी।
दरअसल, आरोपी प्रकाश भार्गव, लाफार्ज कालोनी के अपार्टमेंट में रहा था और उसका मिताली के परिवार से जान-पहचान थी। घटना के दिन वह मिताली को घुमाने के लिए लेकर आया और बाद में फिरौती की नीयत से उसका अपहरण कर लिया और बिलासपुर जा रहा था, मगर रास्ते में उसने घर के लोगों को फोन पर तीन लाख रूपये देने की मांग की। इसके बाद मिताली के परिवार के लोग सक्रिय हुए। बाद में जिस मोबाइल नंबर से फोन आया था, उसकी जांच की गई तो वह प्रकाश भार्गव का निकला। जब पुलिस ने पूछताछ की तो उसके बयान सुनकर सभी आसमान तले जमीं खिसक गई। आरोपी प्रकाश ने बताया कि वह 80 हजार रूपये कर्ज से लदा था और इस समस्या से निपटने के लिए उसने मिताली का अपहरण का फिरौती मांगने का प्लान बनाया। रास्ते में वह दर्रीघाट के पास रूका। पुलिस को उसने जो बयान दिया है, उसके मुताबिक पहले उसने मिताली के गले दबाकर मारने का मन बनाया, इस दौरान बच्ची ने मासूमियत से गले क्यों दबाने की बात कही। इसके बाद वह बच्ची को घर छोड़ने के मूड में आ गया। इसी बीच उसकी शैतानी खोपड़ी में यह बात आ गई कि उसके घरवालों को पता चलेगा कि मिताली को वही लेकर आया था, उसके बाद उसने पकड़े जाने के भय से बच्ची को उफनती नदी अरपा में फेंक दिया।
इधर जैसे ही परिवार को फोन से मिताली के अपहरण की सूचना मिली, उसके बाद पुलिस भी जांच में जुट गई। कुछ ही घंटों में आरोपी प्रकाश को पुलिस ने दबोच लिया।
फिलहाल आरोपी प्रकाश जेल में है, मगर मानवता के दृष्टिकोण से सवाल यही है कि क्या, मासमू मिताली को तेज धार बहती नदी में फेंकने के पहले उसका हाथ नहीं कांपा ? जिस तरह घटना को उसने अंजाम दिया, उसने पूरे मानवता को शर्मशार कर दिया।


गला क्यों दबा रहे हो भैया...
आरोपी प्रकाश, दर्रीघाट के पास मिताली का गला दबाने लगा। पुलिस जांच में यह बात आई है कि जब युवक प्रकाश, उसका गला दबाने लगा तो मासूम मिताली ने बड़ी मासूमियत से पूछा- गला क्यों दबा रहे हो भैया...। इसके बाद आरोपी ने उसे घर वापस लाने का मन बनाया, लेकिन अचानक वह अपहरण का राजफास होने के डर से मासूम को अरपा नदी की तेज बहती धार में फेंक दिया।


बीई का छात्र था आरोपी
आरोपी प्रकाश भार्गव, बिलासपुर के एक कॉलेज में बीई ( इंजीनियरिंग ) का छात्र था और गोपालनगर में अपने रिश्तेदार के घर रहने के कारण रेलवे कर्मचारी प्रेमूराम के घर आना-जाना था। यही कारण है कि बच्ची, आरोपी प्रकाश के साथ चली गई, मगर उसे कहां मालूम था, जिसे वह अपना समझ रही है, वही उसकी जिंदगी को मिटाने वाला साबित होगा।

‘अजायब घर नहीं है, भारत का संविधान’

छत्तीसगढ़ के जांजगीर में ‘बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल स्मृति समारोह’ के दौरान ‘संविधान में भ्रष्टाचार के उपचार’ विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में प्रमुख वक्ता छग उच्च न्यायालय बिलासपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी थे। अध्यक्षता जिला सत्र न्यायाधीश गौतम चौरड़िया ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में राज्य विधिक परिषद के अध्यक्ष शैलेन्द्र दुबे उपस्थित थे।
विचार गोष्ठी के प्रमुख वक्ता अधिवक्ता कनक तिवारी ने कहा कि भारत का संविधान, अजायब घर नहीं है, बल्कि यह एक पोथी है। जिसे हर नागरिक को पढ़ने की जरूरत है। संविधान में भ्रष्टाचार को रोकने के उपाय बताए गए हैं, जिन अमल किया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि देश में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं, जिसे समूल नष्ट करने लंबी लड़ाई लड़ने की जरूरत है। श्री तिवारी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि इस समय हालात यहां तक बन गए हैं कि आखिर किस पर भरोसा किया जाए। हर कहीं भ्रष्टाचार ने पांव जमा लिया है। चाहे वह नेता, न्यायालय, मीडिया हो, इनकी विश्वसनीयता पर उंगली उठी है। उन्होंने ने कहा कि संविधान को समझने की प्रवृत्ति ही गलत है, जो सेवक बनने का दावा करते हैं, वे ही चुनाव जीतने के बाद मालिक बन जाते हैं। संसद में पहुंचने के बाद खुद को उसकी खैरख्वाह समझने लगते हैं और वे यह कहते हैं कि जो वे कहेंगे, वहीं होगा। वे जो चाहेंगे, उस पर अमल करना होगा।
श्री तिवारी ने सीधे शब्दों में कहा कि बड़ी अदालतों में कैसे बड़बोले अधिवक्ता, पैसों के बल पर कमजोर तबके को दबाते हैं। अदालतों में कैसे गवाह तोड़े जाते हैं, यह जज भी समझते हैं, मगर वे संविधान से बंधे होते हैं। इसलिए कुछ नहीं कर सकते। यह भी हम भूल करते हैं कि रिश्वतखोरी को भ्रष्टाचार समझ लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। यदि कोई बड़ा उद्योगपति, किसी नेता या अफसर को घूस देता है, इसे क्यों भ्रष्टाचार नहीं माना जाता ? केवल इसलिए कि यह जनता की आंखों के सामने नहीं होता।
उन्होंने कहा कि दुनिया में दूसरा महात्मागांधी नहीं बन सकता, अन्ना हजारे तो एक प्रतीक हैं। जन लोकपाल बिल पास भी हो जाएगा, इसके बाद भ्रष्टाचार खत्म होने किसी चमत्कार की उम्मीद करना बेकार है। इतना जरूर है कि इस आंदोलन से अवाम जागृत जरूर हुई है और भ्रष्टाचार मिटाने, किसी न किसी को मशाल हाथ में लेनी ही होगी। भ्रष्टाचार की बीमारी हर कहीं फैल गई है, इसे नष्ट करने जनता की भूमिका अहम होती है। इसके तहत जनता को ‘सूचना के अधिकार’ जैसे कानूनी हथियार मिला है। इससे भ्रष्टाचारियों की चूलें हिल गई हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जिला सत्र न्यायाधीश गौतम चौरड़िया ने कहा कि संविधान का निर्माण जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता से स्थापित है। जनता यदि अनुशासित व जागरूक है तो भ्रष्टाचार नहीं पनपेगा। उन्होंने कहा कि पीढ़ियों को बिगड़ने में कम समय लगता है, किन्तु सुधारने में संदियां लग जाती है। भ्रष्टाचार का यह भी एक कारण हो सकता है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं होते। हर चुनकर आने वाले जनप्रतिनिधि अपने दिल पर हाथ रखकर बताए कि उन्होंने बिना किसी जोड़-तोड़ के चुनाव जीते। श्री चौरड़िया ने कहा कि भारत का संविधान महज एक किताब ही नहीं, मिशन है, सभी सभी के हितों का समावेश है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए संविधान में व्यवस्था है, इसी व्यवस्था के तहत न्यायपालिका, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रही है। संविधान की शक्तियों के कारण ही कुछ लोग भ्रष्टाचार के आरोप में सींखचों के पीछे हैं।
विशिष्ट अतिथि राज्य विधिक परिषद के अध्यक्ष श्री दुबे ने कहा कि भ्रष्टाचार की उत्पत्ति, अंग्रेजों के समय नजराना प्रथा के रूप में हुई थी। यही नजराना प्रथा, अब भ्रष्टाचार बन चुकी है। भ्रष्टाचार ने सभी वर्गों को प्रभावित किया है। ऐसे में यह मुद्दा काफी अहम है, जिस पर हर किसी को विचार करने की जरूरत है।
विचार गोष्ठी के मौके पर विशिष्ट अतिथि जांजगीर के वरिष्ठ अधिवक्ता विजय दुबे समेत अनेक न्यायाधीश, अधिवक्ता तथा गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

हजारों हाथ बने बाघिन के हत्यारे ?

अक्ल के लिहाज से मनुष्य को सभी जीवों में श्रेष्ठ माना जाता है। इस बात को मनुष्य ने अपने विवेक के दम पर सिद्ध भी कर दिखाया है। यही कारण है कि आज हम चांद पर भी जीवन जीने की राह तलाश लिए हैं। यह भी कहा जाता है कि मनुष्य में ही अन्य जीवों की अपेक्षा, सोचने-समझने की अधिक शक्ति होती है और मार्मिक अहसास भी होता है, मगर जब आदमी, जानवर बन जाता है तो फिर मानव होने की ‘संवेदना’ कहीं दुबकी नजर आती है।
ऐसा ही कुछ हुआ, छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के छुरिया इलाके में। जहां इंसानों ने एक बाघिन को लाठी से पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया और वन विभाग का अमला देखते ही रह गया। हजारों हाथों की वार से बाघिन कुछ मिनटों में ढेर हो गई। बताया जाता है कि यह बाघिन पिछले एक माह से क्षेत्र में दहशत फैला रखी थी और कइयों को घायल कर चुकी थी। कुछ जानवरों को अपना निवाला बना लिया था। आदमखोर बाघिन के चलते छुरिया इलाके के आधा दर्जन गांवों के हजारों लोगों का जीना मुहाल हो गया था। क्षेत्र के मोहगांव, आमगांव और बखरूटोला में बाघिन कारण कुछ दिनों में लोगों का काफी नुकसान हुआ, साथ ही ग्रामीणों की जान पर हर पल खतरा मंडराता रहता था। इस बात से वे हर पल सशंकित रहते थे।
वन विभाग को ग्रामीणों ने सूचना दी थी और अफसरों का कहना है कि अपनी ओर से कोशिश भी कर रहे थे, मगर बाघिन को पकड़ने में सफलता नहीं मिल रही थी। आखिरकार, महीने भर से दहशत के साये में जी रहे लोग आक्रोशित हो गए और आसपास गांवों के लोगों की सैकड़ों की संख्या में भीड़ जमा हो गई। लाठी, डंडे, जाल लेकर लोग बाघिन के पीछे पड़ गए। ग्रामीणों में जिस तरह की उग्रता दिखाई दी, उससे लगता है कि ग्रामीण, किसी भी तरह से बाघिन को पकड़ने के मूड में नहीं थे। सुबह से ही हालात बिगड़ने लगे थे, फिर भी वन विभाग के अफसरों ने न तो उग्र भीड़ को शांत करने की कोशिश की और न ही, बाघिन को पकड़ने की। स्थिति यहां तक आ गई कि ग्रामीणों की भीड़ के चंगुल में बाघिन फंस ही गई और हजारों हाथों ने उसकी जान लेकर ही दम लिया।
आदमघोर बाघिन के कारण इलाके में मौत मंडरा रहा था, उस लिहाज से ग्रामीणों की उग्रता समझ में आती है, लेकिन कहीं न कहीं ऐसा रास्ता निकाला जाना चाहिए था, जिससे बाघिन को मारने के बजाय, पकड़ा जा सकता। वन विभाग का पूरा अमला, इस कार्य में असफल रहा। समय रहते अफसर जरूरी कदम उठा लिए होते तो एक जानवर की जान, ऐसे ही नहीं जाती। निश्चित ही वह बाघिन लोगों की जान पर बन आई थी, लेकिन इस कदम की जरूरत नहीं थी।
लोगों को धैर्य का परिचय देना चाहिए था, साथ ही मनुष्य में जो संवेदना की बात होती है, उस पर भी गौर करना चाहिए। हालांकि, भीड़ की दिशा नहीं होती है और यही भीड़ की भेंट, वह बाघिन चढ़ गई। इस पूरे मामले में लोगों ने निर्दयता का परिचय दिया ही है, लेकिन इतना जरूर है कि वन विभाग की कार्यप्रणाली कहीं न कहीं सवालों के घेरे में है।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

टेढ़ी नजर

1. समारू - कांग्रेस कह रही है - छह माह में उखड़ने वाली सड़क, छह दिन में उखड़ जा रही है।
पहारू - छग में विपक्ष है, कहां ???

2. समारू - पूर्व केन्द्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने संप्रग सरकार को आड़े हाथों लिया।
पहारू - एक यही तो हैं, जो सरकार को जुबानी खुराक देते हैं।

3. समारू - बिलासपुर में पेंशन के लिए युवती से बन गई बुढ़िया।
पहारू - जांजगीर में तो पति के जिंदा रहते, महिलाएं ‘विधवा पेंशन’ ले लेती हैं।

4. समारू - स्वास्थ्य मंत्री ने कहा - छग में पांच हजार आबादी वाले गांवों में अस्पताल खुलेगा।
पहारू - पहले से जो है, उसी की तबियत ठीक कर लें।

5. समारू - कोरबा पहुंची महिला हॉकी टीम की कप्तान सबा अंजुम नौकरी नहीं देने पर रो पड़ीं।
पहारू - छग में लाखों युवा डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं, वे क्या करें ???