सोमवार, 21 जनवरी 2013

छग कांग्रेस और गुटबाजी का दीमक

इसमें कोई शक नहीं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सत्ता से बाहर है तो उसकी वजह वह खुद है, क्योंकि गुटबाजी का दीमक, छग कांग्रेस को इस कदर चट कर रहा है कि उसके हाथ से सत्ता साल-दर-साल खिसकती जा रही है। कांग्रेस नेताओं के मुंह से यह बात अधिकतर सुनने को मिलती है कि कांग्रेस एक परिवार है और सभी नेता एक धड़े से जुड़े हैं और उनके नेता सोनिया गांधी व राहुल गांधी हैं। छग में कांग्रेसी नेताओं के कहे में कितना दम है, यह तो इसी से जाना जा सकता है कि प्रदेश में जितने बड़े नेताओं के कुनबे हैं, उतने फाड़ हैं। कहीं ‘त्रिफला’ खुद को ताकतवार बताती है तो कहीं ‘चमनप्राश’ को खुद दमदार बताने से नहीं चूकता। कुछ अनुभवी नेता भी जरूरत पड़ने पर सत्ता संभालने के लिए खुद के कांधे को मजबूत बताने से भी नहीं हिचकते।
अहम मसला है, कैसे छग में सत्ता हासिल की जाए, लेकिन इसे कांग्रेस के लिए विडंबना ही कही जा सकती है कि सत्ता मिलने के पहले ही नेताओं को सत्ता सुख के साथ मुख्यमंत्री की कुर्सी नजर आती है ? कांग्रेस के नेताओं के पहले सत्ता हासिल करने ‘गुटबाजी’ भुलाकर जोर लगानी चाहिए, बाद में फिर कुर्सी की लड़ाई में ताकत झोंकनी चाहिए, परंतु इसके उलट ही सोच नजर आती है।
छग कांग्रेस में बीते 10 साल से यही कुछ चल रहा है। जब से कांग्रेस के हाथ से सत्ता खिसकी है, उसके बाद हालात बन गए हैं कि कांग्रेस के नेताओं में ही जुबानी लड़ाई चलती रहती है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि जो खुद ही लड़ते रहें, उनमें दूसरे को हराने का माद्दा कहां से आएगा ? दूसरे को हराने के लिए पहले गुटबाजी को वास्तविक तौर पर भुलानी होगी। केवल बयानों में ही गुटबाजी की बात नकारने से बात नहीं बनने वाली। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जिस बेबाकी के साथ बात कहते हैं और अपनी कमियां गिनाकर उसे दूर करने पर विचार करते हैं। कुछ ऐसा कर दिखाना होगा, छग कांग्रेस के नेताओं को। ‘मतभेद’ को पूरी तरह से खत्म करना होगा। ‘मनभेद’ होने की बात कहकर खुद को तसल्ली देने से काम नहीं चलेगा। यही ढर्रा चलता रहा तो तीसरी बार सत्ता ‘हाथ’ से फिर फिसल जाएगी।
देखिए, छग कांग्रेस के नेताओं में जो आपसी द्वंद चल रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस हाईकमान भी जानती है कि छग में कांग्रेस को मजबूती की जरूरत है। वह यह भी जानती है कि कांग्रेस की कमजोरी के लिए सबसे जिम्मेदार कारण है तो, वह गुटबाजी है। पिछले साल रायपुर आकर राहुल गांधी ने भी कांग्रेस नेताओं को गुटबाजी भूलने का पाठ पढ़ाया था और हिदायत भी दी थी कि ऐसा नहीं हुआ तो सत्ता कभी नहीं मिलेगी और आगे भी ‘वनवास काल’ ही झेलना पड़ेगा। आज जिन राहुल गांधी के उपाध्यक्ष की ताजपोशी के बाद इन नेताओं में उत्साह है या एक तरह से नेताओं के साथ कार्यकर्ताओं में नई उर्जा का संचार हो गया है, लेकिन चिंता यह भी है कि जिन नेता की कही बातांे को ये नेता नहीं मानते या उनकी रायशुमारी को दरकिनार कर ‘एकला-चलो’ की नीति को अपनाते हैं ? फिर ऐसे नेताओं से राहुल गांधी को क्या उम्मीद हो सकती है ?
अभी खबर आई है कि जयपुर के चिंतन शिविर में छग कांग्रेस के कामकाज को सराहा गया है। निश्चित ही बीते कुछ साल की अपेक्षा छग कांग्रेस काफी मजबूत हुई है, कुछ मुद्दों में भाजपा सरकार को घेरने में कामयाब भी रही, किन्तु कांग्रेस के नेताओं में ‘जितने नेता, उतने फाड़’ की बात नहीं होती तो फिर कांग्रेस और भी अधिक शक्ति के साथ काम कर पाती। छग कांग्रेस की दुर्दशा इसी बात से समझी जा सकती है कि यहां जितने नेता हैं, उनके अपने ‘गुट’ हैं। हर बड़े नेता के साथ, छोटे नेताओं को उनके अपने गुट के नाम से जाना जाता है। हालांकि, जब भी गुटबाजी का सवाल आता है तो इन्हीं नेताओं की जुबान गुटबाजी को नकार जाती है और कहा जाता है, हम तो ‘सोनिया-राहुल’ तथा गांधी परिवार के सिपाही हैं। यहां प्रश्न यही है कि जब ऐसी बात है तो बयानों में कांग्रेस के नेताओं के जुबानी तीर से अपनों की टीस बढ़ाने वाली बात क्यों निकलती है ? या कहें सभी नेताओं ने अपने तरकश में एक-दूसरे को ढेर करने तीर जोड़ रखे हैं। एक-दूसरे से कोई खुद को कमतर के समझने के मूड में नहीं दिखता।
हमारा यही कहना है कि कांग्रेस के नेताओं की आपसी नोंक-झोंक तथा रस्सकस्सी के कारण ही कांग्रेस, सत्ता से बाहर गई है और यही स्थिति बनी रही तो आगे भी यही हाल होने वाला है ? यह भी किसी से छिपी नहीं है कि कांग्रेस खुद से हारती है। जितनी उर्जा खुद के घर जलाने में कथित कांग्रेसी लगाते हैं, यदि उतना ही जोर कांग्रेस की मजबूती के लिए लगाएं तो कांग्रेस व कांग्रेसियों का भला हो जाए। मन में किसी ‘नेता’ के बजाय, कांग्रेस का हित होने की मंशा हो, उसके बाद कांग्रेस को सत्ता में वापसी से कोई नहीं रोक सकता।
अभी भी समय है, चुनावी नाव में बैठने के पहले छग के कांग्रेसी नेताओं के साथ बड़े नेताओं को समझने की जरूरत है। जो सोच राहुल गांधी रखते हैं, उस दिशा में कांग्रेस कदम बढ़ाती है तो निश्चित ही कांग्रेस को लाभ ही होगा। इससे पहले, कांग्रेस को गुटबाजी का जो दीमक चट कर रहा है और चेहरों की राजनीति हो रही है, उससे बचना होगा, तब कहीं जाकर ‘खोई सत्ता’ हासिल हो पाएगी।

बातों-बातों में...

किसे लगे झटके
हाल में कांग्रेस व भाजपा की राजनीति गरमा गई। यू-टर्न ने ऐसा रूख बदला, तब कहीं जाकर राजनीति में आया उबाल शांत हुआ। बाद में सियासत में किसे झटके लगे, इस पर बहस शुरू हो गई। कमल फूल वाले कहने लगे कि पंजे के खेवनहार को झटके लगे, दूसरी ओर पंजे वाले तर्क देने में पीछे नहीं रहे कि हमने खिलते हुए फूल को, खिलने के पहले ही मसल दिया। किनकी बातों में कितना दम है, ये तो वही जानें, लेकिन इतना जरूर है कि झटके तो लगे हैं, लेकिन किसे...? ये भी किसी से छिपा नहीं है।

चक्कर पर चक्कर
एक नेता की साढ़ेसाती चरम पर है, तभी तो एक बार अभयदान मिलने के बाद भी सबक नहीं सीख पाया। आलम यह है कि अब उसे चक्कर पर चक्कर काटना पड़ रहा है। कभी वहां, कभी यहां। चक्कर काटने के फिराक में कहीं बन न जाएं..., इसकी भी चर्चा जोरों पर है। बड़े साहब से खासी जान-पहचान का हवाला देकर चक्कर चलाने में भी माहिर है, लेकिन दूसरी बार अपनों ने उन्हें सीतम देने की ठानी है, उसके बाद ये चक्कर कितने काम आएंगे, यह तो कुछ दिनों में ही पता चल जाएगा। सत्ता के रसूख के आगे पिछली बार हवा का रूख मुड़ गया था, लेकिन इस बार तो उनके सामने आंधी है। कहने वाले कह रहे रहे हैं कि ज्यादा मलाई खाएंगे तो हश्र, ऐसा ही होगा ?

ये सुधरने वाले कहां...
जो लगातार सिमटती जा रही है, उसकी चिंता तो जरूरी है। देर से ही सही, जागरण काल तो आया है। साहब ने जब से फरमान जारी किया है, उसके बाद धंधे में जुड़े लोगांे की नींद हराम हैं। बाजार में इस बीमारी की दवा भी नहीं मिल रही है। नींद की दवा भी काम नहीं आ रही है। स्थिति फिर भी नहीं सुधर रही है, जानकर भी अंधे कुंए में कूदने की कोशिशंे जारी है, वह भी दोनों ओर से। लाइलाज हो चुकी बीमारी की इलाज ढूंढने तो निकले हैं, लेकिन ये ऐसी बीमारी है, जो पूरे शहर को आगोश में ले रखी है, उससे तो बीमारी संक्रामक होगी है, चाहे ट्रीटमंेट कुछ भी हो। इसीलिए तो कहा जा रहा है कि लाख कोशिश कर लो, ये सुधरने वाले कहां...?

मान गए साहब आपको
सुरक्षा की दुहाई की जवाबदेही रखने वाले विभाग में कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। लगता है, यहां भी ग्रह-नक्षत्र सही नहीं है। जैसा मंत्री कहते हैं, यहां भी हवन-पूजन की जरूरत तो नहीं है ? एक तो अमला नहीं है, जो हैं, वह भी अपनी करतूत से ‘ऑफ-लाइन’ में हैं। स्थिति यह है कि जिन्हें चौकी न मिले, वह थाने का दरोगा बन बैठा है। इतना ही नहीं, साहब की कृपा इतनी कि एक्स्ट्रा प्लेयर की तरह बैठाए गए को भी, कुछ ही दिन में बड़ी जिम्मेदारी दे दी, वह भी रेंज के बड़े साहब के हुक्म को दरकिनार कर। यही वजह है कि कहना पड़ रहा है, मान गए, साहब आपको। इतनी दरियादिली की क्या कहें...।

सोमवार, 14 जनवरी 2013

सिसकती आंखों का दर्द और नजरिया

दिल्ली की घटना ने जिस तरह पूरे देश को हिलाकर रख दिया, उससे कहीं दर्दनाक वाकया छत्तीसगढ़ के कांकेर में घटित हुआ है। झलियामारी गांव के आश्रम में छात्राओं से दुष्कर्म के मामले उजागर हुए, उसके बाद निश्चित ही सरकार, गहन विचार के लिए मजबूर हो गई है कि आखिर व्यवस्था में कहां खामियां रह गई हैं ? छग के आश्रम शालाओं के साथ ही कन्या छात्रावासों की बदहाली व समस्या की बातें सामान्य ही मानी जाती रही है, लेकिन जो घटना सामने आई है, वह सरकार के साथ, समाज की भी नींद खोलने के लिए काफी है। शिक्षित व विकासपरक का चोला ओढ़े समाज में जिस तरह की मानसिकता व्याप्त है, उसकी परिणति है कि इस तरह की घिनौनी करतूत घटित हो रही है। ऐसे में इस मसले में विचार कर समस्या को खत्म करने की कोशिश के बजाय, जैसी राजनीति हो रही है और बयानों की बयार चल रही है, उससे जरूर उन सिसकती आंखों का दर्द बढ़ना स्वाभाविक है। राजनीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे किसी का भला हो, न कि किसी के जख्म को नासूर बनाने का काम हो। जब किसी का नजरिया ही खराब हो, वहां व्यक्ति की सोच में बदलाव की जरूरत होती है, तब कहीं जाकर समाज को सशक्त बनाया जा सकता है। इसके लिए संस्कारित शिक्षा का अहम योगदान हो सकता है, क्योंकि शिक्षा का मानव जीवन पर सकारात्क प्रभाव दिखता भी है।
देश में चहुंओर एक ही मुद्दे पर चर्चा हो रही है। यह जरूरी भी है, क्योंकि जब समाज गलत दिशा में जाता हुआ दिखता है तो उसके निदान के लिए मंथन भी आवश्यक माना जाता है। दिल्ली में गैंगरेप की घटना के बाद अवाम ने एक ही आवाज बुलंद की और कानून में बदलाव पर जोर दिया। निश्चित ही यह आवश्यक है, किन्तु उससे पहले समाज में व्याप्त ओछेपन की मानसिकता को दूर करनी होगी। पुरूष व नारी को लेकर मन में बनी संकीर्णता की खाई को पाटनी होगी। शिक्षा व विकास के बढ़ते आयाम ने काफी हद तक इस अंतर को घटाया है, लेकिन आज भी हालात पूरी तरह बदले नहीं हैं। इसी का परिणाम है कि ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब यह सुनाई न पड़े कि ‘अनाचार’ की घटना नहीं हुई है। नारी पूजा व नारी शक्ति की बात कहते, समाज नहीं थकता। साथ ही समाज में रहने वालों की जननी ‘नारी’ ही होती है, लेकिन जब घृणित करतूत सामने आती है, उसके बाद नारीत्व भावना की सोच तार-तार हो जाती है।
नारी उत्थान की जब बात हो रही है, उसमें सबसे पहले नजरिया में बदलाव की जरूरत है। जब नजरिया बदलेगा, उसके बाद कहीं न कहीं, नारी की छवि, देवी के रूप में नजर आएगी। शास्त्रों में भी नारी की महत्ता का बखान है, लेकिन आज जो स्थिति नारियों की प्रस्थिति के साथ बन रही है, उसे एक शिक्षित व सभ्य समाज के लिए हितकर नहीं माना जा सकता। किसी परिवार या समाज के विकास में नारी का हर तरह से योगदान होता है, यदि वही दबी-कुचली रहेगी तो फिर जैसा प्रगतिशील समाज की संकल्पना की जाती है, वह साकार हो पाएगा, बड़ा सवाल है ?
अनाचारियों के खिलाफ देश भर के लोगों ने सड़क पर शक्ति दिखाई है, कुछ ऐसी शक्ति, हमें उन विकृतियों को दूर करने लगानी होगी, जो समाज के अंदर व्याप्त है। जो भी व्यक्ति ऐसे घृणित कृत्य को करता है, वह भी समाज का ही हिस्सा होता है। ऐसी स्थिति में सशक्त समाज के निर्माण के लिए यह भी चिंतन का विषय है कि आखिर हम और हमारा समाज, किस दिशा में जा रहे हैं ? एक युग था, जब मातृशक्ति की पूजा होती थी, लेकिन अब उन्हीं मातृशक्ति के प्रतिरूप को कुचला जा रहा है। इस अन्याय के खिलाफ लड़ाई जारी है, इसे आगे भी जारी रखना होगा। सरकार को भी सख्त कदम उठाने होंगे, तब कहीं जाकर प्रगतिशील समाज की मंशा साकार रूप ले सकेगी।

बातों-बातों में...

खाक तो छाननी पड़ेगी
मिशन 2013 के नजदीक आते ही जनता से मेल-मिलाप का ‘मिशन’ भी शुरू हो गया है। गांवों के खाक छानने के साथ ही गिले-शिकवे भी दूर करने की कोशिशें हो रही हैं। हालांकि, पिछले चुनाव होने के कई साल तक सोने के बाद, अब जागने का कितना फल मिलेगा, यह तो जनता ही बताएगी, लेकिन चुनावी चक्कर में क्या ‘चक्कर’ चलेगा, यह भी देखने वाली बात होगी।

‘अर्जी’ देने का दर्द...
हाल ही में जिले से लेकर राजधानी रायपुर तक गरजने वालों का दर्द की क्या कहें, एक तो सरकार ने अड़ियल रहकर उनकी मांगों पर सहमति नहीं जतायी। कुछ लालीपॉप देने की कोशिश हुई, उस पर बात नहीं बनी। आलम यहां तक आ गया कि रण छोड़ना पड़ा, मगर मन की टीस खत्म नहीं हुई। सरकार पर चुनाव में भड़ास निकालने की चुनौती कायम है, किन्तु खुद की नौकरी वापस पाने की जद्दोजहद के बीच, अब उन्हें वापसी की ‘अर्जी’ देने का दर्द भी सालने लगा है। सरकारी नीति की आग में ऐसे जले कि छांछ को भी फूंक-फंूक कर पीते नहीं बन रहा है।

साहब बनने की ‘खुशनसीबी’
एक विभाग का अधिकारी ऐसा है, जिन्हें प्रभार का ‘साहब’ बनने का ही नसीब हासिल हुआ है। जब भी विभाग का कोई साहब कुर्सी संभालता है, उसके बाद, वे खुद को कतार में पाते हैं। कुछ महीने तक ‘साहब’ की कुर्सी खाली हो जाती है, फिर अधिकारी की बांछें खिल जाती हैं। साहब बनने का उनका सपना एक बार फिर साकार हो जाता है। ऐसा ही सिलसिला कई साल से चल रहा है और उन्हें ‘साहब’ बनने की ‘खुशनसीबी’ हासिल हो रही है। इतना ही नहीं, किसी भी बड़े साहब को साधना उन्हें बखूबी आता है, तभी तो वे उनके खास माने जाते हैं।

ग्रामीण ‘नेतागीरी’ का चस्का
एक नेता ऐसे हैं, जिन्हें पार्टी संगठन ने बड़े ओहदे पर बिठा तो दिया है, लेकिन उनकी ग्रामीण ‘नेतागीरी’ करने का चस्का खत्म ही नहीं हुआ है। लिहाजा, संगठन में जो सक्रियता नजर आनी चाहिए, वह दिखती नहीं है। इस तरह आने वाले चुनाव में संगठन की सुस्ती का कहीं खामियाजा, उन नेताओं को न भुगतना पड़ जाए, जो चुनावी वैतरणी पार लगाने की जुगत में लगे हैं। संगठन ने जो बड़ी जिम्मेदारी सौंपी, उसके बाद ग्रामीण नेतागीरी ने जरूर जोर पकड़ी, क्योंकि जहां से पकड़ है, वहीं तो जुगत की तलाश होती है। आखिर, वे करें तो क्या करें, आदत में जो शुमार हो गई है, ग्रामीण नेतागीरी। अब संगठन को ही सोचना होगा...

गुरुवार, 24 मई 2012

कांग्रेस की गुटबाजी और राहुल का पाठ

अभी हाल ही में कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी, जब राजधानी रायपुर आए तो छग के कांग्रेसियों में उत्साह भरने की उन्होंने भरसक कोशिश की और वरिष्ठ नेताओं को राहुल, पाठ भी पढ़ा गए कि गुटबाजी से कुछ नहीं होगा। बस, आने वाले कई बरसों तक कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकेगी ? कांग्रेस के नेता अधिकतर आलापते रहते हैं कि कांग्रेस में गुटबाजी नहीं है, मगर समय-समय पर यह खुलकर सामने आती रहती है। कभी नेताओं के बयानों से तो कभी कार्यक्रमों में एक-दूसरे से कन्नी काटते हुए। खैर, युवा बिग्रेड में राहुल गांधी के छत्तीसगढ़ आने से उत्साह भर आया है। इसका कारण भी है, उन्होंने वरिष्ठ नेताओं को जिस तरह सीधे तथा तीखे शब्दों के साथ ‘संभल’ जाने की बातें कही और युवाओं को आगे आने की बात कहीं, इसके बाद तो कई कांग्रेस के युवा नेताओं ने हुंकार भरना भी शुरू कर दिया है।
छत्तीसगढ़ की सत्ता में कांग्रेस की लुटिया डूबने का बस एक ही कारण नजर आता है, वह है बड़े नेताओं की आपसी गुटबाजी। जितने बड़े नेता, उतने फाड़। जब छग का निर्माण हुआ, उस दौरान पूरी बहुमत के साथ कांग्रेस ने सरकार बनाई, उसके बाद तो जैसे कांग्रेस को गुटबाजी का दीमक ही चट कर गया। कांग्रेस के नेता गुटबाजी की बातों को हमेशा नकारते हैं, मगर राहुल गांधी ने किसी की परवाह किए बगैर ‘चेता’ ही दिया कि अब सुधर जाओ, नहीं तो सत्ता की चाबी नहीं मिलेगी। राहुल गांधी ने इस बात पर भी जोर दिया कि कार्यकर्ता चुनाव जिताते हैं और जब सत्ता हाथ नहीं आती, उसके बाद सबसे ज्यादा निराशा कार्यकर्ताओं को ही होती है।
छग के निर्माण के बाद बीते 11 बरसों में केवल ढाई बरस ही कांग्रेस सत्ता में रही, वह भी बंटवारे के हिस्से के सहारे। छग में पहली बार चुनाव हुआ, उसके बाद कांग्रेस की जमीं खिसक गई। इसमें भी कभी कांग्रेस में रहे नेताओं ने ही ‘कांग्रेस’ की दुर्गति की और सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। कांग्रेस चाहती तो गुटबाजी और आपसी खींचतान को भूलकर सत्ता में वापसी कर सकती थी, मगर कांग्रेस की कलह से भाजपा को सत्ता मिल गई। हालात यह रहे कि भाजपा ने उस सत्ता सुख को जमकर भुनाया और इसमें सबसे बड़ा योगदान दिया, कांग्रेसियों ने। एक-दूसरे से लड़कर कांग्रेसियों ने भाजपा की राह आसान कर दिया।
यह बात भी छिपी नहीं है कि छग विधानसभा के बीते दो सत्रों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस कभी विपक्ष की भूमिका में नजर आई ही नहीं। राज्य की भाजपा सरकार को घेरने में कांग्रेस फिसड्डी ही साबित होती रही। हाल के सत्रों में जो मुद्दे कांग्रेस के हाथ लगे, उनमें से भी अधिकतर कांग्रेस के हाथों में ऐसे ही आ गए। इतना जरूर है कि उसे भुनाने की भरसक कोशिश की गई और सरकार को घेरने में कामयाब भी रही, मगर इतना जरूर है कि कांग्रेस को जिस सशक्त विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए थी, वह नहीं निभा सकी है। यहां भी कांग्रेस की गुटबाजी और आपसी कलह ही उनके दुश्मन साबित हुई। चुनावों में विपक्षी दल के प्रतिद्वंदी भले ही होते हैं, मगर कांग्रेस को पीछे ढकलने के उनके अपने ही काफी होते हैं। यह बात भी उनकी आपसी खींचतान से जगजाहिर होती रहती है।
छग में जब विधानसभा चुनाव 2003 में हुए, उस दौरान कांग्रेस सत्ता में थी, मगर कुर्सी एवं वर्चस्व की लड़ाई के चलते कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्या चरण शुक्ल ने एनसीपी में शामिल होकर चुनावी रणभेरी में कांग्रेसियों को पसीने से तर-बतर कर दिया और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई, क्योंकि जितनी सीटों की कांग्रेस को जरूरत थी, उतनी सीटें तो एनसीपी ने कांग्रेस प्रत्याशियों को हराने में अहम भूमिका अदा की। इनमें से अधिकतर वे नेता थे, जो कांग्रेस का दामन छोड़कर, एनसीपी के हो लिए थे। 90 सीटों में एनसीपी, बड़े जोर-शोर से चुनाव लड़ी और अधिकतर जगहों पर एनसीपी की टिकट पर कांग्रेस के ही बागी नेताओं ने चुनाव लड़े। इसमें महज एनसीपी के खाते में चंद्रपुर विधानसभा सीट ही आई, वह भी एनसीपी के दम पर नहीं, बल्कि प्रत्याशी के व्यक्तिगत दमखम पर। स्थिति यह रही कि कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई और उसके बाद जो पतन का काल चल रहा है, उस पर घी डालने का काम, कहीं न कहीं कांग्रेस के नेता ही कर रहे हैं। इस बात को स्वीकार करते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को सबक दिया है, उससे उन्हें सीखने की जरूरत है, तभी तो वे सत्ता सुख के भागी बन सकते हैं, नहीं तो सत्ता की ओर निहारते रहेंगे और सत्ता, पिछली दो बार की ही तरह खिसकती रहेगी।
राहुल गांधी ने यही बात कही है कि कांग्रेस खुद से हारती है। यह बात भी हमेशा चर्चा में रहती है कि कई तथाकथित कांग्रेसी, जितनी मेहनत अपने ही दल के प्रत्याशी को हराने में करते हैं या फिर कांग्रेसी, एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर गुटबाजी को हवा देने में ऊर्जा लगाते हैं, उसी तरह एकजुटता का पाठ पढ़ लें तो कांग्रेस का भला हो जाएगा। ऐसी ही कुछ बात राहुल गांधी ने कहकर नेताओं को समय रहते ‘चेत’ जाने की बात कही है।
मजेदार बात यही है कि कांग्रेस ने सत्ता का स्वाद, भाजपा को चखा दिया है और वे जान भी गए हैं कि कैसे प्रदेश की जनता को साधना है। भाजपा की सरकार बनने के बाद ऐसा नहीं है कि भाजपा में कलह सामने नहीं आई है, मगर कांग्रेसियों को जिस तरह की टांग खींचने की परिणति के चलते सत्ता से दूर होकर भुगतनी पड़ रही है, उस तरीके के हालात फिलहाल भाजपा में नहीं है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कांग्रेस के हाथों-हाथ दिए मौके को भुनाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है। उन्हें विश्वास भी है कि भाजपा की हेट्रिक बनेगी और मिशन 2013, एक बार फिर भाजपा फतह करेगी।
जो भी हो, छग में हुए पिछले दो विधानसभा चुनावों की अपेक्षा इस बार का चुनाव काफी दिलचस्प होगा, क्योंकि कांग्रेसियों को भी अब समझ में आ गया है कि सत्ता से दूरी की क्या कीमत चुकानी पड़ती है। लिहाजा सत्ता की आश में, न चाहते हुए भी कांग्रेस के नेताओं को एक मंच पर खड़ा होना होगा, जैसा कि राहुल गांधी ने पाठ पढ़ाया है।

रविवार, 29 जनवरी 2012

नकल, एक और कालिख ?

निश्चित ही छत्तीसगढ़ विकास की दिशा में अग्रसर हो रहा है, लेकिन कई रोड़े भी नजर आ रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में अनेक बदलाव के कारण यहां की प्रतिभाएं निखर कर सामने आ रही हैं। फिर भी शिक्षा नीति में कई बदलाव की जरूरत है। इसमें सबसे बड़ी जरूरत है, छग को नकल के कलंक से मुक्त करना। ऐसा लगता है, जैसे छत्तीसगढ़ का नकल से चोली-दामन का साथ हो गया है, तभी तो एक मामले को भूले भी नहीं रहते, नकल के दूसरे मामले आंखों के सामने आ जाते हैं। ऐसी स्थिति में नकल की प्रवृत्ति को खत्म करने सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए, तभी प्रदेश की प्रतिभाओं का भला होगा। नहीं तो, प्रतिभाओं के हिस्से को ‘मुन्नाभाई’ आकर चट करते रहेंगे और इससे कहीं न कहीं छग को ही नुकसान होगा। जाहिर सी बात है, ऐसे हालात में प्रतिभा पलायन भी होगा।
दरअसल, नकल का मामला एक बार फिर इसलिए गरमा गया है, क्योंकि पीडब्ल्यूडी सब इंजीनियर के लिए ली जाने वाली भर्ती परीक्षा में भी नकल के प्रकरण बने हैं और कई नकलची पकड़े गए हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कही गई है, मगर इतने भर से काम चलने वाला नहीं है, क्योंकि नकलचियों पर सख्ती नहीं बरतने का ही परिणाम है कि प्रतिभाओं का दम तोड़ने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। नकल को कहीं न कहीं हम नौकरी पाने तथा किसी परीक्षा में सफल होने के लिए ‘चोर दरवाजा’ ही मान सकते हैं। नकल के कारण प्रदेश की प्रतिभाएं ज्यादा बदनाम होती हैं, क्योंकि जब वे बाहर शिक्षा के लिए जाती हैं तो उन्हें हमेशा कमतर आंका जाता है, जिसका खामियाजा उन्हें अपने कॅरियर निर्माण में भी भुगतना पड़ता है। समय-समय पर सरकार तथा शासन में बैठे लोग भी स्वीकारते हैं, लेकिन नकल पर रोक लगाने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए जाते। लिहाजा, यह कृत्य रह-रहकर पुरानी बोतल से बाहर आते रहते हैं। नकल की दुष्प्रवृत्ति के घातक परिणाम से शिक्षाविद् आगाह भी करते हैं, लेकिन जिस तरह के हालात बनते जा रहे हैं, उससे तो लगता है कि नकल की प्रवृत्ति, एक तबके के खून में समा गई है, क्योंकि उन्हें अपनी वैतरणी पार लगाने के लिए कोई दूसरा सहारा नजर नहीं आता। कहीं न कहीं, पीडब्ल्यूडी की परीक्षा में नकल का मामला सामने आने से प्रदेश की परीक्षा तथा शिक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर कालिख पूत गई है।
ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नकल के मामले पहली बार सामने आए हैं। कुछ बरसों की स्थिति को देखें तो प्रदेश में नकल की प्रवृत्ति ने व्यापक पैमाने पर पैर पसार लिया है। यही राज्य है, जहां बारहवीं व दसवी की बोर्ड परीक्षा की मेरिट सूची में गड़बड़ हो गई। इस प्रकरण से शिक्षा प्रणाणी तथा परीक्षा में बरती गई लापरवाही को लेकर प्रदेश का काफी छिछालेदर हुआ था। उससे पहले पीएससी की परीक्षा भी विवादों में रही है। इन मामलों के मध्य पर नजर डालें तो यही राज्य है, जहां पिछले साल प्री-पीएमटी की परीक्षा तीन बार आयोजित हुई। पीएमटी परीक्षा में फर्जीवाड़े ने सरकार को हिलाकर रख दिया, क्योंकि बिलासपुर जिले के तखतपरु में फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद कई नामचीन लोगों के नाम आए, जिन्होंने अपने बेटे-बेटियों को परीक्षा पास कराने लाखों रूपये दिए थे। फिलहाल इस मामले में पुलिस जांच कर रही है, कुछ परीक्षार्थी पुलिस के हत्थे चढ़ गए हैं तो कुछ अपने रसूख तथा भूमिगत होने के कारण बचे हुए हैं। कई को कोर्ट से जमानत भी मिल गई है।
कुल-मिलाकर कहना यही है कि प्रदेश की शिक्षा की नींव, नकल के कारण कमजोर हो रही है। इसे मजबूत बनाने के लिए नकल माफिया से प्रदेश को बचाना होगा। शिक्षा के क्षेत्र में सतत् विकास हो रहा है, मगर जिस तरह नकल के सहारे तथा शॉर्टकट आजमाने की करतूत बढ़ती जा रही है। इसे विकास पथ पर अग्रसर प्रदेश के लिए बेहतर नहीं कहा जा सकता है। नकल पर लगाम लगाने के लिए सरकार को ध्यान देना होगा। प्रदेश के कई जिले हैं, जहां के प्रतिभावान छात्र इसलिए भी शंका की नजर से देखे जाते हैं कि वे उस जिले से ताल्लुक रखते हैं, जहां नकल की शिकायतें हैं। यहीं पर प्रतिभाओं का मनोबल टूटता है। ऐसी स्थिति में कहीं न कहीं सरकार और उनकी नीति जिम्मेदार मानी जा सकती है, क्योंकि देश, प्रदेश तथा समाज के हित में रोड़ा बन रही ‘नकल’ पर सरकार कहां रोक लगा पा रही है ? यदि ऐसा नहीं होता तो रह-रहकर नकल के मामले उजागर नहीं होते। सरकार की ढिलाई का ही नतीजा है कि ऐसे कृत्यों को बल मिल रहा है। आशा है कि सरकार, इस दिशा में सख्त निर्णय लेगी और प्रदेश की प्रतिभाओं को आगे लाने प्रयास करेगी, क्योंकि विकास के लिए शिक्षा की अहम भूमिका है, किन्तु ‘नकल’ बड़ा रोड़ा बनती जा रही है।

रविवार, 4 दिसंबर 2011

महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकार

केन्द्र में सत्ता पर बैठी कांग्रेसनीत यूपीए सरकार चाहे जितनी अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन महंगाई व भ्रष्टाचार के कारण सरकार जनता की अदालत में पूरी तरह कटघरे में खड़ी है। ठीक है, अभी लोकसभा चुनाव को ढाई से तीन साल शेष है, किन्तु सरकार को जनता विरोधी कार्य करने से बाज आना चाहिए। महंगाई ने तो पहले ही लोगों की कमर तोड़कर रख दी थी। फिर भी सरकार का रवैया नकारात्मक ही रहा और महंगाई की मार कम हो ही नहीं रही है। सरकार में बैठे सत्ता के मद में चूर कारिंदों के ऐसे बयान आते रहे, जिससे महंगाई नई उंचाईयां छूती रही।
कृषिमंत्री शरद पवार के बयान ही हमेशा ऐसे रहे, जिससे जमाखोरों को लाभ मिले। जरूरी चीजों की बाजार में कमी होने की बात का खुलासा होने के बाद कालाबाजारी शुरू हो जाती। बाजार में सामग्री की अनुपब्धता के कारण दर में बढ़ोतरी हो जाती। इसका सीधा फायदे उन जमाखोरों को मिलता था, जिनके हित में मंत्री जी बयान देते नजर आते थे। महंगाई के कारण सरकार के प्रति लोगों में गुस्सा है और समय-समय पर वे अपना आक्रोश जताते भी हैं। हालांकि जनता को यह भी पता है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत वोट की है, जिसके दम पर आम जन विरोधी सरकार को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। देश में महंगाई चरम पर है, सड़क से संसद तक लड़ाई हो रही है, मगर सरकार पर कोई फर्क पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। सरकार में बैठे लोग महंगाई का कारण कभी ग्लोबलाइजेन को बताते हैं तो कभी चीजों के बेतहाशा उपयोग को। महंगाई से निपटने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ने की बात कहने से सरकार बाज नहीं आती, फिर भी हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी असहाय हो गए हैं।
बढ़ती महंगाई को लेकर सरकार के प्रति कितना गुस्सा है, वह पिछले दिनों देखने को मिला, जब एक व्यक्ति ने कृषि मंत्री शरद पवार को थप्पड़ जड़ दिया। सत्तासीन लोगों ने इसे एक सनकी युवक का किया-धरा करार दिया, लेकिन उन्हें इतना स्वीकारना चाहिए कि कहीं न कहीं महंगाई के कारण आम जनता के दिलों में आग तो लगी ही है ? उसी का परिणाम है कि कुछ लोग इस हद तक विरोध करने उतारू हो जा रहे हैं। लोकतंत्र में निश्चित ही यह तरीका गलत है, लेकिन सरकार, जनता के हितों पर किस तरह कुठाराघात कर रही है, इस बारे में भी सोचने की जरूरत है। सरकार तो किसी की सुनने को तैयार नहीं है, विपक्ष जो कहना चाहे, कह ले, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। यही कारण है कि पिछली बार की तरह इस बार भी संसद की कार्रवाई, मनमानी की भेंट चढ़ रही है। सरकार की मनमौजी प्रवृत्ति भी इसके लिए जिम्मेदार है। संसद के एक दिन की कार्रवाई में करोड़ों खर्च किए जाते हैं, यह जनता का पैसा है। इसलिए सरकार को कोई न कोई रास्ता निकालना चाहिए, जिससे संसद भी चले और आम जनता के हितें भी प्रभावित न हो। संसद में अभी जो चल रहा है, उससे आम जनता का ही बिगड़ेगा, क्योंकि संसद चले, चाहे मत चले, सांसदों को क्या लेना-देना, उन्हें जो तय रकम दी जानी चाहिए, वह तो उन्हें मिलनी ही है। जनता द्वारा टैक्स के रूप में दिया गया पैसा ही बर्बाद होगा।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा, भ्रष्टाचार का है। यूपीए-2 का कार्यकाल भ्रष्टाचार के लिए ही पहचाना जाएगा और विपक्ष यह आरोप भी लगाते आ रहे हैं कि आजाद भारत की यह सबसे भ्रष्ट सरकार है ? बीते डेढ़-दो साल में एक-एक कर भ्रष्टाचार का जिन्न ऐसे निकला, जैसे बरसों से एक पुरानी बोतल में कैद हो। सरकार में शामिल कई मंत्री, सांसद तथा विपक्ष के अन्य नेताओं को भ्रष्टाचार के कारण जेल की हवा खानी पड़ी है। लिहाजा यूपीए-2 सरकार की किरकिरी हुई है, क्योंकि कॉमनवेल्थ, टूजी-स्पेक्ट्रम, इसरो समेत अन्य कई घोटालें सामने आए हैं, जिससे दूसरी बात लगातार सत्ता में आई सरकार की छवि धूमिल हुई है। भ्रष्टाचार के मामले में सरकार द्वारा पहले कार्रवाई करने आनाकानी की गई, लेकिन विपक्ष के बढ़ते दबाव के कारण कार्रवाई हुई। ये अलग बात है कि कार्रवाई करने को लेकर सरकार, बाद में अपनी पीठ खुद ही थपथपाती नजर आई।
केन्द्र की यूपीए सरकार, महंगाई तथा भ्रष्टाचार के मामले से उबर नहीं पाई थी। इसके बाद सरकार को क्या सुझी कि एफडीआई ( खुदरा व्यापार ) के लिए विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए खुली छूट देने की नीति बना दी गई। सरकार ने देश में बिना जनमत तैयार किए ही कैबिनेट में निर्णय ले लिया। इसके बाद एफडीआई के कारण देश में जो आग लगी है, उसके बाद सरकार संभल नहीं पा रही है। कहा, यहां तक जा रहा है कि सरकार, विरोध के कारण इस निर्णय को वापस ले सकती है ? आलम यह है कि कांग्रेस से जुड़े लोग ही खिलाफ में उतर गए हैं। उनके अपने ही उनकी नीति पर उंगली उठाए, ऐसे में सरकार किस तरह और कैसे काम कर रही है, यह तो समझ में आता ही है। सरकार कहती है कि एफडीआई से देश में विकास को बल मिलेगा, नई तकनीक का लाभ मिलेगा। साथ ही कम दर पर सामग्री मिलेगी, मगर सवाल यही है कि जब ये विदेशी कंपनी लाभ कमाएंगी तो फिर देश में छोटी-छोटी दुकान के सहारे अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले लोग, आखिर जाएंगे तो जाएंगे कहां ? वैसे ही देश में बेकारी व गरीबी छाई है। सरकार ने गरीबी की एक नई लकीर खींच दी है। जितनी राशि के आंकड़े बताकर गरीबी की परिभाषा दी गई है, उस पर वही नीति-नियंता, जिंदगी बिता कर बता दे ?
कुछ भी हो, यूपीए-2 के कार्यकाल में कुछ भी अच्छा नहीं हुआ है, पूरे तीन दो बरसों से यह सरकार विवादों में है। महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। भ्रष्टाचार की सुरंगे खत्म ही नहीं हो रही है। फिर भी सरकार का रवैया, जनोन्मुखी नहीं दिखती। भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले राहुल गांधी को किसानों की हालत देखकर गुस्सा आता है, लेकिन देश में छाई गरीबी, महंगाई तथा भ्रष्टाचार के प्रतिरूप दानवों को देखकर उन्हें गुस्सा क्यों नहीं आता ? देश में बरसों तक कांग्रेस सत्ता में रही है और जैसा चाहती, वैसा करती रही। कोई विपक्ष उंगली करने के लिए भी नहीं था। फिर भी गरीब वहीं के वहीं रहे और आज भी हैं। ऐसे में किसान व गरीबों की दुहाई, महज राजनीति व लफ्फाजी ही नजर आती है, क्योंकि सरकार को आम जनता की इतनी ही फिक्र होती तो बार-बार आवश्वक वस्तुओं के दाम नहीं बढ़ाती। पेट्रोल-डीजल की दर जब मन कर रही है, बढ़ा दे रही है। इससे परिवहन पर असर पड़ रहा है और उसका महंगाई पर। सरकार अपने माथे पर महंगाई की तोहमत रखना नहीं चाहती, इसलिए हर बार किसी न किसी के सिर पर महंगाई का ठिकरा फोड़ देती है और खुद को बेचारी बताने से नहीं चुकती। अब क्यों इस सरकार की, ये जनता ही बताएगी, आने वाले चुनाव में।