1. समारू - शालेय खेलों में सरकारी स्कूल फिसड्डी बताए जा रहे हैं।
पहारू - पहले कौन से, तारे तोड़ने का काम हुआ है।
2. समारू - जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला ने ट्विटर का इस्तेमाल बंद नहीं करने का ऐलान किया है।
पहारू - ऐसी अकड़पन में शशि थरूर अपनी केन्द्रीय मंत्री की कुर्सी गंवा चुके हैं।
3. समारू - 18 केन्द्रीय मंत्रियों ने अपनी संपत्ति छुपाई है।
पहारू - राज खुल गया तो फिर...।
4. समारू - केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री डा. चरणदास महंत, मीडिया में छाए हुए हैं।
पहारू - पद में नहीं थे, उन हासिए के दिनों...।
5. समारू - छग सरकार अभी कुछ नए कानून बना रही है।
पहारू - लागू होने के बाद पालन हो, तब ना।
शुक्रवार, 2 सितंबर 2011
टेढ़ी नजर
1. समारू - मीडिया, अन्ना-अन्ना अब भी चिल्ला रहा है।
पहारू - कुर्ता फाड़ के टीआपी जो मिली है।
2. समारू - मनरेगा में अनियमितता बढ़ी है।
पहारू - गांधी के मुस्कुराते चेहरे की हरियाली का कमाल है।
3. समारू - शर्मिला ने ‘हजारे’ से समर्थन मांगा है।
पहारू - मीडिया से पहले समर्थन मांगना पड़ेगा।
4. समारू - छग में इंजीनियरिंग छात्रों के पढ़ाई छोड़ने की खबर है।
पहारू - बदहाली रहेगी, तो आगे भी ऐसा ही चलता रहेगा।
5. समारू - छग सरकार ने सामान्य सभा की बैठक की अनिवार्यता तय की है।
पहारू - फिर तो परिषद में घमासान अधिकतर देखने को मिलेगा।
पहारू - कुर्ता फाड़ के टीआपी जो मिली है।
2. समारू - मनरेगा में अनियमितता बढ़ी है।
पहारू - गांधी के मुस्कुराते चेहरे की हरियाली का कमाल है।
3. समारू - शर्मिला ने ‘हजारे’ से समर्थन मांगा है।
पहारू - मीडिया से पहले समर्थन मांगना पड़ेगा।
4. समारू - छग में इंजीनियरिंग छात्रों के पढ़ाई छोड़ने की खबर है।
पहारू - बदहाली रहेगी, तो आगे भी ऐसा ही चलता रहेगा।
5. समारू - छग सरकार ने सामान्य सभा की बैठक की अनिवार्यता तय की है।
पहारू - फिर तो परिषद में घमासान अधिकतर देखने को मिलेगा।
गुरुवार, 1 सितंबर 2011
भारतीय शिक्षा में खामियों की बढ़ती खाई
यह तो सही है कि भारत में न पहले प्रतिभाओं की कमी रही और न ही अब है। पुरातन समय से ही यहां की शिक्षा व्यवस्था की अपनी एक साख रही है। कहा भी जाता है, जब शून्य की खोज नहीं हुई रहती तो फिर हम आज जो वैज्ञानिक युग का आगाज देख रहे हैं, वह कहीं नजर नहीं आता। भारत में विदेशों से भी प्रतिभाएं अध्ययन के लिए आया करते थे, मगर आज हालात बदले हुए हैं। स्थिति उलट हो गई है। भारत से प्रतिभाएं पलायन कर रही हैं, उन्हें नस्लभेद का जख्म भी मिल रहा है, लेकिन यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। यहां कहना है कि आखिर आज परिस्थिति इतनी विकट क्यों हो गई ? कभी जहां की शिक्षा का दुनिया भर लोहा माना जाता था।
वैदिक युग से लेकर अब तक भारत ने इस बात को सिद्ध कर दिखाया है कि यहां प्रतिभाओं में दुनिया से अलग कुछ कर-गुजरने का पूरा दमखम है। समय-समय पर इस बात को सिद्ध भी कर दिखाया है। इसे हम इस बात से जान सकते हैं कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी भारत की प्रतिभाएं छाई हुई हैं और सबसे अधिक वैज्ञानिक भारत से ही हैं। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जिनसे समझ मंे आता है कि भारत में शिक्षा की नींव काफी मजबूत रही है, मगर अभी ऐसा कुछ भी नहीं है। प्रतिभाएं, शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के कारण पूरी तरह दम तोड़ रही हैं और वे विदेशों में बेहतर भविष्य की चाह लिए पलायन करने मजबूर हैं। इसके लिए निश्चित ही हमारी शिक्षा नीति ही जिम्मेदार है। इस बात पर गहन विचार करने की जरूरत है।
भारतीय शिक्षा में तमाम तरह की खामियां हैं, जिसकी खाई में देश की प्रतिभाएं समाती जा रही हैं। स्कूली शिक्षा में जहां-तहां देश में आंकड़ों के लिहाज से बेहतर स्थिति के लिए सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन उच्च शिक्षा व तकनीकी शिक्षा में उनके सभी दावों की पोल खुलती नजर आती है। एक आंकड़े के अनुसार देश में हर बरस 22 करोड़ छात्र स्कूली शिक्षा ग्रहण करते हैं, या कहें कि बारहवीं की शिक्षा प्राप्त करते हैं। दूसरी ओर देश की उच्च शिक्षा में व्याप्त भर्राशाही व खामियों का इस बात से पता चलता है कि यही आंकड़े यहां 12 से 15 फीसदी के रह जाते हैं। कहने का मतलब मुट्ठी भर छात्र ही उच्च शिक्षा की दहलीज पर चढ़ पाते हैं। ऐसी स्थिति में विदेशों में पढ़ने की चाहत छात्रों में बढ़ जाती है, क्योंकि वहां कॅरियर निर्माण की व्यापक संभावनाएं नजर आती हैं।
देश में कुछ प्रतिभाएं ऐसी भी रहती हैं, जो चाहती हैं कि वो पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत में ही अपनी उर्जा लगाए, लेकिन यहां हालात उलटे पड़ जाते हैं। उन्हें पर्याप्त संसाधन मुहैया नहीं होता, लिहाजा वे मन मसोसकर यहां पलायन करने में ही समझदारी दिखाते हैं। भारत से हर साल लाखों छात्र पढ़ाई के लिए विदेशी धरती पर जाते हैं, उनमें से अधिकतर वहीं अपना कॅरियर बना लेते हैं। देखा जाए तो अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड समेत कुछ और देश हैं, जहां भारतीय छात्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते हैं। वैसे दर्जन भर देश हैं, जो भारतीय छात्र दिलचस्पी दिखाते हैं, मगर अमेरिका व आस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड जैसे देश मुख्य खैरख्वाह बने हुए हैं।
बीते साल आस्ट्रेलिया में नस्लभेद के नाम पर भारतीय छात्रों पर कई हमले हुए। इन घटनाओं के बाद आस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों की संख्या में बेतहाशा कमी आई है, लेकिन अंततः प्रतिभा पलायन के आंकड़ों पर गौर फरमाए तो स्थिति कुछ बदली हुई नजर नहीं आती है, क्योंकि इतने छात्र दुनिया के अन्य देशों की ओर उन्मुख हो गए।
भारतीय शिक्षा में व्याप्त खामियों एक बात से और उजागर होती है कि देश में करीब छह सौ विश्वविद्यालय हैं। यहां पर जैसा शैक्षणिक माहौल निर्मित होना चाहिए या कहें कि व्यवस्था में सुधार होना चाहिए, वह नहीं होने से प्रतिभाओं को उस तरीके से विकास नहीं हो पाता और न ही वे पढ़ाई में अपनी प्रतिभा का जौहर दिखा पाते हैं, जिस तरह विदेशी विश्वविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था में देखी जाती है।
हमारा दुर्भाग्य देखिए कि दुनिया में गुणवत्ता व मापदंड वाले 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। अमेरिका व इंग्लैण्ड ही इस सूची में छाए हुए हैं। भारत के लिए विचार करने की जरूरत है कि पहले 20 विश्वविद्यालयों में अधिकांशतः अमेरिका के ही हैं। हम अपनी पुरातन शिक्षा व्यवस्था पर जितना भी गर्व कर लें, इठला लें, मगर आज हमें इत बात का स्वीकारना पड़ेगा कि कहीं न कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था में खामियां हैं, जहां व्यापक स्तर पर सुधार किए जाने की जरूरत है। सोचने वाली बात है कि केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल का, पिछले साल बयान आया था कि देश में 300 विश्वविद्यालय और खोले जाएंगे। इसका मुख्य ध्येय उच्च शिक्षा का विकेन्द्रीकरण करना था। अंतिम तबके के छात्रों तक उच्च शिक्षा की पहुंच बनानी थी, मगर सवाल यह है कि पहले जो विश्वविद्यालय देश में बरसों से संचालित हैं, पहले उनकी हालत तो सुधारा जाए। जब उन्हीं स्थिति बदहाल रहेगी, उसमें भी और विश्वविद्यालय लादने का भला क्या मतलब हो सकता है ? फिलहाल ये विश्वविद्यालय नहीं खोले गए हैं और इसकी प्रक्रिया की सुगबुगाहट की खबर भी नहीं है। हमारा कहना यही है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में नीचले स्तर अर्थात स्कूली शिक्षा से सुधार किया जाए तो इसके सार्थक परिणाम सामने आएंगे। इस बात को समझना होगा कि जब तक हमारी नींव मजबूत नहीं होगी, हम उच्च शिक्षा में जैसा परचम लहराना चाहते हैं, वैसा कुछ नहीं कर सकते।
एक अन्य खामियां तकनीकी शिक्षा अर्थात इंजीनियरिंग की शिक्षा में हैं। देश में हर बरस करीब 3 लाख इंजीनियरिंग छात्र पास आउट होते हैं, मगर एक आंकड़ें की मानें तो महज 10 प्रतिशत छात्र ही नौकरी के काबिल होते हैं। यह भी हमारी इंजीनियरिंग शिक्षा के लिए बहुत बड़ा सवाल है ? आखिर कैसी शिक्षा दी जा रही है, जिससे छात्रों की काबिलियत ही कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। यही कारण है कि जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर छात्र आते हैं तो उनमें से अधिकतर को बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ती है। इस स्थिति से भी निपटने के लिए सरकार को तकनीकी शिक्षा में भी सुधार के लिए हर स्तर पर प्रयास करना चाहिए, क्योंकि यही ढर्रा आगे भी चलता रहेगा कि तो यह हमारे शिक्षा की सेहत व भविष्य निर्माण के लिए बेहतर नहीं होगा।
इन खामियों की खाई को हमें कैसे पाटना है और इसके लिए कैसी नीति बनाई जाए, इस दिशा में अभी से सरकार को विशेष कदम उठाना होगा। नहीं तो, देश से प्रतिभा पलायन करती रहेंगी। हम इस बात से ही खुश होते हैं कि अमुक भारतीय वैज्ञानिक या छात्र ने विदेश पर उपलब्धि का झण्डा गाड़ रहा है। यहां अपनी छाती चौड़ी करने को हमें कोई हक नहीं बनता, क्योंकि उन प्रतिभाओं को मंच देने में नाकामयाब रहे। निश्चित ही इस समय कहीं न कहीं हमारी साख पर बट्टा लगेगा। यह तो गहन विचार का विषय है।
भारतीय शिक्षा में तमाम तरह की खामियां हैं, जिसकी खाई में देश की प्रतिभाएं समाती जा रही हैं। स्कूली शिक्षा में जहां-तहां देश में आंकड़ों के लिहाज से बेहतर स्थिति के लिए सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन उच्च शिक्षा व तकनीकी शिक्षा में उनके सभी दावों की पोल खुलती नजर आती है। एक आंकड़े के अनुसार देश में हर बरस 22 करोड़ छात्र स्कूली शिक्षा ग्रहण करते हैं, या कहें कि बारहवीं की शिक्षा प्राप्त करते हैं। दूसरी ओर देश की उच्च शिक्षा में व्याप्त भर्राशाही व खामियों का इस बात से पता चलता है कि यही आंकड़े यहां 12 से 15 फीसदी के रह जाते हैं। कहने का मतलब मुट्ठी भर छात्र ही उच्च शिक्षा की दहलीज पर चढ़ पाते हैं। ऐसी स्थिति में विदेशों में पढ़ने की चाहत छात्रों में बढ़ जाती है, क्योंकि वहां कॅरियर निर्माण की व्यापक संभावनाएं नजर आती हैं।
देश में कुछ प्रतिभाएं ऐसी भी रहती हैं, जो चाहती हैं कि वो पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत में ही अपनी उर्जा लगाए, लेकिन यहां हालात उलटे पड़ जाते हैं। उन्हें पर्याप्त संसाधन मुहैया नहीं होता, लिहाजा वे मन मसोसकर यहां पलायन करने में ही समझदारी दिखाते हैं। भारत से हर साल लाखों छात्र पढ़ाई के लिए विदेशी धरती पर जाते हैं, उनमें से अधिकतर वहीं अपना कॅरियर बना लेते हैं। देखा जाए तो अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड समेत कुछ और देश हैं, जहां भारतीय छात्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते हैं। वैसे दर्जन भर देश हैं, जो भारतीय छात्र दिलचस्पी दिखाते हैं, मगर अमेरिका व आस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड जैसे देश मुख्य खैरख्वाह बने हुए हैं।
बीते साल आस्ट्रेलिया में नस्लभेद के नाम पर भारतीय छात्रों पर कई हमले हुए। इन घटनाओं के बाद आस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों की संख्या में बेतहाशा कमी आई है, लेकिन अंततः प्रतिभा पलायन के आंकड़ों पर गौर फरमाए तो स्थिति कुछ बदली हुई नजर नहीं आती है, क्योंकि इतने छात्र दुनिया के अन्य देशों की ओर उन्मुख हो गए।
भारतीय शिक्षा में व्याप्त खामियों एक बात से और उजागर होती है कि देश में करीब छह सौ विश्वविद्यालय हैं। यहां पर जैसा शैक्षणिक माहौल निर्मित होना चाहिए या कहें कि व्यवस्था में सुधार होना चाहिए, वह नहीं होने से प्रतिभाओं को उस तरीके से विकास नहीं हो पाता और न ही वे पढ़ाई में अपनी प्रतिभा का जौहर दिखा पाते हैं, जिस तरह विदेशी विश्वविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था में देखी जाती है।
हमारा दुर्भाग्य देखिए कि दुनिया में गुणवत्ता व मापदंड वाले 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। अमेरिका व इंग्लैण्ड ही इस सूची में छाए हुए हैं। भारत के लिए विचार करने की जरूरत है कि पहले 20 विश्वविद्यालयों में अधिकांशतः अमेरिका के ही हैं। हम अपनी पुरातन शिक्षा व्यवस्था पर जितना भी गर्व कर लें, इठला लें, मगर आज हमें इत बात का स्वीकारना पड़ेगा कि कहीं न कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था में खामियां हैं, जहां व्यापक स्तर पर सुधार किए जाने की जरूरत है। सोचने वाली बात है कि केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल का, पिछले साल बयान आया था कि देश में 300 विश्वविद्यालय और खोले जाएंगे। इसका मुख्य ध्येय उच्च शिक्षा का विकेन्द्रीकरण करना था। अंतिम तबके के छात्रों तक उच्च शिक्षा की पहुंच बनानी थी, मगर सवाल यह है कि पहले जो विश्वविद्यालय देश में बरसों से संचालित हैं, पहले उनकी हालत तो सुधारा जाए। जब उन्हीं स्थिति बदहाल रहेगी, उसमें भी और विश्वविद्यालय लादने का भला क्या मतलब हो सकता है ? फिलहाल ये विश्वविद्यालय नहीं खोले गए हैं और इसकी प्रक्रिया की सुगबुगाहट की खबर भी नहीं है। हमारा कहना यही है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में नीचले स्तर अर्थात स्कूली शिक्षा से सुधार किया जाए तो इसके सार्थक परिणाम सामने आएंगे। इस बात को समझना होगा कि जब तक हमारी नींव मजबूत नहीं होगी, हम उच्च शिक्षा में जैसा परचम लहराना चाहते हैं, वैसा कुछ नहीं कर सकते।
एक अन्य खामियां तकनीकी शिक्षा अर्थात इंजीनियरिंग की शिक्षा में हैं। देश में हर बरस करीब 3 लाख इंजीनियरिंग छात्र पास आउट होते हैं, मगर एक आंकड़ें की मानें तो महज 10 प्रतिशत छात्र ही नौकरी के काबिल होते हैं। यह भी हमारी इंजीनियरिंग शिक्षा के लिए बहुत बड़ा सवाल है ? आखिर कैसी शिक्षा दी जा रही है, जिससे छात्रों की काबिलियत ही कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। यही कारण है कि जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर छात्र आते हैं तो उनमें से अधिकतर को बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ती है। इस स्थिति से भी निपटने के लिए सरकार को तकनीकी शिक्षा में भी सुधार के लिए हर स्तर पर प्रयास करना चाहिए, क्योंकि यही ढर्रा आगे भी चलता रहेगा कि तो यह हमारे शिक्षा की सेहत व भविष्य निर्माण के लिए बेहतर नहीं होगा।
इन खामियों की खाई को हमें कैसे पाटना है और इसके लिए कैसी नीति बनाई जाए, इस दिशा में अभी से सरकार को विशेष कदम उठाना होगा। नहीं तो, देश से प्रतिभा पलायन करती रहेंगी। हम इस बात से ही खुश होते हैं कि अमुक भारतीय वैज्ञानिक या छात्र ने विदेश पर उपलब्धि का झण्डा गाड़ रहा है। यहां अपनी छाती चौड़ी करने को हमें कोई हक नहीं बनता, क्योंकि उन प्रतिभाओं को मंच देने में नाकामयाब रहे। निश्चित ही इस समय कहीं न कहीं हमारी साख पर बट्टा लगेगा। यह तो गहन विचार का विषय है।
बुधवार, 31 अगस्त 2011
टेढ़ी नजर
1. समारू - कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी स्टैंडिंग कमेटी से नाम वापस ले लिया था।
पहारू - और कितनी अपनी फजीहत कराएगा, पहले ही कड़वी जुबान बोलकर मुंह की खा चुका है।
2. समारू - कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी स्वास्थ्य लाभ लेकर आने वाली हैं।
पहारू - अब उन्हें कांग्रेस की बिगड़ी तबियत ठीक करनी पड़ेगी।
3. समारू - मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को 1 लाख का चेक घूस देने भेजा गया है।
पहारू - स्पेक्ट्रम के बाद इन जैसे चेक की जरूरत ही कहां हो सकती है।
4. समारू - राज्यों में लोक सेवा की बहाली करने होड़ मची है।
पहारू - बरसों हो गए कानून लागू हुए, अब तक क्यों सोए बैठे थे।
5. समारू - छग सरकार ने सरकारी शिक्षक के ट्यूशन पर बैन लगा दिया है।
पहारू - और स्कूल पहुंचने, कोताही बरतने पर कब लगाम लगेगी।
पहारू - और कितनी अपनी फजीहत कराएगा, पहले ही कड़वी जुबान बोलकर मुंह की खा चुका है।
2. समारू - कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी स्वास्थ्य लाभ लेकर आने वाली हैं।
पहारू - अब उन्हें कांग्रेस की बिगड़ी तबियत ठीक करनी पड़ेगी।
3. समारू - मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को 1 लाख का चेक घूस देने भेजा गया है।
पहारू - स्पेक्ट्रम के बाद इन जैसे चेक की जरूरत ही कहां हो सकती है।
4. समारू - राज्यों में लोक सेवा की बहाली करने होड़ मची है।
पहारू - बरसों हो गए कानून लागू हुए, अब तक क्यों सोए बैठे थे।
5. समारू - छग सरकार ने सरकारी शिक्षक के ट्यूशन पर बैन लगा दिया है।
पहारू - और स्कूल पहुंचने, कोताही बरतने पर कब लगाम लगेगी।
टेढ़ी नजर
1. समारू - बस्तर दशहरे पर 25 लाख का कर्ज की खबर है।
पहारू - छत्तीसगढ़ में होने वाले अधिकांश महोत्सव का यही हाल है।
2. समारू - छग में भाजपा सरकार विधानसभा में घिर रही है।
पहारू - सुस्त विपक्ष को बैठे-ठाले मुद्दे जो मिल जाते हैं।
3. समारू - राजीव गांधी की हत्या की सजा प्राप्त तीन व्यक्तियों की पैरवी राम जेठमलानी कर रहे हैं।
पहारू - ऐसी रिस्क वे लेते रहते हैं, भले ही भाजपा से फटकार ही मिलें।
4. समारू - शांति भूषण मामले की सीडी में छेड़छाड़ नहीं होने का खुलासा जांच में हुआ है।
पहारू - वे ‘शांति’ से यही कह रहे हैं, यह किसी की साजिश है।
5. समारू - डाक्टर बन गए हैं, भारतीय क्रिकेट को उंचाई तक पहुंचाने वाले महेन्द्र सिंह धोनी।
पहारू - उपलब्धि के पीछे कौन नहीं भागता, तभी तो बिना पढ़े बन गए डाक्टर।
पहारू - छत्तीसगढ़ में होने वाले अधिकांश महोत्सव का यही हाल है।
2. समारू - छग में भाजपा सरकार विधानसभा में घिर रही है।
पहारू - सुस्त विपक्ष को बैठे-ठाले मुद्दे जो मिल जाते हैं।
3. समारू - राजीव गांधी की हत्या की सजा प्राप्त तीन व्यक्तियों की पैरवी राम जेठमलानी कर रहे हैं।
पहारू - ऐसी रिस्क वे लेते रहते हैं, भले ही भाजपा से फटकार ही मिलें।
4. समारू - शांति भूषण मामले की सीडी में छेड़छाड़ नहीं होने का खुलासा जांच में हुआ है।
पहारू - वे ‘शांति’ से यही कह रहे हैं, यह किसी की साजिश है।
5. समारू - डाक्टर बन गए हैं, भारतीय क्रिकेट को उंचाई तक पहुंचाने वाले महेन्द्र सिंह धोनी।
पहारू - उपलब्धि के पीछे कौन नहीं भागता, तभी तो बिना पढ़े बन गए डाक्टर।
मंगलवार, 30 अगस्त 2011
टेढ़ी नजर
1. समारू - पाकिस्तान की विदेश मंत्री ‘हीना रब्बानी’ भारत यात्रा पर आई हैं।
पहारू - ऐसा लगता है, मीडिया में बहार आ गई है।
2.समारू - खबर है, बंगलौर में प्लास्टिक से सड़क बनाई गई है।
पहारू - यहां तो सड़कें नहीं, गड्ढों में प्लास्टिक पड़ी मिलती हैं।
3.समारू - फिल्म अभिनेता ओमपुरी ने सांसदों को अनपढ़ व गंवार कहा।
पहारू - अब सांसद, इसे उनकी सनक करार दे रहे हैं।
4.समारू - अन्ना, अब चुनाव सुधार पर आंदोलन करने वाले हैं।
पहारू - पहले अवाम को वोट की अहमियत बतानी पड़ेगी।
5.समारू - स्वामी अग्निवेश की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं।
पहारू - मुश्किलें भी आती हैं तो चारों ओर से।
पहारू - ऐसा लगता है, मीडिया में बहार आ गई है।
2.समारू - खबर है, बंगलौर में प्लास्टिक से सड़क बनाई गई है।
पहारू - यहां तो सड़कें नहीं, गड्ढों में प्लास्टिक पड़ी मिलती हैं।
3.समारू - फिल्म अभिनेता ओमपुरी ने सांसदों को अनपढ़ व गंवार कहा।
पहारू - अब सांसद, इसे उनकी सनक करार दे रहे हैं।
4.समारू - अन्ना, अब चुनाव सुधार पर आंदोलन करने वाले हैं।
पहारू - पहले अवाम को वोट की अहमियत बतानी पड़ेगी।
5.समारू - स्वामी अग्निवेश की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं।
पहारू - मुश्किलें भी आती हैं तो चारों ओर से।
शनिवार, 20 अगस्त 2011
अन्ना, अनशन और सरकार
भ्रष्टाचार के भस्मासुर को भस्म करने के लिए समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद ऐसा लगता है, जैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में भूचाल आ गया है और करोड़ों लोग सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। अन्ना के आंदोलन के बाद केन्द्र की यूपीए सरकार भी बैकफुट पर है। इसके लिए सरकार की नीति-नियंता बने कुछ मंत्री जिम्मेदार माने जा सकते हैं, क्योंकि उनके गलत निर्णय के बाद ही अन्ना हजारे को देश भर में और ज्यादा समर्थन मिलने लगा। अहिंसक आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार ने जिन नीतियों पर काम किया और अनशन के लिए जाते समय अन्ना हजारे की घर से निकलते ही गिरफ्तारी की, उसके बाद देश भर में सरकार की कार्रवाई की थूं-थूं होने लगी। इसी का परिणाम रहा कि सात दिनों के लिए तिहाड़ जेल भेजे गए अन्ना को महज कुछ घंटे में रिहा करने के आदेश दे दिए गए, मगर अब तो बाजी अन्ना टीम के पाले में चली गई थी। लिहाजा अन्ना ने अपना पैतरा बदलते हुए जेल में ही रहकर अनशन करना शुरू कर दिया और करीब तीन दिन वे जेल में बिताए। जेल प्रशासन ने उन्हें रिहा कर दिया था, मगर सरकार की अनैतिक कार्रवाई के विरोध में वे जेल में भी अनशन करते रहे। अन्ना की जिस तरह की गांधीवादी व सरल छवि बरसों से देश में बनी हुई है, उसी के चलते हर वो नागरिक उनके जुड़ते चला जा रहा है, जो भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहता है।
वैसे अन्ना हजारे का जैसा नाम है, वैसे ही काम व समाज सुधार के लिए वे जाने जाते हैं। कई दशकों के अपने सामाजिक उत्थान के कार्यों के दौरान वे दर्जन भर से अधिक बार ‘अनशन’ कर चुके हैं और उन्हें हर बार सफलता मिली है। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव ‘सिद्ध’ से उनकी समाज सेवा की जो शुरूआत हुई, वह आज भी जारी है। महाराष्ट्र सरकार से इन कई दशकों में उनका कई बार ‘अनशन’ के माध्यम से दो-दो हाथ हो चुका है। सरकारी अधिकारी-कर्मचारियों की एक ही जगह पर तीन बरसों के भीतर दोबारा पदस्थापना नहीं करने की उनकी मांग पर महाराष्ट्र सरकार झुकी थी, वहीं मंत्रियों की खिलाफत में भी सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी। सूचना के अधिकार कानून के लिए भी उन्होंने अनशन किया था।
अन्ना हजारे के अब तक आंदोलनों पर नजर डालें तो पाते हैं कि उनके सभी आंदोलन गांधीवादी व अहिंसक रहे और लाखों-करोड़ों लोगों का उन्हें समर्थन मिला। अब वे मजबूत लोकपाल बिल अर्थात जनलोकपाल बिल लाने के लिए अनशन का सहारा ले रहे हैं, वह भी अहिंसक है। वे बार-बार देश की अवाम को यही कहते रहते हैं कि कोई भी परिस्थिति में हिंसा नहीं करनी है और न ही, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना है। इस बात का समर्थन उन्हें मिल भी रहा है। अन्ना के अनशन को कई दिन हो गए हैं, लेकिन देश में किसी भी जगह से ऐसी किसी हिंसा की बात सामने नहीं आई है। यह किसी भी आंदोलन की सफलती की कहानी कहती है। यही लड़ाई सरकार के लिए फजीहत बन गई और सरकार को न तो खाते बन रही है और न ही उगलते। सरकार ने अन्ना हजारे पर भ्रष्टाचार समेत अन्य गंभीर आरोप लगाए, मगर यह दांव उल्टा पड़ गया और अन्ना की आंधी के आगे सरकार ठिठक कर रह गई। जनता ने अन्ना का पूरा समर्थन किया और सरकार के कारिंदे एक-दूसरे को कोसते रहे कि अन्ना पर व्यक्तिगत हमला नहीं करना चाहिए था।
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह का भी इस विधेयक को लेकर ढुलमुल रवैया नजर आ रहा है। कभी वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री को भी इसके दायरे में आना चाहिए, फिर कैबिनेट की बैठक में मंत्रियों से मशविरा बाद यह बात कही जाती है कि सरकार को यह मंजूर नहीं कि जो लोकपाल बिल बने, उसके दायरे में प्रधानमंत्री भी आए। यहां हमारा यही कहना है कि आखिर यूपीए सरकार इतनी डरी-सहमी क्यों है ? जब उनके प्रधानमंत्री ईमानदार माने जाते हैं, ये अलग बात है कि उनके प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान आजाद भारत में सबसे अधिक भ्रष्टाचार हुए हैं। सरकार में बैठे मंत्री, खासकर वे जो जन लोकपाल बिल का विरोध कर रहे हैं, शायद उन्हें यह लगता होगा कि टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए. राजा ने प्रधानमंत्री की ओर उंगली उठाई है और यहां तक मुंह खोल दिया कि वे जो भी करते रहे, वह पहले से चलता आ रहा था तथा उसकी जानकारी प्रधानमंत्री को थी। इस बात का खुलासा होने के बाद शुतुरमुर्ग की तरह सोया विपक्ष के भी कान खड़े हो गए और वे प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़े करने लगे। विपक्ष के निशाने पर प्रधानमंत्री आ गए। यही बात है, जो शायद सरकार को डरा रही है, नहीं तो प्रधानमंत्री को दायरे में आखिर कैसी हिचक होनी चाहिए।
संविधान में कई फेरबदल की बात या अन्य पेचीदगियों का हवाला देकर प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल से बाहर रखने की बात पर जोर दे रहे हैं, किन्तु हमारा यही कहना है कि यही वह सरकार है, जो जनतंत्र की नींव मजबूत करने के लिए देश की जनता को 2005 में ‘सूचना का अधिकार’ कानून समर्पित करती है। जो आज हर जागरूक जनता का मजबूत हथियार है, जिसके बदौलत कई घपले भी उजागर हुए हैं और व्यूरोक्रेसी भी तिलमिलाई हुई है। इसे इसी बात से जाना जा सकता है कि इसी साल 8 आरटीआई ( सूचना के अधिकार ) कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई। खैर, सूचना का अधिकार के अलावा एक बात और है, जब हम संविधान को सर्वोच्च मानते हैं और चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री या उसके बाद वे अपनी संपत्ति की घोषणा कर एक मिसाल पेश करते हैं तो फिर खुद को लोकपाल के दायरे में लाने, हिचक क्यों ? यह एक ऐसा सवाल है, जिसे देश की जनता पूछ रही है।
अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल तथा संसद की स्टैंडिंग कमेटी के पास पहुंचा सरकारी लोकपाल बिल में वैसे मतभेद कई हैं, मगर तीन बातों पर प्रमुख रूप से मतभेद हैं। इनमें पहला प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की है, जो मांग अन्ना टीम ने की है, मगर सरकार इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। जनलोकपाल के ड्राफ्ट में ज्यूडिशरी को शामिल करने के साथ सांसदों से लेकर बड़े से छोटे अधिकारियों-कर्मचारियों को दायरे में लाने की अन्ना की टीम कवायद कर रही है। इस मामले में भी सरकार नहीं चाहती कि ज्यूडशरी, लोकपाल के दायरे में आए।
अब तो एक तीसरे लोकपाल बिल का ड्राफ्ट को तैयार किया गया है, वह है समाजसेवी अरूणा राय व उनकी टीम ने। इसे प्राइवेट प्रस्ताव रखकर संसद में पेश कराने की तैयारी है, हालांकि इसमें अन्ना हजारे की तरह जोर नहीं दिया गया है कि सरकार उनकी बात या ड्राफ्ट को स्वीकार करे। दूसरी अन्ना हजारे व उनकी टीम का कहना है कि वे जनलोकपाल बिल से कम कुछ नहीं चाहते। सरकार की ओर से अभी तक स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा जा रहा है, बस इतना कहा जाता है कि बातचीत के रास्ते खुल हैं और अन्ना टीम का भी बयान आता है कि वे भी बातचीत करने तैयार हैं, लेकिन आखिर यह पहल करने तो कौन ? किसी को तो आगे आना होगा, तभी बिल पर विचार-विमर्श हो सकेगा, नहीं तो ऐसा ही चलता रहेगा।
सरकार अकड़ी बैठी रहेगी और अन्ना, अपना अनशन जारी रखेंगे, जनता भी पल-पल पर नजर बनाए रखी हुई है। मीडिया भी लोगों की आंख-कान बने बैठा है। सवाल यह है कि आखिर बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन ? जनता तो चाहती है कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो, उन्हें यह नहीं मालूम हो कि इसके लिए कारगर ‘लोकपाल बिल’ कौन सा होगा ? अवाम की सोच यही है कि देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो और भ्रष्टाचारियों की कारगुजारियों पर लगाम लगे और कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत तरक्की करे। यह सही भी है कि देश के विकास को भ्रष्टाचार ने लील लिया है। भ्रष्टाचार कर विदेशो में धन जमा कराकर देश को खोखला किया जा रहा है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार मिटाने की एक आवाज पर देश की करोड़ों जनता सड़क पर उतर आई है। उसे यह मतलब नहीं कि कौन क्या चाहता है, सरकार क्या चाहती है। जनता को बस भ्रष्टाचार मुक्त भारत चाहिए, जिसके बाद उनकी खुशहाली व तरक्की की राह खुलती है।
अन्ना हजारे के अब तक आंदोलनों पर नजर डालें तो पाते हैं कि उनके सभी आंदोलन गांधीवादी व अहिंसक रहे और लाखों-करोड़ों लोगों का उन्हें समर्थन मिला। अब वे मजबूत लोकपाल बिल अर्थात जनलोकपाल बिल लाने के लिए अनशन का सहारा ले रहे हैं, वह भी अहिंसक है। वे बार-बार देश की अवाम को यही कहते रहते हैं कि कोई भी परिस्थिति में हिंसा नहीं करनी है और न ही, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना है। इस बात का समर्थन उन्हें मिल भी रहा है। अन्ना के अनशन को कई दिन हो गए हैं, लेकिन देश में किसी भी जगह से ऐसी किसी हिंसा की बात सामने नहीं आई है। यह किसी भी आंदोलन की सफलती की कहानी कहती है। यही लड़ाई सरकार के लिए फजीहत बन गई और सरकार को न तो खाते बन रही है और न ही उगलते। सरकार ने अन्ना हजारे पर भ्रष्टाचार समेत अन्य गंभीर आरोप लगाए, मगर यह दांव उल्टा पड़ गया और अन्ना की आंधी के आगे सरकार ठिठक कर रह गई। जनता ने अन्ना का पूरा समर्थन किया और सरकार के कारिंदे एक-दूसरे को कोसते रहे कि अन्ना पर व्यक्तिगत हमला नहीं करना चाहिए था।
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह का भी इस विधेयक को लेकर ढुलमुल रवैया नजर आ रहा है। कभी वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री को भी इसके दायरे में आना चाहिए, फिर कैबिनेट की बैठक में मंत्रियों से मशविरा बाद यह बात कही जाती है कि सरकार को यह मंजूर नहीं कि जो लोकपाल बिल बने, उसके दायरे में प्रधानमंत्री भी आए। यहां हमारा यही कहना है कि आखिर यूपीए सरकार इतनी डरी-सहमी क्यों है ? जब उनके प्रधानमंत्री ईमानदार माने जाते हैं, ये अलग बात है कि उनके प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान आजाद भारत में सबसे अधिक भ्रष्टाचार हुए हैं। सरकार में बैठे मंत्री, खासकर वे जो जन लोकपाल बिल का विरोध कर रहे हैं, शायद उन्हें यह लगता होगा कि टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए. राजा ने प्रधानमंत्री की ओर उंगली उठाई है और यहां तक मुंह खोल दिया कि वे जो भी करते रहे, वह पहले से चलता आ रहा था तथा उसकी जानकारी प्रधानमंत्री को थी। इस बात का खुलासा होने के बाद शुतुरमुर्ग की तरह सोया विपक्ष के भी कान खड़े हो गए और वे प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़े करने लगे। विपक्ष के निशाने पर प्रधानमंत्री आ गए। यही बात है, जो शायद सरकार को डरा रही है, नहीं तो प्रधानमंत्री को दायरे में आखिर कैसी हिचक होनी चाहिए।
संविधान में कई फेरबदल की बात या अन्य पेचीदगियों का हवाला देकर प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल से बाहर रखने की बात पर जोर दे रहे हैं, किन्तु हमारा यही कहना है कि यही वह सरकार है, जो जनतंत्र की नींव मजबूत करने के लिए देश की जनता को 2005 में ‘सूचना का अधिकार’ कानून समर्पित करती है। जो आज हर जागरूक जनता का मजबूत हथियार है, जिसके बदौलत कई घपले भी उजागर हुए हैं और व्यूरोक्रेसी भी तिलमिलाई हुई है। इसे इसी बात से जाना जा सकता है कि इसी साल 8 आरटीआई ( सूचना के अधिकार ) कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई। खैर, सूचना का अधिकार के अलावा एक बात और है, जब हम संविधान को सर्वोच्च मानते हैं और चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री या उसके बाद वे अपनी संपत्ति की घोषणा कर एक मिसाल पेश करते हैं तो फिर खुद को लोकपाल के दायरे में लाने, हिचक क्यों ? यह एक ऐसा सवाल है, जिसे देश की जनता पूछ रही है।
अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल तथा संसद की स्टैंडिंग कमेटी के पास पहुंचा सरकारी लोकपाल बिल में वैसे मतभेद कई हैं, मगर तीन बातों पर प्रमुख रूप से मतभेद हैं। इनमें पहला प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की है, जो मांग अन्ना टीम ने की है, मगर सरकार इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। जनलोकपाल के ड्राफ्ट में ज्यूडिशरी को शामिल करने के साथ सांसदों से लेकर बड़े से छोटे अधिकारियों-कर्मचारियों को दायरे में लाने की अन्ना की टीम कवायद कर रही है। इस मामले में भी सरकार नहीं चाहती कि ज्यूडशरी, लोकपाल के दायरे में आए।
अब तो एक तीसरे लोकपाल बिल का ड्राफ्ट को तैयार किया गया है, वह है समाजसेवी अरूणा राय व उनकी टीम ने। इसे प्राइवेट प्रस्ताव रखकर संसद में पेश कराने की तैयारी है, हालांकि इसमें अन्ना हजारे की तरह जोर नहीं दिया गया है कि सरकार उनकी बात या ड्राफ्ट को स्वीकार करे। दूसरी अन्ना हजारे व उनकी टीम का कहना है कि वे जनलोकपाल बिल से कम कुछ नहीं चाहते। सरकार की ओर से अभी तक स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा जा रहा है, बस इतना कहा जाता है कि बातचीत के रास्ते खुल हैं और अन्ना टीम का भी बयान आता है कि वे भी बातचीत करने तैयार हैं, लेकिन आखिर यह पहल करने तो कौन ? किसी को तो आगे आना होगा, तभी बिल पर विचार-विमर्श हो सकेगा, नहीं तो ऐसा ही चलता रहेगा।
सरकार अकड़ी बैठी रहेगी और अन्ना, अपना अनशन जारी रखेंगे, जनता भी पल-पल पर नजर बनाए रखी हुई है। मीडिया भी लोगों की आंख-कान बने बैठा है। सवाल यह है कि आखिर बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन ? जनता तो चाहती है कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो, उन्हें यह नहीं मालूम हो कि इसके लिए कारगर ‘लोकपाल बिल’ कौन सा होगा ? अवाम की सोच यही है कि देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो और भ्रष्टाचारियों की कारगुजारियों पर लगाम लगे और कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत तरक्की करे। यह सही भी है कि देश के विकास को भ्रष्टाचार ने लील लिया है। भ्रष्टाचार कर विदेशो में धन जमा कराकर देश को खोखला किया जा रहा है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार मिटाने की एक आवाज पर देश की करोड़ों जनता सड़क पर उतर आई है। उसे यह मतलब नहीं कि कौन क्या चाहता है, सरकार क्या चाहती है। जनता को बस भ्रष्टाचार मुक्त भारत चाहिए, जिसके बाद उनकी खुशहाली व तरक्की की राह खुलती है।
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