सोमवार, 15 नवंबर 2010

टीआरपी और पाखंड चेहरा

बात एक साल पुरानी है। सदी के महानायक अभिनेता अमिताभ बच्चन फिल्म पा दिसंबर 2009 में रिलीज हुई थी, जिसमें उन्होंने आॅरो के किरदार को निभाया है। इस फिल्म की दर्षकों में खासी चर्चा रही और पहली बार इस फिल्म के माध्यम से ऐसी अजीबो-गरीब बीमारी प्रोजेरिया, लोगों के सामने आया, जिसे जानकर हर कोई सोच में पड़ गया, क्योंकि डाॅक्टरों की मानें तो यह बीमारी, एक करोड़ में एक व्यक्ति को होती है। पा फिल्म में प्रोजेरिया बीमारी को दुनिया के सामने लाया गया है और इस फिल्म मे अभिनेता अभिताभ बच्चन ने 13 वर्षीय एक ऐसे बालक का किरदार निभाया है, जिसे प्रोजेरिया बीमारी रहती है और वह बचपन में ही बूढ़ा दिखाई देता है। पहले इस बीमारी के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी थी, लेकिन पा फिल्म की चर्चा के बाद मीडिया भी भला कहां दूर रहने वाला था। अमिताभ बच्चन के पा फिल्म में अभिनय किए जाने से इसे और प्रसिद्धि मिली। तभी तो कल तक जिसे महज एक बीमारी समझ कर, कोई भी मीडिया खबर बनाना नहीं चाहता था, उस फिल्म की चर्चा में आने के बाद इस पर खबर बनाने मीडिया मंे होड़ मची रही। यह केवल टीआरपी बढ़ाने का चक्कर है और ऐसे में एक बार फिर मीडिया का पाखंड चेहरा उजागर हुआ है। पिछले बरस अमिताभ बच्चन अभिनीत पा फिल्म की जैसे ही चर्चा षुरू हुई तो मीडिया की नजर में प्रोजेरिया बीमारी से पीड़ित छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के छोटे से गांव भिलौनी का कुलजीत आ गया। इस बीच डेढ़ दर्जन से अधिक मीडिया के कर्ता-धर्ता पहुंचे और फिर मची टीआरपी की होड़। उस दौरान पखवाड़े भर में ऐसा कोई दिन नहीं गया, जिस दिन कोई चैनल के लोग रिपोर्टिंग के लिए नहीं पहुंचे हांे। यह बात तो सही है कि जब कोई महत्वपूर्ण खबर मीडिया पर आती है तो हर मीडिया उसका हिस्सा बनता चाहता है, लेकिन टीआरपी के चक्कर में मीडिया का पाखंड चेहरा उजागर हो तो उसे क्या कहा जा सकता है। कुलजीत लंबे अरसे से एक अजीबो-गरीब बीमारी से ग्रसित है, इन वर्षों तक उसकी खबर या उस परिवार की बेबषी की खबर किसी चैनल ने दिखाने की सुध नहीं ली, लेकिन जब यह महानायक अमिताभ बच्चन की अभिनीत फिल्म पा से जुड़ा नजर आया तो सभी ने कुलजीत के घर की ओर रूख कर लिया। हद तो तब हो गई, जब अपनी टीआरपी या फिर दर्षकों को उसका एटीट्यूड दिखाने के चक्कर में उससे करतब जैसे कार्य कराया गए। खबर बनाने के लिए मीडिया के लोगों को यह ख्याल नहीं रहा, जिस बालक पर वे खबर बनाना चाह रहे हैं और वह गंभीर बीमारी से ग्रसित है और एकदम कमजोर है। इन सब बातों को दरकिनार कर, प्रोजेरिया से पीड़ित बालक कुलजीत को कभी कोई मीडिया के नुमाइंदे नचा रहा है तो कोई दौड़ा रहा है। उससे ऐसा कराया गया, जो उसका रोज की दिनचर्या में सामिल नहीं था। एक चैनल से पहुंचे लोगों ने केवल खबर बनाने के लिए ही कुलजीत की पसंद का ख्याल रखा और वह जो पसंद करता था, उसे लाने के लिए गांव के एक व्यक्ति को पचास रूपये दिए और खबर बनाने को लेकर उंचे लोगों से सहयोग दिलाने का हवाला दिया। यह कोई एक दिन की बात नहीं है, हर दिन पहुंचने वाले मीडिया के लोग केवल खबर बनाने तक कुलजीत के परिवार की खोज खबर ले रहा है। उसके बाद तो उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है। खबर बनाने पहुंचे कई चैनल वालों ने आर्थिक मदद दिलाने की बात कुलजीत के परिवार को कही, लेकिन जैसे लौटे, अब इस बारे में सोचने वाला कोई नहीं है। यहां सवाल यही है कि क्या किसी मीडिया वाले की इतनी ही भूमिका है कि वे खबर बनाने के लिए एक गरीब परिवार को सब्जबाग दिखाए और वहां से खबर बनाने के बाद इस बात को भूल जाए। ऐसा ही कुछ हुआ, भिलौनी के कुलजीत के परिवार वालों के साथ। अमिताभ बच्चन की फिल्म पा की चर्चा होने के बाद कुलजीत के परिवार वाले भी मीडिया के सुर्खियां बने रहे, लेकिन मीडिया वाले जिस तरह उनकी खोज खबर लेने पहुंचे थे, वह उनके जाने के बाद से ही गांव के रास्तों पर कहीं ठहर गया है। मीडिया में काम करने वाले लोगों का काम खबर बनाना है, लेकिन किसी को खबर बनाने के नाम पर झूठी सब्जबाग दिखाए जाने को किसी भी सूरत में मीडिया जगत के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता। एक परिवार वैसे ही गरीबी के बाद अपने चहेते का इलाज कराने में हर वो जुगत बनाने की कोषिष कर रहा है, जो उसके बस में है, लेकिन मीडिया द्वारा केवल टीआरपी और खबर के नाम पर जो पाखंड चेहरा दिखाया गया, उसे स्वच्छ पत्रकारिता की नींव मजबूत नहीं हो सकती। एक मीडिया के लोगों द्वारा यहां तक कहा गया कि कुलजीत को वे महानायक अभिताभ बच्चन से मिलाएंगे, अंतिम स्थिति में उन लोगों की बात फोन से जरूर करा दी जाएगी, लेकिन आज कुलजीत और उसके परिवार के लोगों के हालात तो वैसे ही हैं और कुलजीत तथा उसका परिवार बीमारी की लड़ाई में लगे हैं, लेकिन उन मीडिया के लोगों का वादा अब तक पूरा नहीं हो सका है। कुलजीत और उसके परिवार वालों के मन में अब भी अमिताभ बच्चन से मिलने की चाहत बाकी है, लेकिन सवाल यही है कि आखिर पहल करे तो करे कौन ? अभी हाल ही में कुलजीत के परिवार वालों ने 10 नवंबर को उसका जन्मदिन मनाया, इस दौरान भी उनकी आंखों में अमिताभ बच्चन से मिल पाने का सपना दिखाई दिया। उनकी आंखों की पलकें उन्हें आज भी निहार रही हैं। कुलजीत के भाई सुजीत का कहना है कि खबर के नाम पर डेढ़ दर्जन से अधिक मीडिया वाले उनके घर पहुंचे और कईयों ने उन्हें प्रषासन र्से आिर्थक मदद दिलाने में सहयोग दिलाने की बात कही, लेकिन एक-दो को छोड़कर किसी ने दोबारा संपर्क करने की कोषिष नहीं की। यहां बताना लाजिमी है कि पाॅ फिल्म मंे जिस प्रोजेरिया बीमारी को रेखांकित किया गया है, इसी बीमारी से छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम भिलौनी (पामगढ़) के कुलजीत भी पीड़ित है। श्री दिलीप बंजारे का 12 साल का पुत्र कुलजीत बचपन से बीमारी से पीड़ित है, लेकिन डाॅक्टरों ने 2005 में प्रोजेरिया बीमारी होने की पुष्टि की। गरीबी होने के बाद भी कुलजीत का इलाज उसके परिजन कराते आ रहे हैं। डाॅक्टरों ने प्रोजेरिया से पीड़ित की अधिकतम उम्र 20 साल बताया है। बावजूद परिजन उसके इलाज के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह से भी गुहार लगाई है। तीसरी में पढ़ने वाला कुलजीत का जुड़वा बहन भी है, उसका नाम बिंदिया है और वह छठवीं में पढ़ रही है। कुलजीत बीमारी से ग्रस्त है, जबकि ंिबंदिया स्वस्थ है। कुलजीत का प्रोजेरिया बीमारी के चलते सारीरिक विकास रूक गया है और वह महज 7 किलो का है और उसकी उंचाई ढाई फीट है। उसके दांत टूट गए हैं तो सिर व सरीर पर बाल नहीं है। कान बड़े हैं तो नाक लंबी है। गाल पिचके हुए हैं और चेहरे पर झुर्रियां छाई हैं। नसें तनी हुई हैं, जैसे वह बूढ़ा हो गया हो। प्रोजेरिया बीमारी से व्यक्ति बचपन में ही बूढ़ा हो जाता है। कुलजीत का वजन में कमी होती जा रही है। इस परिवार को आर्थिक मदद की जरूरत है, लेकिन फिलहाल कोई हाथ का सहारा इन्हें नहीं मिल सका है।

रविवार, 14 नवंबर 2010

भारत के बेरोजगारों का क्या होगा ?

भारत, दुनिया का एक विशाल देश है और आबादी के लिहाज से देखें तो पूरे संसार में चीन के बाद इसका दूसरा स्थान है। इस तरह भारत में आज की स्थिति में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, जिसे सत्ता पर काबिज होने के पहले हर पार्टी के नेता खत्म करने की दुहाई देते हैं, मगर हालात में किसी तरह का बदलाव नहीं होता। देश में केवल साल-दर-साल आबादी बढ़ती चली जा रही है और रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है। ऐसे में देश के करोड़ों युवा, बेरोजगार हो गए हैं और इसका सीधा असर देश के विकास पर पड़ रहा है। यह भी माना जाता है कि पूरी दुनिया में युवाओं की जो संख्या है, उसमें भारत आगे है, लेकिन युवाओं को रोजगार देने का जो कार्य होने चाहिए, वह कमी अब भी बरकरार है। अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने तीन दिवसीय दौरे पर पहली बार भारत आए। बराक के भारत आने के पहले और आने के बाद राजनीतिक हलकों के साथ कूटनीतिक तौर पर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे कि अमेरिकी नीति जरूर भारत के हित में होगा। बराक के भाषणों में अधिकतर यही बात रही कि भारत में सांस्कृतिक विरासत है, जो दुनिया के किसी अन्य देशों में देखने को नहीं मिलता और उन्होंने महात्मा गांधी का गुणगान कर लोगों का मन मोह लेने की कोशिश की और वे इसमें सफल भी हुए। ओबामा जब भारत आए तो उन्होंने शुरूआत में ही कहा कि वे अमेरिका में बढ़ते बेरोजगारी को लेकर भारतीय कंपनियों के साथ करार करने आए हैं। इस नीति में भी बराक हुसैन, होशियार साबित हुए और करीब 20 कंपनियों ने अपनी हामी भरते हुए करोड़ों रूपये का निवेश करने की बात कही। इससे निश्चित ही अमेरिकी राश्ट्रपति गदगद हो गए हैं, किन्तु यहां भारत में इस बात की इन कंपनियों को चिंता नहीं है कि जो वे, देश में ही अपनी कंपनी का काम फैलाएं और भारत में बढ़ती बेरोजगारी को दूर करने में सहयोग दें। केन्द्र में बैठी सरकार भी बराक ओबामा की इस नीति को नहीं समझ पाई कि वह केवल भारत को सशक्त राश्ट्र होने का हवाला देते हुए अपना काम साधने आए हैे। यही कारण है कि सरकार ने भी इस बात की चिंता नहीं की कि भारत में बेकार बैठे युवा बेरोजगारों का क्या होगा ? आखिर सरकार क्यों उनकी चिंता नहीं करती नजर आई। जब भारत में ही बेरोजगारी की समस्या ने विकराल रूप अख्तियार कर लिया है और यहां की सरकार उस गंभीर समस्या से निपटने कामयाब नहीं हो पा रही है, इस स्थिति में भी भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में निवेश की बात तो बेमानी लगती है। भारतीय कंपनियों के निवेश के बाद अमेरिका में करीब 50 हजार बेरोजगारों को रोजगार मिल जाएगा, इस प्रयास से तो अमेरिकियों की बांछें निश्चित ही खिल जाएंगी, लेकिन भारत में स्थिति किस तरह बिगड़ रही है, इस बात की फिक्र ऐसे हालात में कौन करेगा, यह कह पाना मुश्किल लगता है। यह तो वही हो गया, दिया तले अंधेरा या यूं कहें कि खुद के घर में अंधेरा छाया हुआ हो और हम दूसरों के घर का अंधेरा दूर करने निकल पड़ें। यह बातें भारत के किसी राज्य द्वारा किसी अन्य राज्यों के सहयोग की बात होती तो अलग थी, लेकिन यह मुद्दा एक देश से दूसरे देश का है। यहां पर भारत सरकार के नेतृत्वकर्ताओं को कूटनीतिक तौर पर लाभ-हानि क्या हो सकते हैं, यह भी विचार करने की जरूरत थी। सवाल यही है कि भारत में बीते कुछ दशकों में बेरोजगारी के हालात बद्तर हुए हैं और जिस तरह से आबादी भारत की बढ़ रही है, वह तो बेरोजगारी जैसी समस्या के तौर पर किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। आज भारत की आबादी केवल चीन से कम है और देश की जनसंख्या सवा अरब से ऊपर पहुंच गई है। यह भी माना जा रहा है कि भारत की आबादी आने वाले दस बरसों में करीब 2 अरब होने जाएगी। इस बात की कल्पना करने भर से जानकार सोच में पड़ जा रहे हैं, मगर सत्ता के मद में मशगूल नेताओं को इस समस्या की चिंता भला कैसे हो सकती है, उन्हें फिक्र जो अपनी कुर्सी की बनी रहती है। आंकड़ों के तौर पर भारत में आने वाले कुछ सालों में बेरोजगारी की समस्या किस रूप में निर्मित हो जाएगी, यह तो समझा ही जा सकता है, लेकिन देश की ऊंची कुर्सी में बैठे नीति-निर्धारकों की समझ में आए, तब ना। देश में तीन प्रमुख समस्या ज्यादा गंभीर बन गई है, एक भ्रष्ट्राचार, दूसरी महंगाई और तीसरी बेरोजगारी। आबादी की दृष्टि से विचार करें तो बेरोजगारी की समस्या ज्यादा भयावह नजर आती है। बेरोजगारी को लेकर सरकार भी समय-समय पर चिंता जताती है, लेकिन इसके बाद, वही ढाक के तीन पात। बेरोजगारी जैसे मुद्दे में तल्खी आते ही सरकार में सत्ता की चाशनी के रस में डूबे राजनेता, यह भूल ही जाते हैं कि देश में कोई बेरोजगारी जैसी समस्या भी है। हर चुनाव के समय यह बात दोहराई जाती है कि भारत में बेरोजगारी खत्म कर दी जाएगी और ऐसी नीति बनाई जाएगी और स्वरोजगार को बढ़ाने का दंभ भरा जाता है, लेकिन जब चुनाव हो जाता है और सरकार बन जाती है, उसके बाद फिर तो इस दावे की ही हवा निकल जाती है। बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्या के बारे में भूलकर भी कोई राजनेता बात करना नहीं चाहता, क्योंकि अब तक तो केवल नेताओं द्वारा दावे किए जाते रहे हैं, इस बीमारी की कोई दवा ही ढूंढने की कोशिश नहीं की गई है। इसी का परिणाम है कि देश में आबादी जिस गति से बढ़ रही है, उसी गति से बेरोजगारी भी बढ़ रही है। बेरोजगारी के कारण देश के युवा गलत दिशा में मुड़ रहे हैं, आखिर इसका जिम्मेदार कौन है ? देश की कुर्सी के कर्णधारों को यदि इस समस्या से निजात दिलाने की मंशा होती तो निश्चित ही इस बात का खुले तौर पर विरोध होता कि क्यों भारतीय कंपनियां, अमेरिका में निवेश करे। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अमेरिका, भले ही शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में अपनी छवि बना लिया हो, लेकिन यह भी बात सही है कि 2008 में आई मंदी का असर अमेरिका के आर्थिक ढांचा को तहस-नहस कर दिया है। दो बरस पहले जब पूरी दुनिया में मंदी का दौर चला तो केवल दो ही देश ही गंभीर आर्थिक आफत से दूर रहे, वो थे, भारत और चीन। आर्थिक मंदी के कारण अमेरिका में लाखों युवा रातों-रात सड़क पर आ गए और बेरोजगार हो गए, क्योंकि अमेरिका जैसे देश में काम के लाले पड़ गए। मंदी का थोड़ा भी असर भारत पर नहीं पड़ा, लेकिन भारतीय आर्थिक हालात में जैसा सुधार होना चाहिए, वैसा नहीं हुआ। नतीजा के रूप में देखा जा ही सकता है कि मंदी के बावजूद अमेरिका ने खुद को किस तरह संभाल लिया है और नए रोजगार के अवसर तलासने में जुट गया है, लेकिन भारत में इन परिस्थितियों के नहीं होने के बाद भी कभी किसी को यह सोचने की फुर्सत नहीं रही कि भारत में बढ़ती बेरोजगारी को कैसे रोका जाए ? ना ही उस समय सरकार कोशिश करती नजर आई और न ही अब कोई नीति बनाने के बारे में चिंतन करती दिख रही है। ऊपर से अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सुर के सुर मिलाते हुए अमेरिका में भारतीय कंपनियों द्वारा करोड़ों रूपये का निवेश की जाती है तो यह तो भारत के बेरोजगारों के लिए सरकार की छलावा नीति ही कही जा सकती है। यहां सवाल यही है कि ऐसे हालात में भारत के बेरोजगारों का क्या होगा ?

शनिवार, 13 नवंबर 2010

सुदर्शन का बयान और कांग्रेस का संग्राम

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अर्थात आरएसएस की अपनी एक ऐसी पृष्ठभूमि है, जिसके तहत देश ही नहीं, दुनिया में यह एक अनुशासित संगठन के रूप में जाना जाता है। आरएसएस से जुड़े कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को संयमी माना जाता है और उन्हें संयमित शब्दावली के लिए जाना जाता है, लेकिन आरएसएस द्वारा पूरे देश में भगवा आतंकवाद के खिलाफ मोर्चाबंदी के दौरान मध्यप्रदेश के भोपाल में संघ के पूर्व सरसंघचालक के.एस. सुदर्शन ने जो कुछ यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के खिलाफ तीखी टिप्पणी की, उससे देश का राजनीतिक माहौल ही गरमा गया है। शुक्रवार को देश भर में आरएसएस ने धरना प्रदर्शन कर विरोध जताया और केन्द्र की यूपीए सरकार तथा भगवा आतंकवाद संबंधी बयान देने वाले गृहमंत्री पी. चिदंबरम को खरी-खोटी सुनाई गई। इतिहास में ऐसा पहली मर्तबा हुआ, जब आरएसएस ने किसी मुद्दे के विरोध में धरना-प्रदर्शन जैसे सड़क की लड़ाई अख्तियार किया, नहीं तो आरएसएस की अपनी काम करने की अलग ही शैली है। आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश कुमार का नाम अजमेर बम विष्फोट में आने के बाद केन्द्र सरकार के खिलाफ संघ ने मुखर होने के लिए इस तरह विरोध दर्ज कराने का मन बनाया। देश के सभी बड़े शहरों में आरएसएस के बड़े नेता कमान संभाल हुए थे। वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने लखनउ में सभा को संबोधित किया तो पूर्व सरसंघचालक के.एस. सुदर्शन, भोपाल में कार्यकर्ताओं का साथ देने पहुंचे, लेकिन यहां के.एस. सुदर्शन ने जिस तरह बयानबाजी की, उससे तो विपक्षी पार्टी के नेता तो हक्के-बक्के रह ही गए, साथ ही संघ के पदाधिकारियों को भी यह बयान समझ में नही आया। भोपाल में भगवा आतंकवाद जैसी शब्दावली का विरोध करने जुटे आरएसएस कार्यकर्ताओं को के.एस. सुदर्शन ने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए सीधे शब्दों में कथित तौर पर आरोप लगाया कि सोनिया गांधी सीआईए का एजेंट है और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी तथा स्व. राजीव गांधी की हत्या का षड़यंत्र रचा। हालांकि इस बयान पर आरएसएस के पदाधिकारी अपना पल्ला झाड़ते नजर आए और संघ के
अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य का मीडिया में यह बयान आया है कि संघ का ऐसा कोई मत नहीं है और इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हुई है। पूरे देश भर में आरएसएस का भगवा आतंकवाद के विरोध में धरना-प्रदर्शन तो हो गया, मगर जब संघ के पूर्व सरसंघचालक की टिप्पणी, कांग्रेसियों के कानों तक पहुंची, उसके बाद तो विरोध प्रदर्शन तो होना तय हो गया। सवाल जो, पार्टी की मुखिया के मान का रहा।
शुक्रवार को आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने धरना देकर विरोध दर्ज कराया तो शनिवार को कांग्रेस ने आरएसएस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करते के.एस. सुदर्शन के बयान के विरोध में पूरे देश भर में धरना देकर प्रदर्शन किया। कांग्रेस पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं का कहना है कि सुदर्शन अपने बयान को लेकर देश की जनता और श्रीमती सोनिया गांधी से माफी मांगे। शुक्रवार को आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने पुतला फंूका तो दूसरे दिन कांग्रेस के नेताओं को मौका मिला और वे भी कहां पीछे रहने वाले थे, सो सुदर्शन के पुतले जलाए गए। कहा जा सकता है कि सुदर्शन के बयान के बाद कांग्रेस का संग्राम शुरू हो गया है।
अब यहां सवाल उठता है, जब आरएसएस के धरना-प्रदर्शन के लिए मुद्दा केवल भगवा आतंकवाद का था और इस तरह बयान देने के खिलाफ आरएसएस, सड़क की लड़ाई लड़ रही थी तो आखिर कौन ऐसी रणनीति पूर्व सरसंघचालक को समझ में आई, जो अपने बयान से देश में एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया। कांग्रेसियों का कहना है कि अब तक कभी ऐसी बातें सामने नहीं आई तो फिर क्यों यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी पर ऐसी अभद्र टिप्पणी की गई। इस बात का जवाब फिलहाल सामने नहीं आया है।
अब तक बने हालात पर गौर करें तो लगता है कि आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक के बयान की बयार अभी थमने वाला नहीं
है, क्योंकि भगवा आतंकवाद के बयान के खिलाफ आरएसएस सड़क पर उतर आया था। ऐसे में अभद्र टिप्पणी किए जाने का मुद्दा कांग्रेस को मिल गया है। इस तरह आरएसएस, जिस तरह केन्द्र की यूपीए सरकार को घेरने के मूड में लगा रहा, उस पर पलीता लगता नजर आ रहा है, क्योंकि संघ, जब कभी भगवा आतंकवाद के बयान पर मोर्चाबंदी करने सोचेगा तो कांग्रेस भी सोनिया गांधी पर की गई कथित टिप्पणी पर जवाब-तलब करने लगेगी।
कुछ भी हो, इन बयानांे के बाद हुए प्रदर्शनों से देश के राजनीतिक हालात में गरमाहट जरूर आ गई है, क्योंकि हमेशा संयमित रूप से काम करने वाला आरएसएस जैसा संगठन पहली बार सड़क पर लड़ाई लड़ने उतरा है और भगवा आतंकवाद के खिलाफ संघ नेताओं ने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखा है, लेकिन पूर्व सरसंघचालक के एक बयान ने संघ की मंशा पर जरूर पानी फेर दिया है।
इन बातों के इतर देखें तो संविधान में हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है, लेकिन आज राजनीतिक दांव-पेंच के चक्कर में जैसी बयान-बाजी की जा रही है, वह किसी भी सूरत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं आता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल यह है कि उससे किसी के मान को आघात ना लगे, किन्तु बीते कुछ बरसों में राजनीतिक रूप से एक-दूसरे को नीचा दिखाने जिस तरह ओछी बातें कही जा रही हैं, वह संविधान की गरिमा के अनुकूल नहीं है। आए दिन किसी न किसी नेता द्वारा किसी दूसरे नेता पर ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया जाता है, जिसे केवल ओछी राजनीति का परिचायक ही माना जा सकता है। भद्दी टिप्पणी करने से परहेज करने के बजाय लगता है कि कुछ एक नेताओं का ऐसा शगल बन गया है। फिसलती जुबान के बाजार में नेता सबसे आगे नजर आ रहे हैं, क्योंकि चुनावी सभाओं में तो यह चरम पर होता है। हमारा मानना है कि राजनीतिक रूप से किसी भी पार्टी के नेताओं की विचारधारा भले ही अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन देश की जनता के बीच ओछी बातें कर राजनीति करने का भला क्या मतलब हो सकता है।
दुनिया में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक अलग ही छाप है, मगर इसी देश के कुछेक नेताओं के अनर्गल बयानबाजी से भला, भारतीय लोकतंत्र कैसे सशक्त हो सकता है। ऐसे में राजनीतिक पार्टियों के उन नेताओं को सबक सीखने की जरूरत है, जो केवल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा तथा स्वार्थ के कारण ऐेसी बातें कर जाते हैं, जिससे पूरे देश में उन्माद फैलने जैसा माहौल बन जाता है। जब कहीं विरोघ-प्रदर्शन होता है तो देश को किस तरह क्षति होती है, क्या ऐसी किसी बात की चिंता इन नेताओं को नहीं करनी चाहिए ? अब तक की स्थिति को देखें तो नेताओं को अपनी फिसलती जुबान पर काबू किए जाने की जरूरत है, कहीं ऐसा न हो कि उन्हें देश की जनता, अपनी वोट की जुबान से सबक सीखाने को मजबूर हो जाए।

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

यह दावा किसके दम पर ?

अक्सर कहा जाता है कि क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है और राजनीति भी इससे जुदा नहीं है। राजनीति में भी कई बार अनिश्चितताओं के दौर से राजनेताओं को गुजरना पड़ता है और वे जो चाहते हैं, वह सब नहीं होता तथा परिणाम उलट हो जाता है। ऐन चुनाव के पहले कई तरह के दावे उंची शाख रखने वाले नेताओं द्वारा किया जाता है, मगर जब नतीजे सामने आते हैं तो उन्हीं नेताओं के पैरों तले जमीं खिसक जाती है या यूं कह,ें सभी दावे की हवा निकल जाती है और मतदाताओं के रूख के आगे नेताओं के दावे बौने साबित हो जाते हैं। बावजूद कई नेता अटकलबाजी करने से सबक नहीं लेता। ऐसा ही राजनीतिक रूप से एक बड़ा दावा, दस जनपथ और देश के नं. 1 दामाद राॅबर्ट वाड्रा ने किया है। हालांकि वे अब तक राजनीति में सक्रिय नहीं हैं, किन्तु उनके बयान से ऐसा ही कयास लगाया जा रहा है कि देर-सबेर वे राजनीति में कूद पड़ेंगे। वैसे राॅबर्ट वाड्रा फिलहाल बिजनेश में व्यस्त हैं और इसी काम में अपनी खुशी जताते हैं, लेकिन आखिर उन्हें कौन सा शुरूर सवार हो गया है कि वे दंभी मन से राजनीति के मैदान में कूदने की इच्छा जता रहे हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी और यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के दामाद, राॅबर्ट वाड्रा ने कुछ दिनों पहले एक अंग्रेजी अखबार से साक्षात्कार के दौरान, जो कुछ दावा किया, वह राजनीतिक हल्कों पर नजर रखने वाले किसी भी जानकार के गले नहीं उतरता। उन्होंने कहा कि यदि वे राजनीति में कदम रखते हैं तो देश में कहीं से भी चुनाव जीत सकते हैं। उन्होंने कहा कि सही समय आने पर वे राजनीति में जरूर आएंगे। साथ ही उनका यह भी कहना है कि जब उन्हें लगेेगा, राजनीतिक क्षेत्र के बारे में पर्याप्त जानकारी हासिल हो गई है और पर्याप्त समय दिया जा सकेगा, तब वे राजनीति में आ जाएंगे। यहां हमारा यही कहना है कि राजनीति में जो चाहे आ जाएं और जहां चाहे वहां से चुनाव मैदान में उतर जाएं, लेकिन दस जनपथ के दामाद राॅबर्ट वाड्रा का वह दावा कि उन्हें कोई चुनाव नहीं हरा सकता।ं उन्होंने जो कहा है, उसका यही मतलब निकाला जा सकता है, क्योंकि वे किसी भी जगह से चुनाव जीतने का दमखम दिखा रहे हैं। यहां एक बात और है, आखिर वे यह दावा किसके दम पर कर रहे हैं ? ठीक है कि वे एक ऐसे परिवार के दामाद हैं, जहां राजनीति की नर्सरी से लेकर पूरा बगीचा, देश में तैयार होता आ रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे कुछ भी कह जाएं, जिसे कोई भी नहीं पचा पाए। कोई भी सुलझे हुए राजनीतिज्ञ भी ऐसे बयान देने के पहले सौ बार सोचेगा, क्योंकि देश के मतदाताओं ने कई अवसरों पर इस तरह दावा करने वाले राजनेताओं को किस तरह सबक सिखाया है, यह किसी से छुपी नहीं है। 15 वीं लोकसभा चुनाव में जनता ऐसे कई दंभी नेताओं अपनी वोट की ताकत से मजा चखा चुके हैं। इसके इतर, बड़ी शाख का दावा करने वाले नेता भी अपनी वैतारणी पार लगाने एड़ी-चोंटी चुनाव में एक कर देते हैं, बावजूद कई बार उन दावे के मुगालते, उन नेताओं को मुंह की खानी पड़ती है। देश के दामाद नं. 1 राॅबर्ट वाड्रा, अब यह ना सोंचे कि देश की जनता नासमझ है, क्योंकि उनके दिलो-दिमाग में ऐसी कोई बात नहीं होती तो वे ऐसे कोई दावे करने से जरूर परहेज करते। जनता अब जागरूक हो गई है, इसका प्रमाण वे कई आम चुनावों में दे चुकी हैं। लंबे अंतराल तक सत्ता के मद में चूर रहकर, जनता के हितों को दरकिनार कर काम करने वाले नेताओं को यही जनता अपने मताधिकार से मजा चखा चुकी हंै, जब मंजे हुए राजनीतिज्ञों को आम जनता के मन में क्या है ? और वे किसके पक्ष में रहेंगे, उन पहुंचे हुए नेताओं को पता नहीं चलता तो फिर कहा जा सकता है कि राॅबर्ट वाड्रा, किस आधार पर ऐसा दावा कर, इतरा रहे हैं। आखिर वे किसके दम और सह पर इतनी बड़ी बात कह गए, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। यह बात ठीक हो सकती है कि वे राजनीति में उतरकर हाथ आजमा सकते हैं, लेकिन इतना दंभी होने का भला क्या मतलब है और यह किस ओर इशारा कर रहा है, यह राजनीति के जानकारों के समझ से परे है। देखा जाए तो राॅबर्ट वाड्रा का कोई राजनीतिक शाख नहीं है, वह केवल देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी के दामाद हैं और कांग्रेस के युवराज माने जाने वाले राहुल गांधी के बहनोई तथा पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की बेटी प्रियंका गांधी के पति हैं। राजनीतिक रूप से इस परिवार के अधिकांश लोगों ने राजनीति में कदम रखकर एक कीर्तिमान स्थापित किए हंै। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. गांधी के सूचना क्रांति लाने के प्रयास को भला देश का कोई नागरिक कैसे भूल सकता है। साथ ही उस पल को कौन गंवाना चाहेगा, जब कोई देश के प्रधानमंत्री जैसे पद पर विराजित होने वाला हो, किन्तु श्रीमती सोनिया गांधी ने इस ओहदे को ठुकरा कर दुनिया के सामने एक नई मिसाल कायम किया है। इसके अलावा कई राज्यों में दम तोड़ रही कांग्रेस तथा इस पार्टी की युवा शक्ति को संजीवनी देने वाले राहुल गांधी के राजनीतिक हस्तक्षेप को कैसे कोई ठुकरा सकता है। जब से राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखा है, उसके बाद से कांग्रेस में नई जान आ गई है। राजनीतिक क्षेत्र के अन्य पार्टियां, राहुल गांधी के विकल्प तैयार करने में फिलहाल इन बीते सालों में अक्षम ही साबित हुई हैं। यह तो इस परिवार की राजनीतिक दखल की एक बानगी भर हो सकती है। यदि इतिहास को खंगालें तो इस परिवार की राजनीतिक विरासत की एक लंबी फेहरिस्त है। इसी परिवार की पूर्व प्रधानमंत्री और राष्ट्रमाता के रूप में पहचान बनाने वाली प्रियदर्शिनी स्व. इंदिरा गांधी की भी राजनीतिक हस्तक्षेप यादगार रहा है और एक महिला होने के बाद भी, उस दौर में उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में पुरूष प्रधान समाज के कई बड़े नेताओं को पछाड़कर अपनी पहचान बनाई थी। हो सकता है कि गांधी परिवार की इन्हीं राजनीतिक उपलब्धि को लेकर इस परिवार का दामाद राॅबर्ट वाड्रा, यह कहने से तनिक भी नहीं हिचकिचाए कि वे राजनीति में आएं तो कहीं से भी चुनाव जीत सकते हैं। ऐसा लगता है, जैसे उनके हाथ में राजनीतिक मामले में जादू की कोई छड़ी है। आखिर उन्होंने कौन सी मनोदशा लेकर यह बातें कही है, वही जानें, लेकिन इतना जरूर लगता है कि अब वे अपने बिजनेश से उब गए हैं, तभी तो वे कभी मन बनें, तो राजनीति में आने की बात बेबाकी से कह गए। राॅबर्ट वाड्रा को किस हाथ का भरोसा है, यह तो वही समझे, लेकिन राजनीति जानकार तो यही कह रहे हैं कि जरूर वे उस परिवार के प्रति जनता के बीच बनी छवि को आधार बनाकर चुनाव लड़ने की सोंच रहे होंगे, क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी अभी भी गांधी परिवार से दूर नहीं हुई हैं, लेकिन बदलते समय के साथ राजनीतिक हालात में भी काफी बदलाव आ गए हैं। दामाद बाबू को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह दौर अब नहीं है। जनता के मन में गांधी परिवार के लोगों के प्रति सम्मान की भावना होना लाजिमी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि राॅबर्ट वाड्रा, कहीं भी चले जाएं, चुुनाव लड़ें और जीत जाएं, यह तो केवल उनके मन में समाए शेखचिल्ली का महज सपना ही लगता है। उस दावे से जुड़े बातों को लेकर राजनीतिक इतिहास खंगालें तो पता चलता है कि कई बड़े नेता भी इसी तरह के दावे करते रहे हैं और वे अपने दावे पर मात भी खाते रहे हैं। राॅबर्ट वाड्रा यह कहते हैं कि वे कहीं भी जीत सकते हैं, तो उन नेताओं का क्या कहें, जो किसी पार्टी की कमान तो देश भर में संभालते हैं, लेकिन चुनावी परीक्षा में खुद को कमजोर पाते हैं, क्योंकि कई मर्तबा यह देखने में आ चुका है, जब कई बड़े नेता दो-दो चुनावी क्षेत्रों से चुनाव लड़ते रहे हैं। जब उन्हें जीत का गुमान होता है तो फिर वे क्यों दो सीटों से चुनावी मैदान पर उतरते हैं ? जाहिर सी बात है कि उन्हें भी हार का डर सताता है और वे जानते हैं कि चुनावी रण में पस्त हुए तो कहीं के नहीं रहेंगे। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी जब चुनाव हारे हों और इस फेहरिस्त में पूर्व प्रधानमं.त्री अटलबिहारी वाजपेयी का भी नाम हो तो राॅबर्ट वाड्रा जैसे राजनीति में आने वाले नए-नवेले व्यक्ति को यह बात तो सोचना ही चाहिए, जब जनता ने इन्हें नकार दिया तो फिर उनका क्या। यहां दो-दो सीटों पर चुनाव लड़ने की एक लंबी फेहरिस्त हो सकती हैं, इनमें भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी, राजद के लालू यादव जैसे कई शख्सियतों के नाम हैं। जब इन नेताओं को अपनी जीत की चिंता है तो फिर इनके मुकाबले राॅबर्ट वाड्रा की ऐसी कोई राजनीति काबिलियत एक कौड़ी की भी नहीं है। इन बातों को उन्हें आत्मसात करने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि जब वे जनता के सामने आएं और चुनाव लड़ें और उन्हें हार का सामना करें तो यहां राॅबर्ट वाड्रा की किरकिरी कम होगी, वहीं इससे यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी तथा उनके परिवार और कांग्रेस की शाख दांव पर लग जाएगी। ऐसे में उन्हें इन बचकाने दावों से बचना चाहिए। जब बड़े नेताआंे की ऐसी सोंच हो सकती है तो राॅबर्ट वाड्रा की तो अभी तक कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और न ही कोई ऐसी सफलता, जिसके दम पर वे ऐसे दावे करने के हकदार बनंे। यहां केवल यही नजर आता है कि वे एक ऐसे परिवार के दामाद हैं, जिनका देश की राजनीति में दबादबा रहा है और कांगे्रस जैसी देश की सबसे बड़ी पार्टी के बड़े नेता के परिवार से हैं। हालांकि यह बताना महत्वपूर्ण है कि राजनीति में अपनी जीत तय करने और खुद की शाख बनाने के लिए केवल किसी बड़े परिवार का होना ही जरूरी नहीं हैं, इसके लिए जनता से जुड़ाव होना मायने रखता है, लेकिन अब तक की स्थिति को देखें तो राजनीति हस्तक्षेप के मामले में राॅबर्ट वाड्रा दूर-दूर तक नहीं ठहरते। इतना जरूर है कि राॅबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गांधी, निश्चित ही समय-समय पर राजनीतिक मंचों तथा चुनाव प्रचार में भाग लेती रही हैं और इस तरह उनका एक अनुभव नजर आता है। राहुल गांधी ने जब पिछले साल लोकसभा चुनाव लड़ा तो प्रियंका गांधी का ही हस्तक्षेप रहा, क्योंकि राहुल गांधी तो देश भर में प्रचार करने चले जाते थे और अमेठी की कमान प्रियंका के हाथ में होती थी। फिलहाल इस बयान पर इतना ही कहा जा सकता है कि कहीं से भी चुनाव में जीत लेना, चुटकी का खेल नहीं है। इसके लिए बड़े दांव-पेंच की जरूरत होती है और सबसे बड़ी बात होती है, तो वह है, जनता के हितों के लिए कार्य करना, लेकिन राबर्ट वाड्रा तो एक बिजनेशमेन हैं। ऐसे में वे जनता के दर्द को एक बिजनेशमेन की तरह तो महसूस नहीं कर सकते, इसके लिए निश्चित ही उन्हें उन अंतिम छोर के लोगों का दिल जीतना होगा और उनके उत्थान के लिए कार्य करना होगा, जिनके सिर पर हाथ रखने की दुहाई देकर कांग्रेस सत्ता में काबिज हुई है। उन्हें भी ऐसा ही कोई पैतरा आजमाना सीखना होगा, तभी तो राजनीति समर में कूदें, अन्यथा यह भी समझें कि केवल दावे करने से ही कोई भी आरजू पूरी नहीं होती।

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

समाज, शराब और सरकार

बदलते परिवेश के साथ लोगों की जीवनशैली और रहन-सहन में परिवर्तन आया है और समाज में भी व्यापक स्तर पर बदलाव देखने में आ रहा है। लोग जहां भौतिकवादी जीवन जी रहे हैं, वहीं नई पीढ़ी एक ऐसे अंधकार में गुम होती जा रही है, जिसकी अंतिम परिणिति की कल्पना कर ही मन सिहर उठता है। समाज में नशाखोरी की प्रवृत्ति इस कदर हावी हो गई है कि इसने हर वर्ग को अपने चपेट में ले लिया है। युवा पीढ़ी तो लगातार नशाखोरी की गिरफ्त में आ रही हैं और उनका भविष्य भी तबाव हो रहा है। निश्चित ही समाज में इसका विकृत चेहरा भी सामने आ रहा है। समाज की भयावह स्थिति वह हो सकती है, जब नशाखोरी के मामले में महिलाओं की संख्या बढ़ने की जानकारी सामने आए। वैसे यह बात भी सत्य है कि आज समाज को नशा जैसी कुरीति के गिरफ्त से कोई बाहर निकाल सकता है तो वह है, नारी शक्ति। प्रदेश के कई इलाकों में नशाबंदी की दिशा में महिला समूहों तथा संगठनों द्वारा लगातार प्रदर्शन किए जा रहे हैं, जिससे लगता है कि नशाखोरी के विरोध में उनके जेहन में कुछ बात तो जरूर है। पुरातन समय, या कहंे फिर बरसों पहले नारी शक्ति ने ही समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को खत्म करने भूमिका निभाई थीं, कुछ इसी तरह के प्रयास की जरूरत आज स्वस्थ समाज के निर्माण में बनी हुई है। यह बात भी सामने आ चुकी है कि समाज में जिस तरह अपराध में इजाफा होता जा रहा है, उसका कारण नशाखोरी है। अधिकतर घटनाआंे के बाद जांच में बात सामने आती है कि किसी व्यक्ति ने अपराध घटित करने शराब का सहारा लिया। समाज में वैसे अन्य कई नशाखोरी के लिए प्रयुक्त मादक तत्व हैं, लेकिन शराब का उपयोग बड़े पैमाने पर हर वर्ग द्वारा किया जाता है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छग सरकार को अरबों रूपये की आय आबकारी ठेके से होती है। हद तो तब होती नजर आती है कि सरकार, खनिज संपदाओं के अवैध उत्खनन और रायल्टी चोरी पर रोक नहीं लगाती, जबकि यदि सरकार ऐसा कर पाती तो हमारा मानना है कि सरकार को अरबों रूपये का मुनाफा हो जाता और समाज को शराब से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। यहां सरकार क्यों कड़े निर्णय नहीं ले पा रही है, यह बड़ा सवाल है ? छत्तीसगढ़ सरकार को आबकारी ठेके से करीब साढ़े 8 सौ करोड़ रूपये राजस्व प्राप्त होने की जानकारी सामने आई है और वह भी, इस वित्तीय साल के केवल बीते छह महीनों में। सरकार यह कहकर भी अपनी पीठ थपथपा रही है कि जो आय शराब से हुई है, वह तय लक्ष्य से सौ प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में आंकलन लगाया जा सकता है कि आने वाले छह महीनों में शराब से सरकार का खजाना कितना भर जाएगा और आम जनता के घरों के खजाने कितने खाली हो जाएंगे, क्योंकि यह पैसा उन्हीं लोगों से आता है, जिनके वोट से जनहितैषी होने का दंभ भरने वाली पार्टी, सत्ता में आई है। यह बात भी दुखद है कि आबकारी विभाग द्वारा शराब दुकानों की संख्या बढ़ाने में रूचि दिखाई जा रही है, इससे तो कहीं न कहीं यह आभास होता है कि सरकार को छग की भोले-भाले जनता के सेहत का ख्याल नहीं है ? यदि होता तो सरकार इस तरह प्रयास नहीं करती। प्रदेश में आने वाले दिनों में औद्योगिकरण वृहद स्तर पर किया जाना है और स्वाभाविक है कि छग में दूसरे राज्यों से लोगों और कामगारों का आना होगा। ऐसे में शराब दुकानों की संख्या में वृद्धि की बात सामने आ रही है। यहां प्रश्न यही है कि लाइसेंसी शराब दुकानों के इतर गांव-गांव में जो अवैधानिक रूप से शराब बिक रही है, क्या वह सरकार की नजर में नाकाफी लगती है। सरकार, महज आमदनी की सोच रखकर इस तरह लोगों के सेहत से खिलवाड़ करे तो फिर इसे क्या कहा जा सकता है ? खासकर वह सरकार, जो लोगों की भूख की चिंता करती है और महज 2 और 3 रूपये किलो में हर महीने 35 किलो चावल उपलब्ध कराती है। यहां पर तो हमें सरकार की दोमुंही नीति समझ में आती है, क्योंकि एक तरफ सरकार को लोगों के पेट की चिंता सता रही है, वहीं इसी सरकार को लोगों के शराब से बिगड़ने वाले सेहत का ख्याल क्यों नहीं है ? सरकार यह भी क्यों नहीं सोचती कि जब वह किसी परिवार की खुशहाली की बात करती है और लाखों परिवार के लोगों को रोजगार देने का दावा करती है, यहां सरकार को यह बात क्यों परे लगती है कि जो लोग पूरे दिन उनके दिए रोजगार के तहत काम करते हैं और उस मेहनत की कमाई को अपने परिवार के लोगों के जीवन स्तर सुधारने तथा बच्चों की शिक्षा व्यवस्था करने के बजाय, जब वह अपनी गाढ़ी कमाई का आधे से अधिक हिस्सा नशाखोरी में बर्बाद कर दे। कई बार यह भी देखने में आता है कि परिवार की चिंता किए बगैर कोई व्यक्ति अपनी पूरी कमाई को शराब या फिर नशाखोरी में लुटा देता है। यह बात भी सामने आ चुकी है कि लगातार शराब पीने के कारण किसी व्यक्ति की असमय ही मौत हो जाती है, उस समय उस परिवार के सदस्यों पर किस तरह पहाड़ टूटता होगा, इन बातों को सत्ता और सरकार में बैठे नुमाइंदों को सोचने की फुर्सत कहां, उन्हें तो बस इतनी चिंता हो सकती है कि इस बरस आबकारी ठेके से सरकार की झोली कितनी भरेगी। छत्तीसगढ़ को निर्माण हुए दस बरस होने को है और विकास की दृष्टि से देखें तो अविभाजित मध्यप्रदेश के समय सौतेला व्यवहार के कारण यह राज्य पिछड़ा हुआ था, लेकिन इन बीते दस सालों में विकास के मायने बदले हैं। छग में कई नीतियों के कारण प्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह ने जरूर वाह-वाही लूटी हैं, लेकिन यह बात भी कटु सत्य है कि वे समाज के उत्थान के लिए जो करने की ध्येय रखते हैं, वह कहीं न कहीं अधूरा नजर आता है। सरकार, आम लोगों के प्रति जवाबदेही और कल्याणकारी होने की चाहे बड़े-बड़े दावे कर ले, मगर समाज में जिस तरह नशाखोरी की कुरीति हावी होती जा रही है और सरकार का उस पर किसी तरह का अंकुश नहीं है। उल्ट,े इस कुप्रवृत्ति को बढ़ाने और सर्वसुलभ करने के लगातार प्रयास किए जाएं तो फिर सरकार की वह मंशा समझ में आती है, जिसे सरकार सीधे तौर पर तो नहीं कहती, लेकिन उनकी मौन धारणा से समझ में आ जाती है।

प्रदेश ने विकास पथ पर अभी कदम रखा है, निश्चित ही राज्य को विकास के नाम पर अपनी कई अनूठी पहचान बनानी बाकी है। छग में जिस तरह खनिज संपदा का अपार भंडार है, उससे तो विकास की एक नई गाथा लिखी जा सकती है तो फिर शराब की आय की बैशाखी के सहारे, सरकार क्यों आगे बढ़ रही है ? कहा जाता है कि समाज के व्यापक विकास में नशाखोरी बाधक बनती हैं, लेकिन क्यों यह बात, संवेदनशील माने जाने वाली सरकार और जनता के प्रति विश्वास का भाव जगाने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री के कोमल मन को नहीं हिला पा रही है। समाज में बढ़ती शराबखोरी के कारण लगातार परिवार विघटन तथा समाज में बढ़ते आपराधिक गतिविधियांे के मामले आते जा रहे हैं, बावजूद सरकार की सकारात्मक सोच कहीं दिखाई नहीं देती। प्रदेश के आबकारी मंत्री अमर अग्रवाल ने यह हिदायत बैठकों में कई बार दी हैं कि गांव-गांव में जो अवैध शराब की बिक्री हो रही है, उस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगे और दोषियों पर कार्रवाई हो, लेकिन यह केवल तत्कालिक निर्णय ही नजर आता है, क्योंकि उनके हिदायत के बावजूद लगातार यह खबरें आती हैं कि गांवों में बेरोक-टोक अवैध तरीके से शराब बेची जा रही है। हद तो तब हो जाती है, जब प्रतिबंधित जगह अर्थात् टेंपल सिटी और आदर्श गांवों में भी शराब बिकने के मामले सामने आए। ऐसा नहीं है कि अवैध शराब बिक्री की सरकार को जानकारी नहीं है, क्योंकि जब आबकारी मंत्री इन बातों पर संज्ञान लें तो इस बात को समझी जा सकती है। हाईकोर्ट के आदेश का भी पालन होता नजर नहीं आ रहा है। साथ ही शासन के आदेश का भी कई धार्मिक स्थलों में खिल्लियां उड़ाई जा रहीं हैं।

स्थिति वहां पर बिगड़ती नजर आती है, जब शराब बिक्री के विरोध मंे चारदीवारी से निकलकर महिलाएं प्रदर्शन करने लगंे। प्रदेश के दूसरे इलाकों के हालात की बात ही अलग है, मगर जब राजधानी रायपुर के कई जगहों में शराब दुकान हटाने महिलाएं लामबंद होकर सड़क पर उतर आएं। इसके बाद भी सरकार का सकारात्मक नजरिया इस मामले में सामने नहीं आ पाए तो सरकार की सोच समझी जा सकती है कि उन्हें आबकारी राजस्व की चिंता है या फिर आम जनता की ? नशाखोरी और शराबखोरी के कारण समाज के बिगड़ते माहौल की फिक्र सरकार को करने की जरूरत है, क्योंकि जिस तरह छग ने विकास के नए आयाम इन बहुत ही कम समय में तय किया है, वह और दु्रत गति से बढ़ सके। सरकार को यह समझने की आवश्यकता है कि छग में जो अपार खनिज संपदा है, उसका प्रदेश के विकास में किस तरह दोहन करके लगाया जाए। हमारा मानना है कि यदि सरकार यह निर्णय ले कि प्रदेश में नशाखोरी को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा और नई पीढ़ी को सकारात्मक दिशा में कार्य करने प्रोत्साहित करे, तो ही छग की सरकार, एक विश्वसनीय सरकार साबित हो सकती है। जो सरकार, आमजन की फिक्र करे और उसके बारे में सोंचे, वह सरकार आम जनों के मन में जगह बना पाती है। समाज में बढ़ते नशाखोरी और बिगड़ते हालात को लेकर शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों तथा बुद्धजीवियों को भी मनन किए जाने की जरूरत है, जिससे समाज को एक नई दिशा मिल सके।

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

बलि प्रथा और कटघरे में सरकार

देशबंधु में प्रकाशित लेख।

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

राज्यपाल की गरिमा और राजनीतिक उठापटक

भारत के संविधान में देश के राष्ट्रपति और सभी राज्यों के राज्यपालों को ही महामहिम की उपाधि मिली हुई है। इन पदों की गरिमा इसी बात से समझी जा सकती है कि देश की जनता में आज के बिगड़ते राजनीतिक माहौल में भी इन्हीं से ही आस बंधी रहती है और जब कोई नौकरशाह तथा चुनकर भेजे गए उंचे ओहदे पर बैठे नेताआंे द्वारा जनता की किसी बात का अनुसना किया जाता है तो इन बेबस अंतिम पंक्ति के लोगों को देश के इन्हीं महामहिमों से ही न्याय मिलता है, मगर जब इन्हीं संवैधानिक पदों पर बैठे राज्यपालों द्वारा एकपक्षीय राजनीतिक सोच के साथ काम किया जाए तो फिर इसे राजनीतिक कुंठा ही करार दिया जा सकता है। राज्यपालों के बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद पार्टी की विचारधारा से ओत-प्रोत नेताओं की नियुक्ति इस गरिमामय पद पर रोकने नीति नियंताओं और उन राजनीतिक दल के बड़े नेताओं को सोचने की जरूरत है। जब कोई राज्यपाल अनैतिक तरीके से निर्णय लेकर विपक्षी पार्टी को नुकसान पहुंचाने और जिस पार्टी से वह जुड़ा रहा, उसे लाभ पहुंचाने जैसी घिनौना करतूत करे तो फिर ऐेसे में कहीं न कहीं संविधान की गरिमा भी तार-तार होती है, जहां राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि उस अधिकार का बेजा फायदा उठाया जाए। राजनीतिक पृष्ठभूमि के नेताओं को राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर आसिन करने के बाद किसी भी पार्टी का राजनीतिक पक्ष लेने से बचना चाहिए, लेकिन इस प्रवृत्ति पर लगाम लगने के बजाय यह फलसफा जैसे चल पड़ा है। हालात यह है कि कई बार ऐसी स्थिति निर्मित होने के बाद भी किसी तरह की कोई लक्ष्मण रेखा अब तक नहीं ख्ंिाची जा सकी है। राष्ट्रपति द्वारा हस्तक्षेप किए जाने से ही इन स्थितियों को निपटने में सहायक हो सकता है। हाल ही में कर्नाटक में जिस तरह राजनीतिक उठापटक चली और उसके बाद जिस तरह सरकार बचाने की कवायद चली, उससे तो पूरे राजनीतिक गलियारे में रस्सा-कस्सी का आलम रहा और मुख्यमंत्री बी.एस. येदुरप्पा ने आलाकमान को आश्वस्त कर रखा था कि किसी भी स्थिति में कर्नाटक में पहली बार बनी भाजपा की सरकार नहीं लुढ़केगी। साथ ही भाजपा के बड़े नेता भी इस हालात से निपटने कर्नाटक में जमे रहे। भाजपा के वरिष्ठ नेता वंेकया नायडू ने मोर्चा संभालते हुए विधायकों के गिले-शिकवे दूर करने की कोशिश की और जब राज्यपाल हंसराज भारद्वाज के सामने विश्वास मत हासिल करने की बारी आई तो जैसे-तैसे भाजपा की सरकार बचती नजर आई। भाजपा ने विपक्षी पार्टी पर विधायकों को तोड़ने का आरोप लगाया। हालांकि जैसे ही विश्वास मत हासिल हुआ, वैसे ही भाजपा नेताओं ने चैन की सांस ली, लेकिन दूसरी ओर कर्नाटक के राज्यपाल ने विश्वास मत पूरी नहीं होने की बात कहते हुए मुख्यमंत्री बी.एस. येदुरप्पा को दोबारा विश्वास मत हासिल करने कहा गया। इस निर्णय के बाद तो जैसे देश की राजनीति में उफान आ गया, उसका कारण था कि विश्वास मत हासिल होने के बाद भी राज्यपाल ने ऐसा निर्णय लिया। राज्यपाल द्वारा जिस तरह अपने संवैधानिक अधिकार का दुरूपयोग किया गया और जिस विचारधारा से वे जुड़े रहे, उस पार्टी का हिमायती करते नजर आए, इसे किसी भी स्थिति में ठीक नहीं कहा जा सकता। यहा बताना लाजिमी है कि कर्नाटक के राज्यपाल हंसराम भारद्वाज, केन्द्र की यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में विधि मंत्री रहे और कांग्रेस में कई उंचे ओहदे पर रहकर पार्टी के बरसों तक काम किया। कर्नाटक में जिस तरह निर्णय लिया गया, उससे तो ऐसा लगता है कि वे अभी भी कांग्रेस के पदाधिकारी हैं, न कि वे एक संवैधानिक पद पर आसिन हैं, जिसकी अपनी गरिमा है और प्रदेश की जनता को सबसे ज्यादा विश्वास इसी पद से होता है। किसी भी राज्य के राज्यपाल से अपेक्षा की जाती है कि वे बिना किसी दुरागह के नीति के अनुसार निर्णय ले, जिससे प्रदेश का विकास हो और जनता का भला हो, लेकिन कर्नाटक में कुछ दिनों पहले जो हुआ, वह इस गरिमामय पद के लिए एक और काला धब्बा ही कहा जा सकता है। राज्यपाल के निर्णय ने भाजपा को सकते में डाल दिया, क्योंकि कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी.एस. येदुरप्पा पहले रेड्डी बंधुओं के चलते परेशान रहे और बाद में किसी तरह सुलह होने के बाद कई महीनों से कर्नाटक में मचा राजनीतिक भूचाल शांत हुआ, किन्तु बाद में भाजपा के कुछ विधायक, असंतोष जाहिर करते हुए येदुरप्पा सरकार की खिलाफत करने लगे। इन कारणों से भाजपा का पूरा कुनबा हिल गया, क्योंकि कर्नाटक में भाजपा की पहली बार सरकार बनी है, जिसे वे किसी भी तरह से हाथ से जाने देना नहीं चाहते और भाजपा नेताओं द्वारा हर तरह से सरकार बचाने की कवायद की गई। बीते छह माह में कर्नाटक में राजनीतिक उठापटक का दौर चल रहा है, इससे प्रदेश के विकास पर असर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में जनता भी चाहती है कि किसी तरह यह राजनीतिक अस्थिरता का दौर खत्म हो। दिलचस्प बात यह है कि राज्यपाल के आदेश के एक दिन बाद येदुरप्पा सरकार ने निर्धारित विश्वास मत एक बार फिर हासिल कर लिया। इसके बाद राज्यपाल के निर्णय का जिस तरह किरकिरी हुई, उससे लोगों को एक बार फिर सोचने पर विवश कर दिया कि क्या संवैधानिक अधिकार का इसी तरह गलत प्रयोग होगा और इसे आखिर रोकने कोई प्रयास क्यों नहीं हो रहा है। इसके लिए सरकार में बैठे लोगों को ही विचार करना होगा, साथ ही जनता को अपने हितों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की जरूरत है कि किसी भी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े नेता की राज्यपाल के रूप में ताजपोशी न हो। अब तक वरिष्ठ नेताओं को जिस तरह से एकाएक राज्यपाल बनाया जाता रहा है, उससे तो यही बात पता चलता है कि उन नेताओं को किसी तरह खुश करने की कोशिश की जाती है, लेकिन यहां सवाल यही है कि संवैधानिक पदों पर इस तरह के हालातों से उबरने की जरूरत है। ऐसे में भला किसी को इस तरह खुश करने का क्या औचित्य ? कर्नाटक में राज्यपाल की भूमिका को देखते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवानी ने प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने उन्हें वापस बुलाने की मांग भी की, लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री ने अभी तक कुछ भी नहीं कहा है। इधर भाजपा की सरकार ले-देकर बच गई, लेकिन यह भी चर्चा है कि क्या कर्नाटक की भाजपा सरकार में स्थिरता अब कायम हो पाएगी ? जो अब तक मुमकिन नहीं हो सका है। एक अरसे से प्रदेश में राजनैतिक रूप से जो काला बादल छाया हुआ है, वह जितना जल्दी हटेगा, उतना ही कर्नाटक के विकास में सहायक साबित होगा। राज्य में भाजपा काबिज तो हो गई है, लेकिन जिन बागी विधायकों ने मोर्चा खोला था, वे फिर कब पटखनी दे जाए, कहा नहीं जा सकता। पहले भाजपा में सरकार बचाने को लेकर घमासान मचा था, जब जैसे कांग्रेस को झटके पर झटके लग रहे हैं। पहले कर्नाटक की येदुरप्पा सरकार ने विश्वास मत हासिल कर लिया, इसके बाद अब कांग्रेस के विधायक इस्तीफे दे रहे हैं, वह कांग्रेस के लिए संगठनात्मक दृष्टि से ठीक नहीं कहा जा सकता। यहां पर यही कहा जा सकता है कि जो कलह, पिछले कई महीनों से भाजपा में जारी था, लगता है कि वह अब कांग्रेस के विधायकों और नेताओं तक घर कर लिया है। पहले भाजपा, कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही थी कि वे पार्टी के विधायकों को तोड़ने का प्रयास कर रही है, लेकिन अब सरकार के विश्वास मत हासिल होने के बाद कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे देने से स्थिति कर्नाटक में उलट नजर आ रही है। कर्नाटक की राजनीति से इतर यहां फिर उसी मुद्दे पर विचार करने की जरूरत है, जिसमें राज्यपालों द्वारा अपने संवैधानिक अधिकार का बेजा इस्तेमाल किए जाने के मामले आए दिन सामने आते जा रहे हैं। कर्नाटक में जो हुआ, उससे पहले के हालात देखें तो साल भर पहले झारखंड में विधानसभा चुनाव के बाद खंडित जनादेश सामने आया और उसके बाद जेएमएम के मुखिया शिबू सोरेन ने मुख्यमंत्री बनने की नियत से सरकार बनाने की पेशकश की। यहां अल्प सीट के बाद भी तात्कालीन राज्यपाल सिब्ते रजी ने शिबू सोरेन को सरकार बनाने का न्यौता दिया, उसके बाद तो राज्यपाल की गरिमा और उनके संवैधानिक अधिकार तथा हस्तक्षेप को लेकर एक बार देश में बहश छिड़ गई। इस बीच राज्यपालों द्वारा इससे पहले किए गए ऐसे कृत्यों की चर्चा होनी शुरू हो गयी। जानकार बताते हैं कि आंध्रप्रदेश में राज्यपाल द्वारा पहले भी राजनीतिक विचारधारा के तहत या फिर कहें कि अपने व्यक्तिगत रूचि के आधार पर ऐसे निर्णय दिए जा चुके हैं। फिलहाल झारखंड में शिबू सोरेन को सरकार बनाने बहुमत साबित करने का समय मिला, लेकिन तय समय में राजनीतिक पार्टियों में किसी तरह का गठजोड़ नहीं हुआ और हालात यह बन गए कि बहुमत साबित करने में शिबू सोरेन नाकाम रहा। इस दौरान राज्यपाल के अधिकारों का दुरूपयोग को लेकर बहस का दायरा और बढ़ गया। झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का संकट इस तरह गहराया कि वहां राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। बाद में एक बार फिर चुनाव हुआ, लेकिन फिर वही, खंडित जनादेश। इस बार झारखंड मुक्ति मोर्चा और भाजपा की जुगलबंदी के बाद सरकार बारी-बारी से चलाने पर सहमति बनी, मगर बाद में यह गठजोड़ टूट गया। आखिरकार भाजपा और जेएमएम ने मिलकर फिर सरकार बनाई। यहां केवल यही बात है कि आखिर क्यों राज्यपालों द्वारा अपने संवैधानिक अधिकार का बेजा इस्तेमाल किया जाता है, जिसके बाद उस गरिमामय पद पर दाग लगता है। कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज तो कानून मंत्री रहे हैं और उन्हें संविधान से मिले अधिकार बखूबी पता है, लेकिन उनके द्वारा जो निर्णय दिया गया, वह तो केवल राजनीतिक ही लगता है, वह कहीं से भी संवैधानिक नहीं लगता,। आखिर यहां सवाल यही उठता है कि कानून का ज्ञान होने के बाद भी उन्होंने ऐसा कदम क्यों उठाया, जिससे किसी सम्मानजनक पद की गरिमा को आघात लगे। इस तरह देखें तो कर्नाटक में भी अन्य राज्यों की तरह राज्यपालों के अधिकारों के दुरूपयोग के मामले में काला अध्याय जुड़ गया। ऐसे में अब चिंता का विषय यही है कि ऐसे कृत्यों पर कैसे लगाम लगाया जाए। जाहिर सी बात है कि अधिकांश राज्यों के राज्यपाल, इस संवैधानिक पद पर आने के पहले राजनीतिक दल के पदाधिकारी और उसकी सरकार में बड़े ओहदे पर रहे हैं। राज्यपालों की नियुक्ति में उन वरिष्ठ नेताओं को चुना जाता है, जो या तो पार्टी और संगठन में पहले से काम करते रहे, या फिर उन नेताओं को राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर आसिन कर दिया जाता है, जिन्हें सरकार में कहीं जगह नहीं मिलती। यह भी अक्सर देखने में आता है कि जब भी केन्द्र में सरकार बदलती है तो राज्यपालों के राज्यों की जवाबदारी बदल दी जाती है। अपने मन के मुताबिक राज्यपालों को राज्यों में भेजा जाता है। यूपीए सरकार के पहले एनडीए गठबंधन की सरकार में कुछ इसी तरह सरकार बनते ही राज्यपालों को दूसरे राज्यों में भेज दिया गया। यह सिलसिला यहां कहां थमने वाला था, जैसे ही यूपीए की सरकार बनी, कई राज्यपाल इधर से उधर किए गए। बाद में कुछ राज्यपालों की नियुक्ति समय का कार्यकाल पूरा हो गया तो फिर उन्हीं लोगों की ताजपोशी कर दी गई, जो पार्टी के लिए बरसों जुटे रहे। यहां एक बात और है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर रहने के बाद जिस तरह से नेता सक्रिय राजनीति में वापसी कर लेता है, उसके कारण भी इस पद की गरिमा प्रभावित होती है। राज्यों में जब किसी तरह, हालात बिगड़ते हैं तो शासन व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी किसी भी राज्य के राज्यपाल की होती है। उन्हें संविधान से अधिकार मिले हुए हैं, ऐसे में संविधान सम्मत कार्य करने को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। देश की जनता का जिस तरह से नेताओं से भरोसा उठ गया है, कहीं वैसे हालात इस पद के लिए पैदा न हो जाए। इस पर गहन विचार की जरूरत है, नही ंतो ऐसी स्थिति आने वाले दिनों में फिर निर्मित हो जाए, ऐसा कहना गलत नहीं होगा।