शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

राज्यपाल की गरिमा और राजनीतिक उठापटक

भारत के संविधान में देश के राष्ट्रपति और सभी राज्यों के राज्यपालों को ही महामहिम की उपाधि मिली हुई है। इन पदों की गरिमा इसी बात से समझी जा सकती है कि देश की जनता में आज के बिगड़ते राजनीतिक माहौल में भी इन्हीं से ही आस बंधी रहती है और जब कोई नौकरशाह तथा चुनकर भेजे गए उंचे ओहदे पर बैठे नेताआंे द्वारा जनता की किसी बात का अनुसना किया जाता है तो इन बेबस अंतिम पंक्ति के लोगों को देश के इन्हीं महामहिमों से ही न्याय मिलता है, मगर जब इन्हीं संवैधानिक पदों पर बैठे राज्यपालों द्वारा एकपक्षीय राजनीतिक सोच के साथ काम किया जाए तो फिर इसे राजनीतिक कुंठा ही करार दिया जा सकता है। राज्यपालों के बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद पार्टी की विचारधारा से ओत-प्रोत नेताओं की नियुक्ति इस गरिमामय पद पर रोकने नीति नियंताओं और उन राजनीतिक दल के बड़े नेताओं को सोचने की जरूरत है। जब कोई राज्यपाल अनैतिक तरीके से निर्णय लेकर विपक्षी पार्टी को नुकसान पहुंचाने और जिस पार्टी से वह जुड़ा रहा, उसे लाभ पहुंचाने जैसी घिनौना करतूत करे तो फिर ऐेसे में कहीं न कहीं संविधान की गरिमा भी तार-तार होती है, जहां राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि उस अधिकार का बेजा फायदा उठाया जाए। राजनीतिक पृष्ठभूमि के नेताओं को राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर आसिन करने के बाद किसी भी पार्टी का राजनीतिक पक्ष लेने से बचना चाहिए, लेकिन इस प्रवृत्ति पर लगाम लगने के बजाय यह फलसफा जैसे चल पड़ा है। हालात यह है कि कई बार ऐसी स्थिति निर्मित होने के बाद भी किसी तरह की कोई लक्ष्मण रेखा अब तक नहीं ख्ंिाची जा सकी है। राष्ट्रपति द्वारा हस्तक्षेप किए जाने से ही इन स्थितियों को निपटने में सहायक हो सकता है। हाल ही में कर्नाटक में जिस तरह राजनीतिक उठापटक चली और उसके बाद जिस तरह सरकार बचाने की कवायद चली, उससे तो पूरे राजनीतिक गलियारे में रस्सा-कस्सी का आलम रहा और मुख्यमंत्री बी.एस. येदुरप्पा ने आलाकमान को आश्वस्त कर रखा था कि किसी भी स्थिति में कर्नाटक में पहली बार बनी भाजपा की सरकार नहीं लुढ़केगी। साथ ही भाजपा के बड़े नेता भी इस हालात से निपटने कर्नाटक में जमे रहे। भाजपा के वरिष्ठ नेता वंेकया नायडू ने मोर्चा संभालते हुए विधायकों के गिले-शिकवे दूर करने की कोशिश की और जब राज्यपाल हंसराज भारद्वाज के सामने विश्वास मत हासिल करने की बारी आई तो जैसे-तैसे भाजपा की सरकार बचती नजर आई। भाजपा ने विपक्षी पार्टी पर विधायकों को तोड़ने का आरोप लगाया। हालांकि जैसे ही विश्वास मत हासिल हुआ, वैसे ही भाजपा नेताओं ने चैन की सांस ली, लेकिन दूसरी ओर कर्नाटक के राज्यपाल ने विश्वास मत पूरी नहीं होने की बात कहते हुए मुख्यमंत्री बी.एस. येदुरप्पा को दोबारा विश्वास मत हासिल करने कहा गया। इस निर्णय के बाद तो जैसे देश की राजनीति में उफान आ गया, उसका कारण था कि विश्वास मत हासिल होने के बाद भी राज्यपाल ने ऐसा निर्णय लिया। राज्यपाल द्वारा जिस तरह अपने संवैधानिक अधिकार का दुरूपयोग किया गया और जिस विचारधारा से वे जुड़े रहे, उस पार्टी का हिमायती करते नजर आए, इसे किसी भी स्थिति में ठीक नहीं कहा जा सकता। यहा बताना लाजिमी है कि कर्नाटक के राज्यपाल हंसराम भारद्वाज, केन्द्र की यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में विधि मंत्री रहे और कांग्रेस में कई उंचे ओहदे पर रहकर पार्टी के बरसों तक काम किया। कर्नाटक में जिस तरह निर्णय लिया गया, उससे तो ऐसा लगता है कि वे अभी भी कांग्रेस के पदाधिकारी हैं, न कि वे एक संवैधानिक पद पर आसिन हैं, जिसकी अपनी गरिमा है और प्रदेश की जनता को सबसे ज्यादा विश्वास इसी पद से होता है। किसी भी राज्य के राज्यपाल से अपेक्षा की जाती है कि वे बिना किसी दुरागह के नीति के अनुसार निर्णय ले, जिससे प्रदेश का विकास हो और जनता का भला हो, लेकिन कर्नाटक में कुछ दिनों पहले जो हुआ, वह इस गरिमामय पद के लिए एक और काला धब्बा ही कहा जा सकता है। राज्यपाल के निर्णय ने भाजपा को सकते में डाल दिया, क्योंकि कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी.एस. येदुरप्पा पहले रेड्डी बंधुओं के चलते परेशान रहे और बाद में किसी तरह सुलह होने के बाद कई महीनों से कर्नाटक में मचा राजनीतिक भूचाल शांत हुआ, किन्तु बाद में भाजपा के कुछ विधायक, असंतोष जाहिर करते हुए येदुरप्पा सरकार की खिलाफत करने लगे। इन कारणों से भाजपा का पूरा कुनबा हिल गया, क्योंकि कर्नाटक में भाजपा की पहली बार सरकार बनी है, जिसे वे किसी भी तरह से हाथ से जाने देना नहीं चाहते और भाजपा नेताओं द्वारा हर तरह से सरकार बचाने की कवायद की गई। बीते छह माह में कर्नाटक में राजनीतिक उठापटक का दौर चल रहा है, इससे प्रदेश के विकास पर असर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में जनता भी चाहती है कि किसी तरह यह राजनीतिक अस्थिरता का दौर खत्म हो। दिलचस्प बात यह है कि राज्यपाल के आदेश के एक दिन बाद येदुरप्पा सरकार ने निर्धारित विश्वास मत एक बार फिर हासिल कर लिया। इसके बाद राज्यपाल के निर्णय का जिस तरह किरकिरी हुई, उससे लोगों को एक बार फिर सोचने पर विवश कर दिया कि क्या संवैधानिक अधिकार का इसी तरह गलत प्रयोग होगा और इसे आखिर रोकने कोई प्रयास क्यों नहीं हो रहा है। इसके लिए सरकार में बैठे लोगों को ही विचार करना होगा, साथ ही जनता को अपने हितों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की जरूरत है कि किसी भी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े नेता की राज्यपाल के रूप में ताजपोशी न हो। अब तक वरिष्ठ नेताओं को जिस तरह से एकाएक राज्यपाल बनाया जाता रहा है, उससे तो यही बात पता चलता है कि उन नेताओं को किसी तरह खुश करने की कोशिश की जाती है, लेकिन यहां सवाल यही है कि संवैधानिक पदों पर इस तरह के हालातों से उबरने की जरूरत है। ऐसे में भला किसी को इस तरह खुश करने का क्या औचित्य ? कर्नाटक में राज्यपाल की भूमिका को देखते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवानी ने प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने उन्हें वापस बुलाने की मांग भी की, लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री ने अभी तक कुछ भी नहीं कहा है। इधर भाजपा की सरकार ले-देकर बच गई, लेकिन यह भी चर्चा है कि क्या कर्नाटक की भाजपा सरकार में स्थिरता अब कायम हो पाएगी ? जो अब तक मुमकिन नहीं हो सका है। एक अरसे से प्रदेश में राजनैतिक रूप से जो काला बादल छाया हुआ है, वह जितना जल्दी हटेगा, उतना ही कर्नाटक के विकास में सहायक साबित होगा। राज्य में भाजपा काबिज तो हो गई है, लेकिन जिन बागी विधायकों ने मोर्चा खोला था, वे फिर कब पटखनी दे जाए, कहा नहीं जा सकता। पहले भाजपा में सरकार बचाने को लेकर घमासान मचा था, जब जैसे कांग्रेस को झटके पर झटके लग रहे हैं। पहले कर्नाटक की येदुरप्पा सरकार ने विश्वास मत हासिल कर लिया, इसके बाद अब कांग्रेस के विधायक इस्तीफे दे रहे हैं, वह कांग्रेस के लिए संगठनात्मक दृष्टि से ठीक नहीं कहा जा सकता। यहां पर यही कहा जा सकता है कि जो कलह, पिछले कई महीनों से भाजपा में जारी था, लगता है कि वह अब कांग्रेस के विधायकों और नेताओं तक घर कर लिया है। पहले भाजपा, कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही थी कि वे पार्टी के विधायकों को तोड़ने का प्रयास कर रही है, लेकिन अब सरकार के विश्वास मत हासिल होने के बाद कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे देने से स्थिति कर्नाटक में उलट नजर आ रही है। कर्नाटक की राजनीति से इतर यहां फिर उसी मुद्दे पर विचार करने की जरूरत है, जिसमें राज्यपालों द्वारा अपने संवैधानिक अधिकार का बेजा इस्तेमाल किए जाने के मामले आए दिन सामने आते जा रहे हैं। कर्नाटक में जो हुआ, उससे पहले के हालात देखें तो साल भर पहले झारखंड में विधानसभा चुनाव के बाद खंडित जनादेश सामने आया और उसके बाद जेएमएम के मुखिया शिबू सोरेन ने मुख्यमंत्री बनने की नियत से सरकार बनाने की पेशकश की। यहां अल्प सीट के बाद भी तात्कालीन राज्यपाल सिब्ते रजी ने शिबू सोरेन को सरकार बनाने का न्यौता दिया, उसके बाद तो राज्यपाल की गरिमा और उनके संवैधानिक अधिकार तथा हस्तक्षेप को लेकर एक बार देश में बहश छिड़ गई। इस बीच राज्यपालों द्वारा इससे पहले किए गए ऐसे कृत्यों की चर्चा होनी शुरू हो गयी। जानकार बताते हैं कि आंध्रप्रदेश में राज्यपाल द्वारा पहले भी राजनीतिक विचारधारा के तहत या फिर कहें कि अपने व्यक्तिगत रूचि के आधार पर ऐसे निर्णय दिए जा चुके हैं। फिलहाल झारखंड में शिबू सोरेन को सरकार बनाने बहुमत साबित करने का समय मिला, लेकिन तय समय में राजनीतिक पार्टियों में किसी तरह का गठजोड़ नहीं हुआ और हालात यह बन गए कि बहुमत साबित करने में शिबू सोरेन नाकाम रहा। इस दौरान राज्यपाल के अधिकारों का दुरूपयोग को लेकर बहस का दायरा और बढ़ गया। झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का संकट इस तरह गहराया कि वहां राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। बाद में एक बार फिर चुनाव हुआ, लेकिन फिर वही, खंडित जनादेश। इस बार झारखंड मुक्ति मोर्चा और भाजपा की जुगलबंदी के बाद सरकार बारी-बारी से चलाने पर सहमति बनी, मगर बाद में यह गठजोड़ टूट गया। आखिरकार भाजपा और जेएमएम ने मिलकर फिर सरकार बनाई। यहां केवल यही बात है कि आखिर क्यों राज्यपालों द्वारा अपने संवैधानिक अधिकार का बेजा इस्तेमाल किया जाता है, जिसके बाद उस गरिमामय पद पर दाग लगता है। कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज तो कानून मंत्री रहे हैं और उन्हें संविधान से मिले अधिकार बखूबी पता है, लेकिन उनके द्वारा जो निर्णय दिया गया, वह तो केवल राजनीतिक ही लगता है, वह कहीं से भी संवैधानिक नहीं लगता,। आखिर यहां सवाल यही उठता है कि कानून का ज्ञान होने के बाद भी उन्होंने ऐसा कदम क्यों उठाया, जिससे किसी सम्मानजनक पद की गरिमा को आघात लगे। इस तरह देखें तो कर्नाटक में भी अन्य राज्यों की तरह राज्यपालों के अधिकारों के दुरूपयोग के मामले में काला अध्याय जुड़ गया। ऐसे में अब चिंता का विषय यही है कि ऐसे कृत्यों पर कैसे लगाम लगाया जाए। जाहिर सी बात है कि अधिकांश राज्यों के राज्यपाल, इस संवैधानिक पद पर आने के पहले राजनीतिक दल के पदाधिकारी और उसकी सरकार में बड़े ओहदे पर रहे हैं। राज्यपालों की नियुक्ति में उन वरिष्ठ नेताओं को चुना जाता है, जो या तो पार्टी और संगठन में पहले से काम करते रहे, या फिर उन नेताओं को राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर आसिन कर दिया जाता है, जिन्हें सरकार में कहीं जगह नहीं मिलती। यह भी अक्सर देखने में आता है कि जब भी केन्द्र में सरकार बदलती है तो राज्यपालों के राज्यों की जवाबदारी बदल दी जाती है। अपने मन के मुताबिक राज्यपालों को राज्यों में भेजा जाता है। यूपीए सरकार के पहले एनडीए गठबंधन की सरकार में कुछ इसी तरह सरकार बनते ही राज्यपालों को दूसरे राज्यों में भेज दिया गया। यह सिलसिला यहां कहां थमने वाला था, जैसे ही यूपीए की सरकार बनी, कई राज्यपाल इधर से उधर किए गए। बाद में कुछ राज्यपालों की नियुक्ति समय का कार्यकाल पूरा हो गया तो फिर उन्हीं लोगों की ताजपोशी कर दी गई, जो पार्टी के लिए बरसों जुटे रहे। यहां एक बात और है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर रहने के बाद जिस तरह से नेता सक्रिय राजनीति में वापसी कर लेता है, उसके कारण भी इस पद की गरिमा प्रभावित होती है। राज्यों में जब किसी तरह, हालात बिगड़ते हैं तो शासन व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी किसी भी राज्य के राज्यपाल की होती है। उन्हें संविधान से अधिकार मिले हुए हैं, ऐसे में संविधान सम्मत कार्य करने को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। देश की जनता का जिस तरह से नेताओं से भरोसा उठ गया है, कहीं वैसे हालात इस पद के लिए पैदा न हो जाए। इस पर गहन विचार की जरूरत है, नही ंतो ऐसी स्थिति आने वाले दिनों में फिर निर्मित हो जाए, ऐसा कहना गलत नहीं होगा।

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

लोकतंत्र के रावण को कौन मारेगा ?

देश में हर साल करोड़ों रावण मारे जाते हैं। अभी तो जैसे रावण मारने की होड़ सी मच गई है। लोगों में रावण मारने का इस तरह जूनून सवार है कि दशहरा पर्व के पहले रावण मारे। इसके बाद भी रावण मारने का सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ है। ऐसा लगता है जैसे एक दिन रावण मारने के बाद लोगों का जी नहीं भरता की दशहरा के कई दिनों बाद भी रावण मारे जा रहे हैं। आज के कलयुग के लोग उस प्रगांड पंडित की एक गलती की सजा इस तरह देने में उतारूँ हैं तो इन लोगों की नजर उन लोकतंत्र के रावणों पर क्यों नहीं है, जो हर दिन देश को बेचने की गलती कर रहे हैं। जब एक गलती की सजा इस तरह हो सकती है तो देश को खोखला करने वाले लोकतात्र के रावणों की क्या सजा हो सकत है, सोचने का विषय है। हम तो हर साल रावण मारते हैं और असत्य पर सत्य की जीत बताते हैं, लेकिन जिनके पूरा जीवन असत्य पर ठहरा हुआ है, उन जैसों का क्या होगा? जरा सोचिये ।

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

आँखों में लेह का दर्द

जम्मू-कश्मीर के लेह में बीते ५ अगस्त को हुए बादल फटने के हादसे को जांजगीर-चाम्पा के मजदूर भुलाये नहीं भूल पा रहे हैं। लेह कमाने-खाने गए मजदूरों की आँखों में अब भी वह दर्द और दहशत कायम है। जिन्दगी तबाह कर देने वाले हादसे के बारे में मजदूर यादकर सिहर उठते हैं। जांजगीर-चाम्पा जिले से लेह वैसे तो सैकड़ों मजदूर हर बरस कमाने-खाने जाते हैं, लेकिन इस साल लेह के हादसे ने उनके कई अपनों से जुदा कर दिया। इस दर्दनाक हादसे में किसी ने अपनी मांखो दिया तो किसी ने अपनी पत्नी को। किसी के परिवार ही इस खौफनाक घटना में प्रभावित हो गया। इस हादसे को हुए दो माह से अधिक हो गए गए हैं, लेकिन मजदूरों की आँखों में व मंजर अब भी समाया हुआ है। जिसे याद कर ही वे लोग सिहर उठते हैं। लेह की बादल फटने की घटना में वैसे तो दो दर्जन से अधिक लोगों की मौत की जानकारी उन मजदूरों के परिजन और लौटने वाले मजदूर दे रहे हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर सरकार ने जिले से महज १६ मज्दोरों की मौत होने की पुष्टि की है। इन्हें सरकार ने १ लाख रूपये आर्थिक मदद भी दे दिया है, लेकिन उन मजदूरों के बारे में अब तक पहल होती नहीं दिखाई दे रही है, जो हादसे के बाद से लापता हैं। जांजगीर जिला प्रशासन ने ४० मजदूरों के लापता होने की जानकारी दी है, जिनमें अधिकांश बच्चे हैं। लेह के हादसे में करीब ५० से ज्यादा मजदूर और उनके परिवार के लोग घायल हुए थे, इनमें से केवल २६ मजदूरों को हाल ही में ७-७ हजार की आर्थिक मदद दी गई। लेकिन न तो जम्मू-कश्मीर सरकार को उन लापता मजदूरों और उनके बच्चों की चिंता है और ना ही छात्तिस्स्गढ़ की सरकार को। ऐसे में लेह हादसे के बाद प्रभावित परिवार के लोगों के सामने अपने जख्म लेकर सिसकने के सिवाय और कोई चारा नहीं है। जो ओग लापता हैं, उनके परिवार वाले उन्हें अपने से अलग होना, मानकर उनकी चित्रों के सामने स्व तक लिख दिया है, लेकिन सरकार तो केवल पुष्टिके बाद ही आर्थिक मदद देने के पक्ष में है। इन विपरीत परिस्थिति में उन परिवारों की बेचारगी समझी जा सकती है, जिनके घर का चिराग भी अब जिन्दा नहीं है, जो घर को संभालता था।
जांजगीर-चाम्पा जिले से लेह में केवल २ सौ मजदूर कमाने-खाने जाने की जानकारी जिया प्रशासन की ओर से आई थी, लेकिन जो मजदूर यहाँ से लेह गए थे, उनकी माने तो जिले से जाने वाले मजदूरों की संख्या ५ सौ से ज्यादा थी, उनका तो यहाँ तक कहाँ है की हादसे में ५० से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। इस बात पर मुहर भी इसलिए लगता है क्योंकि जम्मू-कश्मीर सरकार ने १६ मजदूरों की मौत की पुष्टि की है, वहीँ ४० मजदूर लापता बताये जा रहे हैं।

यहाँ सोचने वाली बात यह भी है की जब लेह में घटना होने की जानकारी आई तो जिला प्रशासन के पास इसकी जानकारी नहीं थी की जिले से कहाँ-कहाँ मजदूर कमाने-खाने गए हैं। इसे विडम्बना ना कहें तो और क्या कहें, क्योंकि घटना के बाद पूरा प्रशासन सकता में था तथा कोई जानकारों कहीं से नहीं मिल रही थी। इस हादसे के बाद जिला प्रशासन के साथ छत्तीसगढ़ सरकार को भी सबक लेनी चाहिए।

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

मालदार गरीब का मुखौटा

इतवारी अखबार रायपुर में प्रकाशित व्यंग्य लेख।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

पथरीली होती धरती

कांक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं और धरती की हरियाली लगातार कम हो रही है। पेड़ कट रहे हैं, जंगल घाट रहे हैं। ऐसे में नुक्सान इन जंगलों में रहने वाले पशु-पक्षियों को ही नहीं, इंसान को भी है। कहीं ऐसा ना हो की एक दिन हमें पेड़ लगाने के लिए मिटटी युक्त जमीन ही नसीब ना हो और पत्थर पर पेड़ उगाने पड़ें। इस तस्वीर पर एक नजर

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

भारत की गरीबी और महंगाई

देश में महंगाई आम जनता के ऊपर इस कदर हैवी है की उनको कई ऐसी चीजों से दूरी बनानी पद रही है, जिसे वे खरीद सकने में अक्षम है। दूसरी ओर महंगाई को लेकर ऊँची कुर्सी में बैठे नेताओं को इसकी कोई चिंता नहीं है। तभी तो महंगाई के नाम पर कृषि मंत्री शरद पवार आये दी ऐसे-ऐसे बयान दे जाते हैं, जिससे देश की आम जनता को आघात लगता है। बावजूद ये नेता जनता की चिंता कम करते हैं। ऐसा नहीं होता तो, वे आये दी महंगाई बढ़ने के लिए बयान नहीं देते। कृषि मंत्री तो जब भी मुंह खोलते हैं, उस दिन उनका बयान आम जनता के लिए शामत बनकर आता है। बीते कुछ सालों से देश जनता महंगाई से ऐसी पीस रही है, लेकिन आम आदमी के साथ हाथ होने का दावा करने वाली पार्टी के नेता केंद्र में सरकार बनते ही इन बातों को भूल गए हैं। इस तरह बेचारी आम जनता जाए तो जाए कहाँ।
अभी हाल ही में कृषि मंत्री शरद पवार ने एक बार फिर जिस तरह से गैर जिम्मेदाराना बयान दिए हैं, उससे तो जनता की कोई अहमियत ही नहीं रह गई है। जिस जनता के पैसे से वह कृषि मंत्री को सभी सुविधाएँ नसीब हो रही हैं, उन्ही के बारे में जब सरकार और उसके मंत्री सोचना बंद कर दे तो भला इसे क्या कहा जा सकता है। महंगाई के कारन लोग जैसे-तैसे अपना जीवन जी रहे हैं, वहीँ इन्हीं जनता के पैसे से ये नेता ऐश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें उस जनता की फिक्र करने की जरुरत नहीं है, जिन्होंने इन जैसों को कुर्सी पर बीती है। उसी जनता को किनारा करके कृषि मंत्री शरद पवार जैसे नेता मजे कर रहे हैं। महंगाई को लेकर आम जनता में हाय-तौबा मची है, लेकिन नेता है की बयान देने से बाज नहीं आते। शरद पवार ने अह कहा है की भारत में जितनी महंगाई है, उससे कहीं ज्यादा दुनिया के कई देशों में है। यह बात भी सही है, लेकिन कृषि मंत्री जी जिन देशों में महंगाई भारत से अधिक होने की बात कह रहे हैं, का वहां भारत जैसी गरीबी है ? निश्चित ही ऐसा नहीं है, जी देशों में महंगाई अधिक है, वहां आम लोगों की आय इतनी अधिक है की उन्हें महंगाई का कोई फर्क ही नहीं पड़ता, जबकि भारत में गरीबी इस कदर है की आम जनता की महंगाई के कारन हालत खराब है। रोज जनता महंगाई से पिस रही है। जनता की बेबसी का अंदाजा सुरेश तेंदुलकर की रिपोर्ट से पता चलता है, जिसमें बताया गया है की कैसे भारत की गरीब जनता महज २० रूपये में गुजारा करती है। यहाँ पर हमारा यही काना है की भारत में महंगाई बढती जा रही है और इस देश के नेता अपनी जवावदेही से बचने के लिए अनाप-शनाप बयान दे तो फिर ऐसे नेताओं की मनसिकत को दिवालियापन ही कहा जा सकता है।
महंगाई को लेकर ऐसा पहली बार बयान कृषि मंत्री ने नहीं दिया है, इससे पहले वे कुछ ऐसा कह जाते थे, जिसके बाद महंगाई बढती थी और इसका सीधा लाभ माल दबा कर रखने वालों को मिलता था। अह सिलसिला अब भी जारी है। महंगाई बढ़ रही है और जनता उसके निचे रह कर सब सहन कर रही है। हल्लंकी नेताओं के बयानबाजी को आम जनता समझ रही है, आने वाले दिनों में इस आम आदमी के साथ होने का दवा करने वाली सरकार को जरुर सबक सिख्येगी।

यहाँ दिलचस्प बात यह है की महंगाई पर अन्किश हमारे अर्थशात्री प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह भी नहीं लगा सके, वे केवल इतना दिलासा जनता को देते आ रहे हैं की जल्दी ही महंगाई से निजात पा ली जायेगे, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। आलम यह है की इस महंगाई से केवल व जनता ही पीस रही है, जिनके पैसे से सरकार चल रही है और उसके मंत्री मजे की जिंदगी जी रहे हैं।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

कामनवेल्थ और कलमाड़ी का बडबोलापन

कामनवेल्थ गेम्स से जैसे विवादों और भ्रस्टाचारका नाता पूरी तरह से जुड़ गया है। आयोजन के कर्ताधर्ता सुरेश कलमाड़ी चौतरफा घिरे है। बावजूद उनके द्वारा जिस तरह के बयान दिए जा रहे है, उसे उनकी गैर जवाबदेही ही करार दी जा सकती है। कामनवेल्थ गेम्स के आयोजन को महज एक दिन ही बचे हैं और खेलगांव में जिस तरह अव्यवस्था की बात सामने आ रही है, वह खिलाडियों के हित में कदापि नहीं है। खेलगांव में साँपों ने भी सिरदर्दी बाधा दी है, क्योंकि ऐसा शायद ही कोई दी गुजर रहा है, जब वहां सांप न निकल रहे हों। सुरेश कलमाड़ी पर अब तक चौतरफा आरोप ला चुके हैं। पूर्व खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने जैसा आरोप खेल की व्यवस्थाओं तथा गड़बड़ियों को लेकार गलाया है, उस पर ना तो केंद्र सरकार ने संज्ञान लिया और ना ही दिल्ली की शिला दीक्षित सरकार ने। कुल -मिलकर कलमाड़ी का बल्ले है। देश की कमान संभल रहे प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जैसे साफ छवि के व्यक्ति ने भी भ्रस्टाचार की शिकायत के बाद भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया, ऐसे में केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवाल खड़े होते हैं। देश के खेलमंत्री श्री गिल ने भी चुप्पी साध रखी है। साथ ही कई बड़े नेता भी क्यों इन भ्रस्टाचार के खुलासे के बाद भी मुंह नहीं खोल रहे हैं, इसे समझा जा सकता है।
कामनवेल्थ गेम्स में तमाम भ्रस्टाचार के आरोप के बाद भी कलमाड़ी का यह कहना की खेल के समापन के बाद हालत सुधर जायेंगे और उनके कार्य को समझ लिया जायेगा। भला इतने आरोप और घटिया निर्माण की पोल खुलने के बाद भी आखिर कलमानी ने इतनी आश किसके शाह पर राखी है। जनता के पैसे को इस तरह पानी की तरह बहाया जा रहा है और जनता है की महंगाई के कारन परेशां है। खिलाडियों के विकास के कामनवेल्थ गेम्स का आयोजन करने की बात सरकार और उसके नुमैन्दे करते आ रहे हैं, ऐसे सवाल यही है की इतने भ्रस्टाचार के बाद भी क्या लगता है की खेलों का विकास होगा और खिलाडियों इस आयोजन से लाभ होगा। हमारा तो मन्ना है की इस आयोजन से केवल सुरेश कलमानी तथा उसके जैसे अजगर का ही पेट भर सकता है। ऐसा नहीं होता तो वे भारत के गौरव के लिए आयोजित किये जा रहे कामनवेल्थ गेम्स जैसे आयोजन में जनता के पैसे का बंदरबाट नहीं होता।
भले ही प्रधानमंत्री चुप हों। लेकिन उसी सरकार के मंत्री और आई सी सी अध्यक्ष शरद पवार ने भी सुरेश कलमानी की कार्यप्रणाली को आड़े हाथों लिया है और भार्स्ताचार पर रिक लगाने की बात कही है। मीडिया में भी रोज कामनवेल्थ गेम्स को लेकार कई रिपोर्ट आ रही है। बावजूद सरकार इन कमियों को दूर करने कोई कदम उठते नहीं दिख रही है। ऐसे में सरकार पर ही ऊँगली ना उठे तो कैसे।
अभी टी ऐसा लगता है, जैसे कामनवेल्थ गेम्स के नाम पर विवादों की यह तो एक शुरुआत भर लगता है, क्योंकि जब खेल ख़त्म हो जायेगा तो एक फिर कामनवेल्थ के नाम पर हुए भ्रस्टाचार का विवाद एक बार फिर गहराने के आसार हैं।