1. समारू - कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी स्टैंडिंग कमेटी से नाम वापस ले लिया था।
पहारू - और कितनी अपनी फजीहत कराएगा, पहले ही कड़वी जुबान बोलकर मुंह की खा चुका है।
2. समारू - कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी स्वास्थ्य लाभ लेकर आने वाली हैं।
पहारू - अब उन्हें कांग्रेस की बिगड़ी तबियत ठीक करनी पड़ेगी।
3. समारू - मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को 1 लाख का चेक घूस देने भेजा गया है।
पहारू - स्पेक्ट्रम के बाद इन जैसे चेक की जरूरत ही कहां हो सकती है।
4. समारू - राज्यों में लोक सेवा की बहाली करने होड़ मची है।
पहारू - बरसों हो गए कानून लागू हुए, अब तक क्यों सोए बैठे थे।
5. समारू - छग सरकार ने सरकारी शिक्षक के ट्यूशन पर बैन लगा दिया है।
पहारू - और स्कूल पहुंचने, कोताही बरतने पर कब लगाम लगेगी।
बुधवार, 31 अगस्त 2011
टेढ़ी नजर
1. समारू - बस्तर दशहरे पर 25 लाख का कर्ज की खबर है।
पहारू - छत्तीसगढ़ में होने वाले अधिकांश महोत्सव का यही हाल है।
2. समारू - छग में भाजपा सरकार विधानसभा में घिर रही है।
पहारू - सुस्त विपक्ष को बैठे-ठाले मुद्दे जो मिल जाते हैं।
3. समारू - राजीव गांधी की हत्या की सजा प्राप्त तीन व्यक्तियों की पैरवी राम जेठमलानी कर रहे हैं।
पहारू - ऐसी रिस्क वे लेते रहते हैं, भले ही भाजपा से फटकार ही मिलें।
4. समारू - शांति भूषण मामले की सीडी में छेड़छाड़ नहीं होने का खुलासा जांच में हुआ है।
पहारू - वे ‘शांति’ से यही कह रहे हैं, यह किसी की साजिश है।
5. समारू - डाक्टर बन गए हैं, भारतीय क्रिकेट को उंचाई तक पहुंचाने वाले महेन्द्र सिंह धोनी।
पहारू - उपलब्धि के पीछे कौन नहीं भागता, तभी तो बिना पढ़े बन गए डाक्टर।
पहारू - छत्तीसगढ़ में होने वाले अधिकांश महोत्सव का यही हाल है।
2. समारू - छग में भाजपा सरकार विधानसभा में घिर रही है।
पहारू - सुस्त विपक्ष को बैठे-ठाले मुद्दे जो मिल जाते हैं।
3. समारू - राजीव गांधी की हत्या की सजा प्राप्त तीन व्यक्तियों की पैरवी राम जेठमलानी कर रहे हैं।
पहारू - ऐसी रिस्क वे लेते रहते हैं, भले ही भाजपा से फटकार ही मिलें।
4. समारू - शांति भूषण मामले की सीडी में छेड़छाड़ नहीं होने का खुलासा जांच में हुआ है।
पहारू - वे ‘शांति’ से यही कह रहे हैं, यह किसी की साजिश है।
5. समारू - डाक्टर बन गए हैं, भारतीय क्रिकेट को उंचाई तक पहुंचाने वाले महेन्द्र सिंह धोनी।
पहारू - उपलब्धि के पीछे कौन नहीं भागता, तभी तो बिना पढ़े बन गए डाक्टर।
मंगलवार, 30 अगस्त 2011
टेढ़ी नजर
1. समारू - पाकिस्तान की विदेश मंत्री ‘हीना रब्बानी’ भारत यात्रा पर आई हैं।
पहारू - ऐसा लगता है, मीडिया में बहार आ गई है।
2.समारू - खबर है, बंगलौर में प्लास्टिक से सड़क बनाई गई है।
पहारू - यहां तो सड़कें नहीं, गड्ढों में प्लास्टिक पड़ी मिलती हैं।
3.समारू - फिल्म अभिनेता ओमपुरी ने सांसदों को अनपढ़ व गंवार कहा।
पहारू - अब सांसद, इसे उनकी सनक करार दे रहे हैं।
4.समारू - अन्ना, अब चुनाव सुधार पर आंदोलन करने वाले हैं।
पहारू - पहले अवाम को वोट की अहमियत बतानी पड़ेगी।
5.समारू - स्वामी अग्निवेश की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं।
पहारू - मुश्किलें भी आती हैं तो चारों ओर से।
पहारू - ऐसा लगता है, मीडिया में बहार आ गई है।
2.समारू - खबर है, बंगलौर में प्लास्टिक से सड़क बनाई गई है।
पहारू - यहां तो सड़कें नहीं, गड्ढों में प्लास्टिक पड़ी मिलती हैं।
3.समारू - फिल्म अभिनेता ओमपुरी ने सांसदों को अनपढ़ व गंवार कहा।
पहारू - अब सांसद, इसे उनकी सनक करार दे रहे हैं।
4.समारू - अन्ना, अब चुनाव सुधार पर आंदोलन करने वाले हैं।
पहारू - पहले अवाम को वोट की अहमियत बतानी पड़ेगी।
5.समारू - स्वामी अग्निवेश की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं।
पहारू - मुश्किलें भी आती हैं तो चारों ओर से।
शनिवार, 20 अगस्त 2011
अन्ना, अनशन और सरकार

वैसे अन्ना हजारे का जैसा नाम है, वैसे ही काम व समाज सुधार के लिए वे जाने जाते हैं। कई दशकों के अपने सामाजिक उत्थान के कार्यों के दौरान वे दर्जन भर से अधिक बार ‘अनशन’ कर चुके हैं और उन्हें हर बार सफलता मिली है। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव ‘सिद्ध’ से उनकी समाज सेवा की जो शुरूआत हुई, वह आज भी जारी है। महाराष्ट्र सरकार से इन कई दशकों में उनका कई बार ‘अनशन’ के माध्यम से दो-दो हाथ हो चुका है। सरकारी अधिकारी-कर्मचारियों की एक ही जगह पर तीन बरसों के भीतर दोबारा पदस्थापना नहीं करने की उनकी मांग पर महाराष्ट्र सरकार झुकी थी, वहीं मंत्रियों की खिलाफत में भी सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी। सूचना के अधिकार कानून के लिए भी उन्होंने अनशन किया था।
अन्ना हजारे के अब तक आंदोलनों पर नजर डालें तो पाते हैं कि उनके सभी आंदोलन गांधीवादी व अहिंसक रहे और लाखों-करोड़ों लोगों का उन्हें समर्थन मिला। अब वे मजबूत लोकपाल बिल अर्थात जनलोकपाल बिल लाने के लिए अनशन का सहारा ले रहे हैं, वह भी अहिंसक है। वे बार-बार देश की अवाम को यही कहते रहते हैं कि कोई भी परिस्थिति में हिंसा नहीं करनी है और न ही, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना है। इस बात का समर्थन उन्हें मिल भी रहा है। अन्ना के अनशन को कई दिन हो गए हैं, लेकिन देश में किसी भी जगह से ऐसी किसी हिंसा की बात सामने नहीं आई है। यह किसी भी आंदोलन की सफलती की कहानी कहती है। यही लड़ाई सरकार के लिए फजीहत बन गई और सरकार को न तो खाते बन रही है और न ही उगलते। सरकार ने अन्ना हजारे पर भ्रष्टाचार समेत अन्य गंभीर आरोप लगाए, मगर यह दांव उल्टा पड़ गया और अन्ना की आंधी के आगे सरकार ठिठक कर रह गई। जनता ने अन्ना का पूरा समर्थन किया और सरकार के कारिंदे एक-दूसरे को कोसते रहे कि अन्ना पर व्यक्तिगत हमला नहीं करना चाहिए था।
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह का भी इस विधेयक को लेकर ढुलमुल रवैया नजर आ रहा है। कभी वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री को भी इसके दायरे में आना चाहिए, फिर कैबिनेट की बैठक में मंत्रियों से मशविरा बाद यह बात कही जाती है कि सरकार को यह मंजूर नहीं कि जो लोकपाल बिल बने, उसके दायरे में प्रधानमंत्री भी आए। यहां हमारा यही कहना है कि आखिर यूपीए सरकार इतनी डरी-सहमी क्यों है ? जब उनके प्रधानमंत्री ईमानदार माने जाते हैं, ये अलग बात है कि उनके प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान आजाद भारत में सबसे अधिक भ्रष्टाचार हुए हैं। सरकार में बैठे मंत्री, खासकर वे जो जन लोकपाल बिल का विरोध कर रहे हैं, शायद उन्हें यह लगता होगा कि टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए. राजा ने प्रधानमंत्री की ओर उंगली उठाई है और यहां तक मुंह खोल दिया कि वे जो भी करते रहे, वह पहले से चलता आ रहा था तथा उसकी जानकारी प्रधानमंत्री को थी। इस बात का खुलासा होने के बाद शुतुरमुर्ग की तरह सोया विपक्ष के भी कान खड़े हो गए और वे प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़े करने लगे। विपक्ष के निशाने पर प्रधानमंत्री आ गए। यही बात है, जो शायद सरकार को डरा रही है, नहीं तो प्रधानमंत्री को दायरे में आखिर कैसी हिचक होनी चाहिए।
संविधान में कई फेरबदल की बात या अन्य पेचीदगियों का हवाला देकर प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल से बाहर रखने की बात पर जोर दे रहे हैं, किन्तु हमारा यही कहना है कि यही वह सरकार है, जो जनतंत्र की नींव मजबूत करने के लिए देश की जनता को 2005 में ‘सूचना का अधिकार’ कानून समर्पित करती है। जो आज हर जागरूक जनता का मजबूत हथियार है, जिसके बदौलत कई घपले भी उजागर हुए हैं और व्यूरोक्रेसी भी तिलमिलाई हुई है। इसे इसी बात से जाना जा सकता है कि इसी साल 8 आरटीआई ( सूचना के अधिकार ) कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई। खैर, सूचना का अधिकार के अलावा एक बात और है, जब हम संविधान को सर्वोच्च मानते हैं और चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री या उसके बाद वे अपनी संपत्ति की घोषणा कर एक मिसाल पेश करते हैं तो फिर खुद को लोकपाल के दायरे में लाने, हिचक क्यों ? यह एक ऐसा सवाल है, जिसे देश की जनता पूछ रही है।
अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल तथा संसद की स्टैंडिंग कमेटी के पास पहुंचा सरकारी लोकपाल बिल में वैसे मतभेद कई हैं, मगर तीन बातों पर प्रमुख रूप से मतभेद हैं। इनमें पहला प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की है, जो मांग अन्ना टीम ने की है, मगर सरकार इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। जनलोकपाल के ड्राफ्ट में ज्यूडिशरी को शामिल करने के साथ सांसदों से लेकर बड़े से छोटे अधिकारियों-कर्मचारियों को दायरे में लाने की अन्ना की टीम कवायद कर रही है। इस मामले में भी सरकार नहीं चाहती कि ज्यूडशरी, लोकपाल के दायरे में आए।
अब तो एक तीसरे लोकपाल बिल का ड्राफ्ट को तैयार किया गया है, वह है समाजसेवी अरूणा राय व उनकी टीम ने। इसे प्राइवेट प्रस्ताव रखकर संसद में पेश कराने की तैयारी है, हालांकि इसमें अन्ना हजारे की तरह जोर नहीं दिया गया है कि सरकार उनकी बात या ड्राफ्ट को स्वीकार करे। दूसरी अन्ना हजारे व उनकी टीम का कहना है कि वे जनलोकपाल बिल से कम कुछ नहीं चाहते। सरकार की ओर से अभी तक स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा जा रहा है, बस इतना कहा जाता है कि बातचीत के रास्ते खुल हैं और अन्ना टीम का भी बयान आता है कि वे भी बातचीत करने तैयार हैं, लेकिन आखिर यह पहल करने तो कौन ? किसी को तो आगे आना होगा, तभी बिल पर विचार-विमर्श हो सकेगा, नहीं तो ऐसा ही चलता रहेगा।
सरकार अकड़ी बैठी रहेगी और अन्ना, अपना अनशन जारी रखेंगे, जनता भी पल-पल पर नजर बनाए रखी हुई है। मीडिया भी लोगों की आंख-कान बने बैठा है। सवाल यह है कि आखिर बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन ? जनता तो चाहती है कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो, उन्हें यह नहीं मालूम हो कि इसके लिए कारगर ‘लोकपाल बिल’ कौन सा होगा ? अवाम की सोच यही है कि देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो और भ्रष्टाचारियों की कारगुजारियों पर लगाम लगे और कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत तरक्की करे। यह सही भी है कि देश के विकास को भ्रष्टाचार ने लील लिया है। भ्रष्टाचार कर विदेशो में धन जमा कराकर देश को खोखला किया जा रहा है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार मिटाने की एक आवाज पर देश की करोड़ों जनता सड़क पर उतर आई है। उसे यह मतलब नहीं कि कौन क्या चाहता है, सरकार क्या चाहती है। जनता को बस भ्रष्टाचार मुक्त भारत चाहिए, जिसके बाद उनकी खुशहाली व तरक्की की राह खुलती है।
अन्ना हजारे के अब तक आंदोलनों पर नजर डालें तो पाते हैं कि उनके सभी आंदोलन गांधीवादी व अहिंसक रहे और लाखों-करोड़ों लोगों का उन्हें समर्थन मिला। अब वे मजबूत लोकपाल बिल अर्थात जनलोकपाल बिल लाने के लिए अनशन का सहारा ले रहे हैं, वह भी अहिंसक है। वे बार-बार देश की अवाम को यही कहते रहते हैं कि कोई भी परिस्थिति में हिंसा नहीं करनी है और न ही, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना है। इस बात का समर्थन उन्हें मिल भी रहा है। अन्ना के अनशन को कई दिन हो गए हैं, लेकिन देश में किसी भी जगह से ऐसी किसी हिंसा की बात सामने नहीं आई है। यह किसी भी आंदोलन की सफलती की कहानी कहती है। यही लड़ाई सरकार के लिए फजीहत बन गई और सरकार को न तो खाते बन रही है और न ही उगलते। सरकार ने अन्ना हजारे पर भ्रष्टाचार समेत अन्य गंभीर आरोप लगाए, मगर यह दांव उल्टा पड़ गया और अन्ना की आंधी के आगे सरकार ठिठक कर रह गई। जनता ने अन्ना का पूरा समर्थन किया और सरकार के कारिंदे एक-दूसरे को कोसते रहे कि अन्ना पर व्यक्तिगत हमला नहीं करना चाहिए था।
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह का भी इस विधेयक को लेकर ढुलमुल रवैया नजर आ रहा है। कभी वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री को भी इसके दायरे में आना चाहिए, फिर कैबिनेट की बैठक में मंत्रियों से मशविरा बाद यह बात कही जाती है कि सरकार को यह मंजूर नहीं कि जो लोकपाल बिल बने, उसके दायरे में प्रधानमंत्री भी आए। यहां हमारा यही कहना है कि आखिर यूपीए सरकार इतनी डरी-सहमी क्यों है ? जब उनके प्रधानमंत्री ईमानदार माने जाते हैं, ये अलग बात है कि उनके प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान आजाद भारत में सबसे अधिक भ्रष्टाचार हुए हैं। सरकार में बैठे मंत्री, खासकर वे जो जन लोकपाल बिल का विरोध कर रहे हैं, शायद उन्हें यह लगता होगा कि टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए. राजा ने प्रधानमंत्री की ओर उंगली उठाई है और यहां तक मुंह खोल दिया कि वे जो भी करते रहे, वह पहले से चलता आ रहा था तथा उसकी जानकारी प्रधानमंत्री को थी। इस बात का खुलासा होने के बाद शुतुरमुर्ग की तरह सोया विपक्ष के भी कान खड़े हो गए और वे प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़े करने लगे। विपक्ष के निशाने पर प्रधानमंत्री आ गए। यही बात है, जो शायद सरकार को डरा रही है, नहीं तो प्रधानमंत्री को दायरे में आखिर कैसी हिचक होनी चाहिए।
संविधान में कई फेरबदल की बात या अन्य पेचीदगियों का हवाला देकर प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल से बाहर रखने की बात पर जोर दे रहे हैं, किन्तु हमारा यही कहना है कि यही वह सरकार है, जो जनतंत्र की नींव मजबूत करने के लिए देश की जनता को 2005 में ‘सूचना का अधिकार’ कानून समर्पित करती है। जो आज हर जागरूक जनता का मजबूत हथियार है, जिसके बदौलत कई घपले भी उजागर हुए हैं और व्यूरोक्रेसी भी तिलमिलाई हुई है। इसे इसी बात से जाना जा सकता है कि इसी साल 8 आरटीआई ( सूचना के अधिकार ) कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई। खैर, सूचना का अधिकार के अलावा एक बात और है, जब हम संविधान को सर्वोच्च मानते हैं और चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री या उसके बाद वे अपनी संपत्ति की घोषणा कर एक मिसाल पेश करते हैं तो फिर खुद को लोकपाल के दायरे में लाने, हिचक क्यों ? यह एक ऐसा सवाल है, जिसे देश की जनता पूछ रही है।
अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल तथा संसद की स्टैंडिंग कमेटी के पास पहुंचा सरकारी लोकपाल बिल में वैसे मतभेद कई हैं, मगर तीन बातों पर प्रमुख रूप से मतभेद हैं। इनमें पहला प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की है, जो मांग अन्ना टीम ने की है, मगर सरकार इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। जनलोकपाल के ड्राफ्ट में ज्यूडिशरी को शामिल करने के साथ सांसदों से लेकर बड़े से छोटे अधिकारियों-कर्मचारियों को दायरे में लाने की अन्ना की टीम कवायद कर रही है। इस मामले में भी सरकार नहीं चाहती कि ज्यूडशरी, लोकपाल के दायरे में आए।
अब तो एक तीसरे लोकपाल बिल का ड्राफ्ट को तैयार किया गया है, वह है समाजसेवी अरूणा राय व उनकी टीम ने। इसे प्राइवेट प्रस्ताव रखकर संसद में पेश कराने की तैयारी है, हालांकि इसमें अन्ना हजारे की तरह जोर नहीं दिया गया है कि सरकार उनकी बात या ड्राफ्ट को स्वीकार करे। दूसरी अन्ना हजारे व उनकी टीम का कहना है कि वे जनलोकपाल बिल से कम कुछ नहीं चाहते। सरकार की ओर से अभी तक स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा जा रहा है, बस इतना कहा जाता है कि बातचीत के रास्ते खुल हैं और अन्ना टीम का भी बयान आता है कि वे भी बातचीत करने तैयार हैं, लेकिन आखिर यह पहल करने तो कौन ? किसी को तो आगे आना होगा, तभी बिल पर विचार-विमर्श हो सकेगा, नहीं तो ऐसा ही चलता रहेगा।
सरकार अकड़ी बैठी रहेगी और अन्ना, अपना अनशन जारी रखेंगे, जनता भी पल-पल पर नजर बनाए रखी हुई है। मीडिया भी लोगों की आंख-कान बने बैठा है। सवाल यह है कि आखिर बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन ? जनता तो चाहती है कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो, उन्हें यह नहीं मालूम हो कि इसके लिए कारगर ‘लोकपाल बिल’ कौन सा होगा ? अवाम की सोच यही है कि देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो और भ्रष्टाचारियों की कारगुजारियों पर लगाम लगे और कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत तरक्की करे। यह सही भी है कि देश के विकास को भ्रष्टाचार ने लील लिया है। भ्रष्टाचार कर विदेशो में धन जमा कराकर देश को खोखला किया जा रहा है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार मिटाने की एक आवाज पर देश की करोड़ों जनता सड़क पर उतर आई है। उसे यह मतलब नहीं कि कौन क्या चाहता है, सरकार क्या चाहती है। जनता को बस भ्रष्टाचार मुक्त भारत चाहिए, जिसके बाद उनकी खुशहाली व तरक्की की राह खुलती है।
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