मंगलवार, 4 जून 2013

बातों-बातों में...

मिशन के महाशय खिलाड़ी
जहां पैसे के मिशन का खेल चल रहा हो, भला वहां कैसे ‘शिक्षा का मिशन’ फलीभूत हो सकता है। यहां भी यही हाल है। जिस ध्येय से मिशन शुरू हुआ, वह किसी और ‘मिशन’ में नजर आ रहा है। इस तरह जिन नौनिहालों की फिक्र सरकार ने की थी, उनके भविष्य का बंटाधार होना तय ही है। जब खुद की जेब भरने का मिशन ही याद हो और ‘शिक्षा के मिशन’ को ‘पठेरे’ पर टांग दिया गया हो, वहां शिक्षा और छात्रों का, गर्त में जाना तो तय ही है। नौनिहालों को देश का भविष्य कहा जाता है, फिलहाल वे, उन महाशय जुगाड़ के खिलाड़ियों के भविष्य बनाने का जरिया साबित हो रहे हैं, जिनके कंधों पर नौनिहालों का बेड़ापार लगाने की जवाबदेही है। लेकिन वे समझे, तब ना।

कंकड़ के ‘लखपतिदेव’
कहा जाता है जुगाड़ू, अपना जुगाड़ बना ही लेता है। हाल में धान की व्यापक पैमाने पर खरीदी हुई। इस दौरान जैसे-तैसे कर जो कमाए, वो चटकन-बुटकन के रहे। अब असली कमाई का दौर शुरू हुआ है, खरीदे गए धान में ‘कंकड़’ मिलाने का। जाहिर है, कंकड़ मिलाएंगे तो धान भी अलग से पैसे उगलेगा। निश्चित ही बड़े साहब के मन में ‘कंकड़’ से लगाव नजर आ होगा। तभी तो कंकड़बाजों पर उनकी नजर नहीं जाती और जाती भी है तो, नजरें टेढ़ी नहीं होती। ऐसे में जब कंकड़ से ‘लखपति’ बनने का दौर चल रहा हो तो वे क्यों नहीं चाहेंगे, बहती गंगा में हाथ धोना...।

मिसफिट होने का गम...
‘खाओ-खिलाओ’ वाले विभाग के बड़े साहब की सोच व नजरिया लाजवाब है। उन्हें विभाग के घपले व गड़बड़ी नजर नहीं आती। यही वजह है कि बरसों से जमे होने के बाद भी एक बड़ी कार्रवाई नहीं कर सके। इसे अब हम उनकी सुस्ती मानें कि बरसों न खत्म होने वाली ‘मन-भूख’। दरअसल, साहब को अपने विभाग से काफी शिकवे-शिकायतें हैं। उनके पास जो गया, समझो वे ‘दुहाई’ खाकर ही बाहर आता है। साथ ही वे खुद को विभाग में ‘मिसफिट’ मानते हैं, उन्हें ये दर्द हमेशा सालते रहता है, जबकि पैसे वे चौरतफा कमा रहे हैं, एक इस तरीके से, बाकी न जाने...। विभाग में साख इतनी कमजोर कि शरीर से दबंग होने के बाद भी उन्हें कोई घास नहीं डालता। बेचारे... हमेशा रोते रहते हैं, उन्हें बनना क्या था और बन क्या गए ?

...जेब में बढ़ती हरियाली
देखिए, जिले में हरियाली लाने के लिए करोड़ों फूंक दिए गए। नतीजा, हरे-भरे पौधे, पेड़ तो नहीं बने, किन्तु साहब और बाबूओं की जेबों की हरियाली सौ फीसदी जरूर बढ़ गई। पहले जो जेबें फटी होती थीं या कहें ‘अठन्नी’ भी चाय के नाम पर नहीं निकलती थी। आज उन जेबों से ‘करारे’ निकलते हैं। जाहिर है, हरियाली की बयार अभी जेबों में ही बह रही है, अन्यत्र तो कहीं दिखाई नहीं देती। लाखों पौधों के आज जितनी पत्ती होती, मानो उतने ही ‘करारे’ के जलवे हैं। पहले के हिसाब हरियाली का आनंद हजारों लोग उठाते, इनके रहमो-करम के बाद, अब जेबों तक ही ‘हरियाली’ लहालहा रही है।

बुधवार, 29 मई 2013

बातों-बातों में...

‘मनभेद’ न पड़ जाए भारी
विधानसभा चुनाव के नजदीक है, लेकिन नेताओं में ‘मनभेद’ कायम है। नतीजा, सियासी गर्मी का पारा भी बढ़ने लगा है। दो विरोधी पार्टी के नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप राजनीति में स्वाभाविक नजर आती है, लेकिन अपने ही ‘अपने’ की कब्र खोदने लगे तो फिर ‘पार्टी’ का बंटाधार होना लाजिमी है। ऐसे नजारे, चुनाव के पहले ही नजर आने लगे हैं। एक-दूसरे को निपटाने, अभी से ही सियासी गणित बिठाए जा रहे हैं। समझा जा सकता है कि ये ‘मनभेद’ कितनी भारी पड़ सकती है ? हालांकि, कहने वाले कहते हैं कि ये तब होता है, जब एक-दूसरे से कोई भी ‘खुद’ को छोटा समझना ही नहीं चाहता।

साहब की ‘पड़ोसी’ मेहरबानी...
इतना सब जानते ही हैं कि एक पड़ोसी की कितनी अहमियत होती है। सुख-दुख में वे साथ होते हैं। इस मामले में हमारे साहब, कुछ हटके हैं। उन्हें पड़ोसी से क्या और कितना लाभ मिलता है, ये तो वे ही जानें, किन्तु पड़ोसियों के जरूर बल्ले-बल्ले हैं। जब से साहब ‘वहां’ से आए हैं, तब से पड़ोसियों की आवभगत जमकर हो रही है और उन पर साहब की मेहरबानी भी जगजाहिर हो गई है। यही वजह है कि साहब के ईर्द-गिर्द ‘पड़ोसी’ मंडराते रहते हैं। कभी यही पड़ोसी, ‘यहां’ झांकने तक नहीं आते थे। लगता है, लगाव का कारण कुछ खास है। आखिर यह तो सच है कि जहां ‘गुड़’ होगा, वहां ‘मक्खी’ तो भिनभिनाएंगे ही...।

...आपका ये दिलवालापन
शिक्षा ‘सर्व’ पहुंचाने की जिस साहब पर जिम्मेदारी है, उनका दिलवालापन का क्या कहें...। उनकी समझ में तो शासन की सारी योजनाएं ही बंदरबाट के लिए बनी है। उनके ‘दिलवालेपन’ का शुरूर चढ़े तो वे शासन का ही ‘दिवाला’ निकाल दे। तभी तो चंद रूपये की नहीं, लाखों के बाद, अब वे करोड़ों के ‘खिलाड़ी’ साबित हो रहे हैं। बंदरबाट में निश्चित ही उनकी कोई सानी नहीं है, जितना कर दे, कम है। लगता है कि शासन के पैसे को वे खुद का समझते हैं, न कोई नियम, न कायदे। जहां चाहो, जैसे चाहो, अपने तरीके से खर्च कर डालो। कोई पूछने तो आएगा नहीं, जो आएगा, उन्हें भी ‘दो-चार’ देकर चलता कर दो। साहब के ‘खाओ-खिलाओ’ का पाठ खूब पढ़ा जा रहा है, यह कब तक पढ़ा जाएगा, इसकी भी खूब चर्चा जरूर हो रही है।

उनकी ‘लाइन’ का दर्द
सुरक्षा वाले एक साहब, कहा करते थे, वे कभी ‘लाइन’ में नहीं रहे। उनकी ‘चाहत’ अब पूरी हो गई है। ऐसा लगता है, जैसे अंतिम छोर में होने की वजह से कुछ ज्यादा ही बे-लगाम हो गए थे, जिसके बाद बड़े साहब ने उन पर ‘लाइन’ की लगाम डाल दी। अब उन्हें ‘लाइन’ का दर्द सालने लगा है। जहां थे, वहां के रौब के सामने लाइन का काम उन्हें रास नहीं आ रहा है। वे बड़े चिंतित हैं। अब करे तो क्या करें, बड़े साहब से मनमुटाव का नतीजा भोगना पड़ता है। खैर, वे ‘लाइन’ को काफी याद किया करते थे, इसलिए कुछ उन्हें ‘लाइन’ का मजा भी ले लेना चाहिए। फिर पता चलेगा कि लाइन में ‘मलाई’ का आनंद है या फिर वहां, जहां रहते आए हैं।

सोमवार, 20 मई 2013

बातों-बातों में...

घोटालों का मिशन
स्वतंत्रता के समय ‘मिशन’ का मतलब कुछ और था, मगर आज मिशन की परिभाषा ही बदल दी गई है। जिस विभाग को शिक्षा के विकास का मिशन पूरा करने की जिम्मेदारी दी गई है, वह तो घोटालों के मिशन की फेहरिस्त लंबी करता जा रहा है। वैसे कागज रंगने से किसी गरीब का पेट नहीं भरता, लेकिन मिशन वाले अफसरों की जेबें जरूर भरती हैं। इसीलिए कभी ‘व्हाइट’ तो कभी ‘बिजली’ से जेबें गर्म होती हैं। बिजली से सभी को करंट लगता है, परंतु मिशन के साहब हैं कि उन्हें बिजली व व्हाइट से ही खासे लगाव हैं।

लगा लो एड़ी-चोटी...
विधानसभा चुनाव होने में 6 महीने बचे हैं, लेकिन सियासी पारा अभी से चढ़ गया है। कई टूटपूंजिए नेता भी अपनी साख बताकर, टिकट के लिए एड़ी-चोटी एक कर रहे हैं। देखने वाली बात होगी, उनका चुनावी बुखार कब तक उतरता है ? निश्चित ही, जब टिकट का दौर खत्म हो जाएगा और किसी एक नाम पर मुहर लग जाएगी। इसके बाद शुरू होगा, हराने-जिताने एड़ी-चोटी का खेल। दम-खम का खेल, जो अभी शुरू हुआ है, वह आगे भी जारी रहेगा। मजे लेने वाले तक खूब मजे ले रहे हैं। खेल कोई और रहा है, खिलाड़ी कोई और है, देखने वाले दर्शक तो मजे लेंगे ही न।

...कब सुधरोगे महोदय
पढ़ाई-लिखाई वाले साहब को ‘शिक्षा’ को अग्रसर करने के बजाय ‘फर्नीचर-फर्नीचर’ खेलने में बड़ा मजा आता है। पहले भी जब वे तैनात थे तो फर्नीचर का खेल खूब खेला गया। एक बार फिर वही खेल, खेलने की तैयारी पूरी कर ली गई है। लकड़ी, भला किसे सौगात दे सकती है, परंतु ये साहब तो पत्थर से भी पानी निकालने वाले हैं। लिहाजा, लकड़ी से भी पैसे का रस निकालने में भी माहिर हैं। ऐसे में उनका पूरा अनुभव है, जिसका लाभ उठाने की एक बार फिर जुगत भिड़ा दी गई है और इस तरह ‘फर्नीचर-फर्नीचर’ का खेल दोबारा शुरू हो गया है। यही वजह है कि उन्हीं के कई बंदे कहने लगे हैं, ...कब सुधरोगे महोदय।

नेेता बनाम सपनों के सौदागर
जिले में कुछ नेता, राजनीति कम करते हैं, वे सपनों के सौदागर बनकर ज्यादा घूमते हैं और राजनीति का झोला ओढ़कर ‘सपने’ बेचने का काम करते हैं। कोई बेरोजगार दिखा नहीं कि शुरू हो गए, उन्हें नौकरी का सब्जबाग दिखाने। इस तरह सपनों के सौदागर बनकर लाखों रूपये का जुगाड़ भी हो जाता है। देखा जाए तो सपना देखने से कुछ मिलता नहीं है, लेकिन वे नेता, सपनों की सौदागरी में इतने माहिर हैं कि बेरोजगारों को दिन के सपने भी सच लगते हैं और फिर नौकरी की खातिर सौंप देते हैं, अपनी जीवन भर की कमाई। हालांकि, सपने पूरे होने के पूरे दावे किए जाते हैं, लेकिन गारंटी कुछ नहीं होती। सपनों को बेचने का ताना-बाना बुनने का तमाशा,  अरसे से चल रहा है, क्योंकि नेतागिरी की गाड़ी को ‘ईंधन’ यहीं से मिलता है।

शुक्रवार, 17 मई 2013

बसपा में टिकट के लिए माथापच्ची

जांजगीर-चांपा। बसपा में अक्सर देखा गया है कि शीर्ष नेतृत्व ने चुनाव में जो नाम तय कर लिया, वही पार्टी का उम्मीद्वार होता है। चुनाव के पहले भी किसी तरह की लॉबिंग नजर नहीं आती थी, लेकिन अब कांग्रेस व भाजपा की तरह बसपा में भी टिकट के लिए लॉबिंग शुरू हो गई है। बसपा के वरिष्ठ नेताओं ने तो प्रदेश के सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही है। जिले की बात करें तो 6 सीटों में से 3 के लिए प्रत्याशी के नाम का चयन हो गया है, मगर 3 सीटों पर पार्टी के नेताओं में ही रस्साकस्सी शुरू हो गई है। साथ ही बसपा के स्थानीय नेताओं ने अपनी जीत के दावे के साथ, शीर्ष नेतृत्व को साधना शुरू कर दिया है। इस दौरान जीत के दावे के अलावा राजधानी रायुपर तक चक्कर लगाए जा रहे हैं। इस तरह बसपा में भी टिकट की माथापच्ची शुरू हो गई है। जांजगीर-चांपा विस से पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ता व जिला पंचायत के पूर्व सदस्य मेलाराम कर्ष की दावेदारी के बाद, अन्य संभावित उम्मीद्वारों की नींद हराम हो गई है, क्योंकि श्री कर्ष, बसपा के साथ बरसों से जुड़े हुए हैं और जमीनी स्तर के कार्यकर्ता माने जाते हैं। लिहाजा, बसपा की राजनीति में अचानक ही हलचल बढ़ गई है।
इधर जिले की सीटों पर बसपा की खास नजर है, क्योंकि वर्तमान में पार्टी के 2 विधायक काबिज हैं। साथ ही पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा के कई प्रत्याशियों ने विधानसभा चुनाव में दमदार उपस्थिति दर्ज कराई थी। यही वजह रही कि पामगढ़ के सीटिंग एमएलए दूजराम बौद्ध के साथ ही जैजैपुर से केशव चंद्रा और सक्ती विधानसभा से सहसराम कर्ष का नाम पहले से ही तय हो गया है। इसके इतर अकलतरा, जांजगीर-चांपा व चंद्रपुर विधानसभा सीटों से नाम फाइनल होना शेष है, जिसके लिए संभावित उम्मीद्वारों ने जोर आजमाइश शुरू कर दी है।
छग में बहुजन समाज पार्टी ने नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए प्रत्याशियों के नाम की पहली सूची जारी किया और निश्चित ही चुनावी तैयारी में आगे रही। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में राजधानी रायपुर से लेकर कई अन्य शहरों में भी बसपा की बैठकें होने की खबर है। पिछले दिनों पार्टी के वरिष्ठ नेता राजाराम का बयान आया है कि जिन सीटों पर नाम तय नहीं हुआ है, उसमें मई अंत तक फैसला ले लिया जाएगा। यही कारण है कि जिले की, जो 3 सीटों पर नाम तय नहीं हुआ है, उसके लिए दावेदारों के साथ ही, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में माथापच्ची शुरू हो गई है, क्योंकि जीत के दावे सभी दावेदार कर रहे हैं। ऐसे में सशक्त व जीत दर्ज कर बसपा का परचम लहरा सकने वालों पर, वरिष्ठ नेताओं की नजर बनी हुई है।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों में प्रत्याशी चयन में चूक हुई थी, जिसकी वजह से पार्टी को काफी नुकसान हुआ। हालांकि, वरिष्ठ नेता इस बात से भी संतुष्ट नजर आते हैं कि पामगढ़ व अकलतरा की सीट बसपा की झोली में आई और जैजैपुर, सक्ती तथा चंद्रपुर में पार्टी प्रत्याशियों ने जमदार उपस्थिति दर्ज कराई थी। यहां तक जैजैपुर विस में तो बसपा के प्रत्याशी केशव चंद्रा ने दूसरा स्थान हासिल कर राजनीतिक गणित को ही बदल दिया था एवं सत्ताधारी दल भाजपा के प्रत्याशी निर्मल सिन्हा को तीसरे स्थान पर ढकेल दिया। इस तरह पिछले चुनाव की तरह ही जिले में पूरी मजबूती के साथ बसपा के उतरने के दावे, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा भी किए जा रहे हैं। महीनों पहले जांजगीर के हाईस्कूल मैदान में बसपा का बड़ा सम्मेलन भी आयोजित हुआ था, जहां कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने पार्टी महासचिव राजाराम पहुंचे थे। साथ ही कई वरिष्ठ नेता भी उपस्थित थे। इस दौरान भी पार्टी का डंका विधानसभा चुनाव में बजाने के लिए कार्यकर्ताओं ने जोर-शोर से संकल्प लिया था। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर चुनावी गणित को बिगाड़ने में, बसपा कामयाब हो सकती है। दूसरी ओर पामगढ़ में बसपा काफी मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। यदि वहां कांग्रेस व भाजपा ने प्रत्याशी चयन में चूक की तो पामगढ़, एक बार फिर बसपा की झोली में जा सकती है। अन्य सीटों पर भी बसपा कड़ी टक्कर देने की स्थिति में नजर आ रही है। अब देखने वाली बात होगी कि आने वाले दिनों में जिले का राजनीतिक परिदृश्य क्या होता है ? और बसपा को कितना नफा या नुकसान होता है ?

बसपा मुक्ति मोर्चा का भी पड़ेगा प्रभाव
बहुजन समाज पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद पूर्व प्रदेशाध्यक्ष दाऊराम रत्नाकर ने ‘बहुजन समाज मुक्ति मोर्चा पार्टी’ बनाया है और कार्यकर्ताओं को जोड़ना भी शुरू कर दिया है। बताया जाता है कि बसपा के अधिक कार्यकर्ता ही, उनके साथ आ रहे हैं, क्योंकि पार्टी में कई दशकों तक उनका दखल बना हुआ था। बसपा के अनेक कार्यकर्ता, बसपा मुक्ति मोर्चा के साथ, चुनाव नजदीक आने पर ताल ठोंक सकते हैं, हालांकि अभी सीधे तौर पर श्री रत्नाकर के साथ वे नजर नहीं आ रहे हैं। इतना जरूर है कि बसपा से जिन नेताओं को टिकट नहीं मिलेगी, उनकी बसपा मुक्ति मोर्चा के जुड़ने की संभावना अधिक जतायी जा रही है।
जांजगीर में पिछले दिनों प्रेस कांफ्रेस आयोजित कर श्री रत्नाकर ने विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों को उतारने की बात कही थी। उनकी जिले की सीटों पर खासी नजर है, क्योंकि वे यहां से बिलांग करते हैं। बरसों तक बसपा में यहीं से राजनीति करते रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि बसपा की तर्ज पर बसपा मुक्ति मोर्चा की भी विचारधारा स्व. कांशीराम से ओत-प्रोत है। ऐसे में ‘एक विचारधारा और दो पार्टी के काम्बिनेशन’ को मतदाता कितना तवज्जो देंगे, यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा ?

अकलतरा से कौन होगा बसपा प्रत्याशी ?
अकलतरा विधानसभा से बसपा की टिकट पर सौरभ सिंह चुनाव जीते थे। हालांकि, वे चुनावी जीत के बाद से ही बसपा से कटे-कटे रहे। पार्टी कार्यक्रमों से भी उनका किनारा रहा। चर्चा है कि अकलतरा विधायक श्री सिंह, कांग्रेस में शामिल होंगे। इसके लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सीढ़ी तैयार कर ली है। अब सवाल यह है कि बसपा, अकलतरा विधानसभा सीट से इस बार किसे अपना प्रत्याशी बनाएगी ? ठीक है, क्षेत्र में कई ऐसे कार्यकर्ता होंगे, जो पार्टी के लिए बरसों से काम करते रहे होंगे, मगर चुनाव जीतने में, क्या वे कामयाब होंगे ? ऐसी कई बातें रहेंगी, जिस पर गौर करके ही पार्टी, टिकट देगी। वैसे भी सभी की नजर अभी अकलतरा विधानसभा सीट पर है, क्योंकि बसपा से सौरभ सिंह ने अलविदा करने का पूरी तरह मन बना लिया है, केवल ‘कांग्रेस प्रवेश’ की औपचारिक घोषणा ही बाकी रह गई है। दूसरी ओर बसपा के वरिष्ठ नेता राजाराम ने रायपुर में मीडिया को जारी बयान में अकलतरा विधायक श्री सिंह पर कड़ी टिप्पणी की हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि बसपा की राजनीतिक फिजां भी गरमा गई है।

रविवार, 12 मई 2013

’कांग्रेस’ हित में नहीं, ये नीति ?

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस, राज्य निर्माण के पहले जितनी सशक्त थी, अपनी नीतियों की वजह से कुछ बरसों में कमजोर होती गई। यही वजह रही कि कांग्रेस के ‘हाथ’ से सत्ता भी खिसक गई और उसके बाद पिछले 9 बरसों से कांग्रेस व कांग्रेसी, वनवास झेल रहे हैं। देखा जाए तो कांग्रेस के हालात सुधरे नहीं हैं। इतना जरूर है कि पहले की स्थिति से कांग्रेस मजबूत हुई है, किन्तु चुनाव के पहले, जिस तरह की नीति अपनायी जा रही है, वह कहीं कांग्रेस के लिए ही घातक साबित न हो जाए ? वैसे तो सभी पार्टियों में देखने में आता है कि ऐन चुनाव के पहले रूठों को मनाया जाता है, या फिर जिन्होंने किसी कारण से पार्टी से दूरी बना ली थी, उनके लिए पार्टी में आने के द्वार खोल दिए जाते हैं। सबसे अहम सवाल यही है कि क्या, ऐसे लोगों से पार्टी का भला हो पाता है ? पुराने रेकार्ड को भी खंगाला जाए तो बहुत कम ही ऐसे उदाहरण मिलेंगे, जिसमें कभी विरोध में रहे नेताओं के ‘साथ’ आने से पार्टी को लाभ हुआ हो ? अधिकतर मामलों में पार्टियों को नुकसान ही होता है। पता नहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेता अपनी किस रणनीति के तहत ऐसे निर्णय लेते हैं, जो पार्टी के कदम को अग्रसर करने के बजाय, रोड़ा साबित होता है।
2000 में जब छत्तीसगढ़, अलग राज्य बना, उस दौरान कांग्रेस को विधायकों की अधिक संख्या की वजह से चुनाव के बगैर ही, सरकार बनाने का मौका मिला। निश्चित ही, इस समय कांग्रेस का वर्चस्व कायम था। सरकार बनने के बाद भी कांग्रेस की साख कमजोर नहीं हुई थी, लेकिन कांग्रेसियों के मध्य ही आपसी कलह के कारण ही, कांग्रेस को सत्ता से दूर होना पड़ा, जो वनवास अब भी जारी है। उस दौरान कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल, पार्टी से बगावत करके राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। उनके साथ छग के सैकड़ों बड़े चेहरे भी हो लिए और प्रदेश की सभी 90 सीटों पर चुनाव भी लड़ा गया। आलम यह रहा कि कांग्रेस को चारों-खाने चित्त करने में ‘बागी कांग्रेसियों’ का हाथ रहा। इस तरह भाजपा को सत्ता का स्वाद चखने का मौका मिल गया, जिसे 2003 के बाद, 2008 के चुनाव में भी भुनाया गया। इस दौरान भी कांग्रेसी, एक-दूसरे को हराने में लगे रहे। कहने का मतलब यही है कि कांग्रेस, खुद से हारती है, इसके लिए उसकी नीति ही जिम्मेदार मानी जा सकती है। बाद में विद्याचरण शुक्ल ने भाजपा में शामिल होकर महासमुंद से लोकसभा चुनाव भी लड़ा, उस दौरान भी अनेक ‘कथित कांग्रेसी’ उनके साथ रहे। बावजूद, कांग्रेस में उनकी वापसी हुई और उनके साथ फिर वही कांग्रेसी, वापस आए, जो कभी ‘पंजा’ के खिलाफ वोट डालने के लिए गांव-गांव, घर-घर पहुंचे थे।
कांग्रेस, किन नेता को ‘कल का भूला’ बताकर, पार्टी में शामिल करती है, यह उनके अंदरूनी मामले हो सकते हैं, लेकिन कांग्रेस आलाकमान, पार्टी हित में यदि सोचे तो समझा जा सकता है कि जिन नेताओं ने कांग्रेस को कमजोर किया और पार्टी के खिलाफ जाकर चुनावी बिगुल फूंका, वैसे नेताओं की खिदमतगारी, कांग्रेस के हित में नहीं मानी जा सकती। एक तरह से कहें तो कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई, ऐसे लोगों की वापसी से कांग्रेस का, कितना भला होगा, बड़ा सवाल है ? कई बार कांग्रेस में शामिल होने वालों को ‘कांग्रेसी मूल विचारधारा’ के होने का हवाला दिया जाता है, किन्तु ऐसा तर्क गढ़ने वाले कांग्रेसी नेता, यह बता नहीं पाते कि वैसे ‘बागी’ लोगों की कांग्रेस में वापसी से पार्टी को कितना लाभ होगा ? हमारा मानना है कि जिन्होंने पार्टी को गर्त में ढकेला और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया, ऐसे लोगों के ‘मनुहार’ को लेकर कांग्रेस के हाईकमान को जरूर सोचना चाहिए। निश्चित ही, जब भी किसी बागी नेता की पार्टी में वापसी होती है तो उसमें हाईकमान की सहमति होती है, किन्तु यह भी सही है कि कई बड़े नेता, क्षेत्रीय स्थिति की सही जानकारी न देकर, भ्रम में रखकर तथा वापसी को पार्टी हित में बताकर साथ ले लेते हैं, किन्तु धरातल पर हालात अलग होते हैं, जिसका नतीजा, कांग्रेस की हार के तौर पर सामने आता है। छग में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब कांग्रेस को ऐसी स्थिति में नुकसान हुआ है और कांग्रेस के कई कर्मठ सिपहसालारों का भी अहित हुआ है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि कांग्रेस को ऐसे हालात बनने और बनाने से बचना चाहिए, तब कहीं जाकर ‘सत्ता की चाबी’ हाथ आ सकती है और 10 साल के ‘वनवास’ से बेड़ा पार लग सकता है।
राहुल गांधी, साल भर पहले जब रायपुर पहुंचे थे, तो उन्होंने कांग्रेसियों को रिचार्ज किया था और कई बातें पार्टी हित में कही थी, लेकिन लगता है कि उन बातों का असर कांग्रेसी कर्ता-धर्ताओं को नहीं हुआ है, तभी तो कई निर्णय हैं, जिसे लेने से कांग्रेस का हित नहीं हो सकता, वैसे ही निर्णय लेने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। दूसरी बात, राहुल गांधी, जब कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने, उस दौरान उन्होंने सत्ता पाने के लिए कांग्रेसियों की आंख खोल देने वाली कई बातें कही थी। बावजूद, छग में कांग्रेस को मजबूती देने के बजाय, कुछ ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं या लिए जाने के संकेत दिए जा रहे हैं, जो पार्टी को सत्ता की राह पर जाने से ही रोक सकते हैं। राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि पार्टी को मजबूत करना है तो युवा और उन ऊर्जावान कार्यकर्ताओं को सामने लाओ, चुनाव में उनको मौका दो, जो पार्टी हित में बरसों से काम करते आ रहे हैं, उन्हें नहीं, जो पार्टी की राह से ही भटकर कहीं और का दामन थाम लिया हो। उन्होंने सीधे तौर पर कहा था कि जिन्होंने पार्टी के प्रति पूरी वफादारी दिखाई हो। पार्टी को कभी पिठ न दिखाई हो या कहें, कांग्रेस को गर्त में डूबोने का काम न किया हो। ऐसे कांग्रेस कार्यकताओं को आगे लाने का काम होना चाहिए। राहुल गांधी की बातों को कांग्रेसी, आत्मसात करने के दावे करते हैं, लेकिन दिल्ली में कही उन बातों का वजन, छग आते-आते कमजोर हो जाता है। निश्चित ही, छग में कांग्रेस व कांग्रेसी, सत्ता तो चाहते हैं, लेकिन उन नीतियों पर अमल नहीं किया जाता, जिससे होकर ‘सत्ता’ का रास्ता तैयार होता है।
खैर, विधानसभा चुनाव तो नवंबर में होना है, मगर छग कांग्रेस द्वारा लिए जा रहे कुछ निर्णय, जरूर कांग्रेस के ही अंदरूनी धड़ों के मन में असंतोष पैदा कर रहा है। कहा जाता है कि ‘दूध का जला, छांछ को भी फूंक-फूंककर पीता है, लेकिन कांग्रेस के लिए यह ‘कहावत’ बेमानी नजर आती है, तभी तो वही गलतियां बार-बार दोहरायी जा रही हैं, ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं, जो पार्टी हित में नहीं हो सकते। यही कहा जा सकता है कि कांग्रेसी, सत्ता हासिल करने की बात तो करते हैं, लेकिन राहुल गांधी या हाईकमान की बातों की बेपरवाही करके। ऐसे में यदि कांग्रेस, इस बार के विधानसभा चुनाव में भी मात खाती है तो फिर उनकी वही नीतियां ही जिम्मेदार होंगी, जिसके कारण, पिछले दो चुनावांे के बाद से कांग्रेस, ‘वनवास’ झेल रही है।

सोमवार, 18 मार्च 2013

बातों-बातों में...

आपकी ‘सद्विचार अथकथा’
प्रवचन कहने वाला दमदार हो और उनसे किसी को कोई लालसा हो। कोई स्वार्थ हो, निश्चित ही तब तो वह ‘स्व प्रवचन’ को भी आत्मकंठ से अपनाता है। ऐसा ही हाल यहां भी है। उनकी ‘अथकथा’ कभी भी शुरू हो जाती है। न ज्यादा श्रोता चाहिए, न ही मौसम और न ही अवसर। जब भी मौका मिले, दाग दो अपनी ‘सद्विचार अथकथा’ की दो-चार लाइनें। निश्चित ही यह दिमाग को स्फूर्ति देने लायक होती हैं, किन्तु तब तक, जब तक उनसे, उनका काम न हो जाए ? फिर किसे है, चेहरा दिखाने की फुर्सत...।

बुलंदी पर सितारे
साहब कुछ भी कर ले, उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। अंगद की तरह पैर जमाए बैठे ‘साहब’ को कोई डिगा नहीं सकता। चाहे जितना बड़ा आंदोलन हो जाए, लेकिन किसे फर्क पड़ता है। जब सितारे बुलंदी पर हों तो मजाल है, कोई पोस्टिंग से खिसकवा दे ? आजकल, साहब की ही चारों ओर चर्चे हैं। नेता से लेकर आम लोगों, सबकी जुबान पर उनके नाम हैं। वाह साहब, आपके क्या कहने...आपका कीर्ति पताका तो चहुंओर फैल रहा है। आपको बधाई...

...उनकी नोकझोंक की आदत
एक साहब को जैसे नोकझोंक की आदत ही पड़ गई है। वे हमेशा किसी न किसी से उलझ ही जाते हैं। अब पता नहीं, ऐसा वे जान-बूझकर करते हैं, या फिर अफसरी की नई परिभाषा लिखना चाहते हैं ? कभी नेता, कभी वकील, कभी आम लोग, सभी से उनकी तनातनी देखी जा सकती है। निश्चित ही उनमें विकास के लिए कार्य करने का माद्दा नजर आता है, इतने से ही काम नहीं बनने वाला। उसी नोकझोंक के चक्कर में किसी दिन मुश्किल में पड़ गए तो... शायद वे इन बातों की फिक्र नहीं करते। तभी, बेफिक्री उनकी आदत में शुमार हो गई है।

मत बढ़ाइए धड़कनें...
राजनीतिक गलियारे में एक नया दर्द शुरू हो गया है। ये ‘आपने’ क्या कह दिया, जिसके बाद उन ‘सबकी’ धड़कनें तेज हो गई हैं, जिनकी आस ‘यहां’ से बंधी है। वे कह रहे हैं, आपको अपनी बात पर रहना चाहिए। जब आपने तय कर लिया है कि आप ‘कहां’ से लड़ेंगे तो फिर शिगूफा छोड़ने का क्या मतलब। बिला-वजह, उन ‘सबकी’ बीपी बढ़ा दी। अब तो आपके ‘यहां’ नजर आने पर भी कयास लगाए जाएंगे। इस तरह उन ‘सबका’ का मन कह रहा होगा कि इस तरह... मत बढ़ाइए धड़कनें...।

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

बातों-बातों में...

नौकरी बची, लाखों पाए...
बीते दिनों छाती में आग लेकर सड़क पर उतरे शिक्षा के कर्णधार, नौकरी जाते ही ठंडे पड़ गए। पहले न परिवार की चिंता रही और न ही पेट की। हालांकि, उन्हें देर से समझ में आई कि पेट की आग के आगे और कोई दूसरी आग नहीं है। पेट पर लात पड़ने की स्थिति आई तो वह आग और ज्यादा धधकने लगी। फिर क्या था, छाती की आग ठंडी पड़ गई। बस, जुबान से एक बात निकलने लगी, नौकरी बची... लाखों पाए।

आपकी मीठी बातें
साहब की मीठी बातों की हवा अभी खूब चल रही है। हो भी क्यों न, जिन्हें कोई भाव न देता हो, उनकी नजरें उन जैसों को वजनदार मानती हों। ये अलग बात है, जिनकी फिक्र के लिए बैठे हैं, भले ही उन जैसों का बंटाधार हो जाए। अब समझ में आता है कि बातों की जादूगरी किसे कहते हैं, सामने हों तो कुछ और... बंदे के जाने के बाद कुछ और...। खासम-खास बनाने की भी कला, कोई उनसे सीखे। वे काफी आगे हैं, जहां न पहुंचे रवि, वे वहां पहुंच जाते हैं। जहां जाते हैं, दे आते हैं, दो-चार बड़े-बड़े...। फिर क्या, मीठी बातों की दास्तान ही सुनाई देती है। 

आपका कमजोर पड़ना
क्राइम पर कंट्रोल की बड़ी जिम्मेदारी तो है, लेकिन आप कमजोर पड़ जाते हैं। आपको बड़ा दायित्व मिला है, मगर सीनियर के सामने आपकी एक नहीं चलती। यह तो वही हुआ, नाम बड़े, काम छोटे। पहले जहां किसी की नहीं चलती थी, वहां आपके आने के बाद, सबकी चलती है। ये अच्छी बात नहीं, जब आप हैं तो वहां दूसरे की क्यों चले ? लगता है, आप खुद को साबित नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा है तो साबित कीजिए, नहीं तो आपको ये बातें हमेशा सालते रहेगी।
                          
उनके आने के बहाने...
आजकल चंदे का चलन कुछ ज्यादा हो गया है। पहले गणेश व दुर्गोत्सव में चंदे मुक्तकंठ से मांगे जाते थे। अब कोई आया नहीं, चंदे की घंटी बज जाती है। वे बेचारे बड़े चिंतित होते हैं, जब ‘कोई’ आते हैं। घर की भी घंटी बजती है तो उन्हें लगता है कि कोई ‘चंदाखोर’ पहुंच गया है। अब क्या कहें, यही ढर्रा तो चल पड़ा है। दो की जरूरत है, मांग आओ, चार, क्योंकि खुद का भी तो जुगाड़ जरूरी है। वे आते हैं, फजीहत किसी और की बढ़ती है, क्योंकि आने का बोझ सहन करने की क्षमता, जो बनानी पड़ती है।

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

‘घर को आग लगी, घर के चिराग से’

बदलते समय के साथ पारिवारिक रिश्तों में जिस तरह की खाइयां उत्पन्न हो रही है, उसे सशक्त समाज के निर्माण के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता। रिश्तों को तार-तार करने की घटनाएं, जब-जब समाज के सामने आती हैं, उसके बाद समाज में यह मंथन भी शुरू हो जाता है कि आखिर, हम और हमारा समाज किस दिशा में जा रहे हैं ? बीते कुछ दशकों के दौरान जिस तरह की नैतिक गिरावट देखी जा रही है, उसी का नतीजा समाज पर भी दिख रहा है, क्योंकि जो घटेगा, उसका असर जरूर समाज पर पड़ता है। मानवीय सोच में भी भारी बदलाव देखा जा रहा है, जिसके कारण ऐसी घटनाएं होती हैं, जिससे पूरा समाज सन्न रह जाता है और फिर सामाजिक व्यवस्था को आघात लगता है।
जांजगीर-चांपा जिले के सिवनी ( चांपा ) में जो हृदय विदारक घटना सामने आई है, उसने सभी को हिलाकर रख दिया है। जिसने भी वारदात के बारे में सुना, उनकी तीखी प्रतिक्रिया रही। एक चचेरे भाई ने 5 साल की मासूम बच्ची को गला दबाकर मौत के घाट उतार दिया, जबकि वह मासूम उसे ‘चहेता’ भैया मानती थी। शराबखोरी ने एक बार फिर मासूम को अपने आगोश में ले लिया और एक घर का चिराग बुझ गई। उस चिराग को बुझाने का कुकृत्य कार्य किया है, उसी घर के और एक चिराग नहीं। इसी को कहा जाता है कि ‘घर को आग लगी, घर के चिराग से’।
इस घटना ने एक बार फिर लोगों को विचार करने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर मानवीय गिरावट क्यों हो रही है, इसकी वजह क्या है ? कैसे कोई रिश्तों को खून के दाग से सन लेता है, जिस दाग को कभी धोया नहीं जा सकता। ऐसी क्या परिस्थितियां निर्मित होती हैं, जब कोई शैतान बन बैठता है ?
समाज में बिगड़ती इस तरह की स्थिति को लेकर समाजशास्त्री भी मानते हैं कि आधुनिक जीवनशैली के साथ नशाखोरी की प्रवृत्ति से ऐसी घटनाओं को बढ़ावा मिल रहा है। कई बार अंधविश्वास की वजह से समाज में कई बार कुरूप चेहरा भी नजर आता है, जिसे मानसिक असंतुलन के तौर पर देखा जाता है। शिक्षा के प्रसार से समाज में सकारात्मक बदलाव भी आया है, लेकिन ऐसे हालात भी बने हैं, जिसके कारण युवा वर्ग अपराध की ओर मूड़ रहे हैं। जिस पर चिंतन आवश्यक है, क्योंकि यही युवा वर्ग हैं, जो समाज व देश के विकास के वाहक माने जाते हैं, जब यही नशाखोरी के चलते गलत दिशा में जाएंगे, तो फिर समाज किस दिशा में जाएगा या फिर कहें समाज का क्या होगा ?
एक समय था, जब संयुक्त परिवार की परिपाटी थी, आज वह कहीं गुम हो गया है। इसके लिए बदलते परिवेश के साथ अन्य कारणों को जिम्मेदार माना जाता है। निश्चित ही संयुक्त परिवार से सामाजिक सुरक्षा की भावना बलवति होती है और उसके बेहतर नतीजे भी रहे हैं, किन्तु ऐसी घटनाएं अब होने लगी हैं, जिसके बाद रिश्ते हर तरह से तार-तार हो रही है। समाज में घटित हो रही घटनाओं के बाद समझा जा सकता है कि रिश्तों की अहमियत को दरकिनार संगीन कृत्यों को अंजाम दिया जाता है, जिसके बाद समाज व परिवार में बिखराव नजर आता है।
रिश्तों को सहेजने और उसे बचाने के लिए नैतिक और सद्विचारों को बढ़ाना देना जरूरी है। साथ ही समाज में आपसी वैमन्स्यता जो बढ़ रही है, उसे दूर कर एक ऐसे समाज का निर्माण करने की जरूरत है, जिसे आने वाली पीढ़ी अपनाए और गर्व की अनुभूति करे। समाज में जो कुछ घट रहा है, कहीं और बढ़ता है तो फिर हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए वह ठीक नहीं होगा। कहीं ऐसा न हो जाए कि भावी पीढ़ी धिक्कारने पर मजबूर हों।

सोमवार, 28 जनवरी 2013

बातों-बातों में...

ये ‘आस’ है बड़ी
शिक्षा महकमा से जुड़े एक अफसर को राजनीति का बड़ा ही चस्का चढ़ा है। वे हर बार टिकट की कतार में खुद को पाते हैं और हर बार उन्हें ‘सांत्वना पुरस्कार’ ही मिलता है। उन्हें पंजे से खासी आस है, तभी तो गाहे-बगाहे राजनीतिक गलियारे में नजरें इनायतें करते दिख जाते हैं। कहते हैं, जब तक सांस है, तब तक आस है, शायद इसी सूत्रवाक्य को लेकर वे टिकट की दौड़ में होते हैं। कतार में हमेशा नीचे के पायदान में होते हैं, बड़े नेताओं को वे नजर ही नहीं आते। वे कहते नहीं थकते कि बड़े नेताओं से खासी पहचान है। हो सकता है, वे नेताओं को जानते होंगे, मगर नेता उन्हें नहीं...। टिकट की दौड़ फिर शुरू हो गई है, उनकी आस कायम है, देखते हैं कि क्या होता है ?

याद आ गए वो दिन...
कमल फूल वाले एक नेता हैं, जिनकी ठाठ देखते बनती थी। जहां जाते पूरे लाव-लश्कर के साथ जाते। कहीं भी जाते, प्रथम पंक्ति में कुर्सी तय रहती थी और उनकी रामकथा का भी लोग आनंद लेते। आज परिस्थितियां कुछ बदली हुई नजर आ रही है। मंचों में इतने बड़े जाने-पहचाने चेहरे भी बेगाने हो जाते हैं। जो टूटपुंजिए उनके पगचाप को प्रणाम करते थे, वही पहली पंक्ति में सवार होते हैं। उनकी ऐसी हालत देखकर उनकी ठाठ-बाट के दिन याद आ गए। वो दिन भी, क्या दिन थे। कोई भी सुबह, कहीं भी जाना हो, बस एक आवाज दो और हर मुराद पूरी हो जाती थी।

पनिशमेंट या गिफ्ट
एक साहब हाल में ‘काली छाया’ की वजह से लुप लाइन में आ गए थे, लेकिन कुछ ही दिनों बाद ही उनकी पनिशमेंट, गिफ्ट में बदल गई। ये माजरा किसी को समझ में नहीं आ रहा है। कहने वाले, कह रहें कि साहब की ‘वहां’ बड़ी पहुंच है, जिसके कारण बड़े साहब को भी पछताना पड़ा होगा। इनके जैसे और भी कई हैं, जिन पर उनकी मेहरबानी नहीं दिखी है। जरूर, दाल में कुछ तो काला है। इसे समझने के लिए पतले नहीं, मोटे दिमाग की जरूरत हो सकती है, क्योंकि चक्कर कहीं, ‘मोटा माल’ का तो नहीं...।

तेल का महाखेल
रेत से तेल निकालने की कहावत बड़ी कठिन लगती हो, लेकिन सेहत बनाने के बड़े-बड़े दावे करने वाले विभाग के नुमाइंदों को ‘तेल के महाखेल’ में महारत हासिल है। वे तो उसे भी तेल पिला दे, जो चल भी न सकता हो। जो चले, उसकी तो बात ही अलग है। उसके पेट में तेल भरने के भले ही उतनी जगह न हो, जितना वो ‘तेल का खेल’ खेलना चाहते हैं, किन्तु इतना सब जानते हैं कि कागजों की बाजीगरी में सब संभव है। न जाने, ये खेल कब तक चलेगा, कोई ब्रेक लगाने वाला भी नहीं है। सभी ब्रेक फेल ‘जुगाड़ की गाड़ी’ में रफ्तार से दौड़ रहे हैं।      

सोमवार, 21 जनवरी 2013

छग कांग्रेस और गुटबाजी का दीमक

इसमें कोई शक नहीं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सत्ता से बाहर है तो उसकी वजह वह खुद है, क्योंकि गुटबाजी का दीमक, छग कांग्रेस को इस कदर चट कर रहा है कि उसके हाथ से सत्ता साल-दर-साल खिसकती जा रही है। कांग्रेस नेताओं के मुंह से यह बात अधिकतर सुनने को मिलती है कि कांग्रेस एक परिवार है और सभी नेता एक धड़े से जुड़े हैं और उनके नेता सोनिया गांधी व राहुल गांधी हैं। छग में कांग्रेसी नेताओं के कहे में कितना दम है, यह तो इसी से जाना जा सकता है कि प्रदेश में जितने बड़े नेताओं के कुनबे हैं, उतने फाड़ हैं। कहीं ‘त्रिफला’ खुद को ताकतवार बताती है तो कहीं ‘चमनप्राश’ को खुद दमदार बताने से नहीं चूकता। कुछ अनुभवी नेता भी जरूरत पड़ने पर सत्ता संभालने के लिए खुद के कांधे को मजबूत बताने से भी नहीं हिचकते।
अहम मसला है, कैसे छग में सत्ता हासिल की जाए, लेकिन इसे कांग्रेस के लिए विडंबना ही कही जा सकती है कि सत्ता मिलने के पहले ही नेताओं को सत्ता सुख के साथ मुख्यमंत्री की कुर्सी नजर आती है ? कांग्रेस के नेताओं के पहले सत्ता हासिल करने ‘गुटबाजी’ भुलाकर जोर लगानी चाहिए, बाद में फिर कुर्सी की लड़ाई में ताकत झोंकनी चाहिए, परंतु इसके उलट ही सोच नजर आती है।
छग कांग्रेस में बीते 10 साल से यही कुछ चल रहा है। जब से कांग्रेस के हाथ से सत्ता खिसकी है, उसके बाद हालात बन गए हैं कि कांग्रेस के नेताओं में ही जुबानी लड़ाई चलती रहती है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि जो खुद ही लड़ते रहें, उनमें दूसरे को हराने का माद्दा कहां से आएगा ? दूसरे को हराने के लिए पहले गुटबाजी को वास्तविक तौर पर भुलानी होगी। केवल बयानों में ही गुटबाजी की बात नकारने से बात नहीं बनने वाली। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जिस बेबाकी के साथ बात कहते हैं और अपनी कमियां गिनाकर उसे दूर करने पर विचार करते हैं। कुछ ऐसा कर दिखाना होगा, छग कांग्रेस के नेताओं को। ‘मतभेद’ को पूरी तरह से खत्म करना होगा। ‘मनभेद’ होने की बात कहकर खुद को तसल्ली देने से काम नहीं चलेगा। यही ढर्रा चलता रहा तो तीसरी बार सत्ता ‘हाथ’ से फिर फिसल जाएगी।
देखिए, छग कांग्रेस के नेताओं में जो आपसी द्वंद चल रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस हाईकमान भी जानती है कि छग में कांग्रेस को मजबूती की जरूरत है। वह यह भी जानती है कि कांग्रेस की कमजोरी के लिए सबसे जिम्मेदार कारण है तो, वह गुटबाजी है। पिछले साल रायपुर आकर राहुल गांधी ने भी कांग्रेस नेताओं को गुटबाजी भूलने का पाठ पढ़ाया था और हिदायत भी दी थी कि ऐसा नहीं हुआ तो सत्ता कभी नहीं मिलेगी और आगे भी ‘वनवास काल’ ही झेलना पड़ेगा। आज जिन राहुल गांधी के उपाध्यक्ष की ताजपोशी के बाद इन नेताओं में उत्साह है या एक तरह से नेताओं के साथ कार्यकर्ताओं में नई उर्जा का संचार हो गया है, लेकिन चिंता यह भी है कि जिन नेता की कही बातांे को ये नेता नहीं मानते या उनकी रायशुमारी को दरकिनार कर ‘एकला-चलो’ की नीति को अपनाते हैं ? फिर ऐसे नेताओं से राहुल गांधी को क्या उम्मीद हो सकती है ?
अभी खबर आई है कि जयपुर के चिंतन शिविर में छग कांग्रेस के कामकाज को सराहा गया है। निश्चित ही बीते कुछ साल की अपेक्षा छग कांग्रेस काफी मजबूत हुई है, कुछ मुद्दों में भाजपा सरकार को घेरने में कामयाब भी रही, किन्तु कांग्रेस के नेताओं में ‘जितने नेता, उतने फाड़’ की बात नहीं होती तो फिर कांग्रेस और भी अधिक शक्ति के साथ काम कर पाती। छग कांग्रेस की दुर्दशा इसी बात से समझी जा सकती है कि यहां जितने नेता हैं, उनके अपने ‘गुट’ हैं। हर बड़े नेता के साथ, छोटे नेताओं को उनके अपने गुट के नाम से जाना जाता है। हालांकि, जब भी गुटबाजी का सवाल आता है तो इन्हीं नेताओं की जुबान गुटबाजी को नकार जाती है और कहा जाता है, हम तो ‘सोनिया-राहुल’ तथा गांधी परिवार के सिपाही हैं। यहां प्रश्न यही है कि जब ऐसी बात है तो बयानों में कांग्रेस के नेताओं के जुबानी तीर से अपनों की टीस बढ़ाने वाली बात क्यों निकलती है ? या कहें सभी नेताओं ने अपने तरकश में एक-दूसरे को ढेर करने तीर जोड़ रखे हैं। एक-दूसरे से कोई खुद को कमतर के समझने के मूड में नहीं दिखता।
हमारा यही कहना है कि कांग्रेस के नेताओं की आपसी नोंक-झोंक तथा रस्सकस्सी के कारण ही कांग्रेस, सत्ता से बाहर गई है और यही स्थिति बनी रही तो आगे भी यही हाल होने वाला है ? यह भी किसी से छिपी नहीं है कि कांग्रेस खुद से हारती है। जितनी उर्जा खुद के घर जलाने में कथित कांग्रेसी लगाते हैं, यदि उतना ही जोर कांग्रेस की मजबूती के लिए लगाएं तो कांग्रेस व कांग्रेसियों का भला हो जाए। मन में किसी ‘नेता’ के बजाय, कांग्रेस का हित होने की मंशा हो, उसके बाद कांग्रेस को सत्ता में वापसी से कोई नहीं रोक सकता।
अभी भी समय है, चुनावी नाव में बैठने के पहले छग के कांग्रेसी नेताओं के साथ बड़े नेताओं को समझने की जरूरत है। जो सोच राहुल गांधी रखते हैं, उस दिशा में कांग्रेस कदम बढ़ाती है तो निश्चित ही कांग्रेस को लाभ ही होगा। इससे पहले, कांग्रेस को गुटबाजी का जो दीमक चट कर रहा है और चेहरों की राजनीति हो रही है, उससे बचना होगा, तब कहीं जाकर ‘खोई सत्ता’ हासिल हो पाएगी।

बातों-बातों में...

किसे लगे झटके
हाल में कांग्रेस व भाजपा की राजनीति गरमा गई। यू-टर्न ने ऐसा रूख बदला, तब कहीं जाकर राजनीति में आया उबाल शांत हुआ। बाद में सियासत में किसे झटके लगे, इस पर बहस शुरू हो गई। कमल फूल वाले कहने लगे कि पंजे के खेवनहार को झटके लगे, दूसरी ओर पंजे वाले तर्क देने में पीछे नहीं रहे कि हमने खिलते हुए फूल को, खिलने के पहले ही मसल दिया। किनकी बातों में कितना दम है, ये तो वही जानें, लेकिन इतना जरूर है कि झटके तो लगे हैं, लेकिन किसे...? ये भी किसी से छिपा नहीं है।

चक्कर पर चक्कर
एक नेता की साढ़ेसाती चरम पर है, तभी तो एक बार अभयदान मिलने के बाद भी सबक नहीं सीख पाया। आलम यह है कि अब उसे चक्कर पर चक्कर काटना पड़ रहा है। कभी वहां, कभी यहां। चक्कर काटने के फिराक में कहीं बन न जाएं..., इसकी भी चर्चा जोरों पर है। बड़े साहब से खासी जान-पहचान का हवाला देकर चक्कर चलाने में भी माहिर है, लेकिन दूसरी बार अपनों ने उन्हें सीतम देने की ठानी है, उसके बाद ये चक्कर कितने काम आएंगे, यह तो कुछ दिनों में ही पता चल जाएगा। सत्ता के रसूख के आगे पिछली बार हवा का रूख मुड़ गया था, लेकिन इस बार तो उनके सामने आंधी है। कहने वाले कह रहे रहे हैं कि ज्यादा मलाई खाएंगे तो हश्र, ऐसा ही होगा ?

ये सुधरने वाले कहां...
जो लगातार सिमटती जा रही है, उसकी चिंता तो जरूरी है। देर से ही सही, जागरण काल तो आया है। साहब ने जब से फरमान जारी किया है, उसके बाद धंधे में जुड़े लोगांे की नींद हराम हैं। बाजार में इस बीमारी की दवा भी नहीं मिल रही है। नींद की दवा भी काम नहीं आ रही है। स्थिति फिर भी नहीं सुधर रही है, जानकर भी अंधे कुंए में कूदने की कोशिशंे जारी है, वह भी दोनों ओर से। लाइलाज हो चुकी बीमारी की इलाज ढूंढने तो निकले हैं, लेकिन ये ऐसी बीमारी है, जो पूरे शहर को आगोश में ले रखी है, उससे तो बीमारी संक्रामक होगी है, चाहे ट्रीटमंेट कुछ भी हो। इसीलिए तो कहा जा रहा है कि लाख कोशिश कर लो, ये सुधरने वाले कहां...?

मान गए साहब आपको
सुरक्षा की दुहाई की जवाबदेही रखने वाले विभाग में कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। लगता है, यहां भी ग्रह-नक्षत्र सही नहीं है। जैसा मंत्री कहते हैं, यहां भी हवन-पूजन की जरूरत तो नहीं है ? एक तो अमला नहीं है, जो हैं, वह भी अपनी करतूत से ‘ऑफ-लाइन’ में हैं। स्थिति यह है कि जिन्हें चौकी न मिले, वह थाने का दरोगा बन बैठा है। इतना ही नहीं, साहब की कृपा इतनी कि एक्स्ट्रा प्लेयर की तरह बैठाए गए को भी, कुछ ही दिन में बड़ी जिम्मेदारी दे दी, वह भी रेंज के बड़े साहब के हुक्म को दरकिनार कर। यही वजह है कि कहना पड़ रहा है, मान गए, साहब आपको। इतनी दरियादिली की क्या कहें...।

सोमवार, 14 जनवरी 2013

सिसकती आंखों का दर्द और नजरिया

दिल्ली की घटना ने जिस तरह पूरे देश को हिलाकर रख दिया, उससे कहीं दर्दनाक वाकया छत्तीसगढ़ के कांकेर में घटित हुआ है। झलियामारी गांव के आश्रम में छात्राओं से दुष्कर्म के मामले उजागर हुए, उसके बाद निश्चित ही सरकार, गहन विचार के लिए मजबूर हो गई है कि आखिर व्यवस्था में कहां खामियां रह गई हैं ? छग के आश्रम शालाओं के साथ ही कन्या छात्रावासों की बदहाली व समस्या की बातें सामान्य ही मानी जाती रही है, लेकिन जो घटना सामने आई है, वह सरकार के साथ, समाज की भी नींद खोलने के लिए काफी है। शिक्षित व विकासपरक का चोला ओढ़े समाज में जिस तरह की मानसिकता व्याप्त है, उसकी परिणति है कि इस तरह की घिनौनी करतूत घटित हो रही है। ऐसे में इस मसले में विचार कर समस्या को खत्म करने की कोशिश के बजाय, जैसी राजनीति हो रही है और बयानों की बयार चल रही है, उससे जरूर उन सिसकती आंखों का दर्द बढ़ना स्वाभाविक है। राजनीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे किसी का भला हो, न कि किसी के जख्म को नासूर बनाने का काम हो। जब किसी का नजरिया ही खराब हो, वहां व्यक्ति की सोच में बदलाव की जरूरत होती है, तब कहीं जाकर समाज को सशक्त बनाया जा सकता है। इसके लिए संस्कारित शिक्षा का अहम योगदान हो सकता है, क्योंकि शिक्षा का मानव जीवन पर सकारात्क प्रभाव दिखता भी है।
देश में चहुंओर एक ही मुद्दे पर चर्चा हो रही है। यह जरूरी भी है, क्योंकि जब समाज गलत दिशा में जाता हुआ दिखता है तो उसके निदान के लिए मंथन भी आवश्यक माना जाता है। दिल्ली में गैंगरेप की घटना के बाद अवाम ने एक ही आवाज बुलंद की और कानून में बदलाव पर जोर दिया। निश्चित ही यह आवश्यक है, किन्तु उससे पहले समाज में व्याप्त ओछेपन की मानसिकता को दूर करनी होगी। पुरूष व नारी को लेकर मन में बनी संकीर्णता की खाई को पाटनी होगी। शिक्षा व विकास के बढ़ते आयाम ने काफी हद तक इस अंतर को घटाया है, लेकिन आज भी हालात पूरी तरह बदले नहीं हैं। इसी का परिणाम है कि ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब यह सुनाई न पड़े कि ‘अनाचार’ की घटना नहीं हुई है। नारी पूजा व नारी शक्ति की बात कहते, समाज नहीं थकता। साथ ही समाज में रहने वालों की जननी ‘नारी’ ही होती है, लेकिन जब घृणित करतूत सामने आती है, उसके बाद नारीत्व भावना की सोच तार-तार हो जाती है।
नारी उत्थान की जब बात हो रही है, उसमें सबसे पहले नजरिया में बदलाव की जरूरत है। जब नजरिया बदलेगा, उसके बाद कहीं न कहीं, नारी की छवि, देवी के रूप में नजर आएगी। शास्त्रों में भी नारी की महत्ता का बखान है, लेकिन आज जो स्थिति नारियों की प्रस्थिति के साथ बन रही है, उसे एक शिक्षित व सभ्य समाज के लिए हितकर नहीं माना जा सकता। किसी परिवार या समाज के विकास में नारी का हर तरह से योगदान होता है, यदि वही दबी-कुचली रहेगी तो फिर जैसा प्रगतिशील समाज की संकल्पना की जाती है, वह साकार हो पाएगा, बड़ा सवाल है ?
अनाचारियों के खिलाफ देश भर के लोगों ने सड़क पर शक्ति दिखाई है, कुछ ऐसी शक्ति, हमें उन विकृतियों को दूर करने लगानी होगी, जो समाज के अंदर व्याप्त है। जो भी व्यक्ति ऐसे घृणित कृत्य को करता है, वह भी समाज का ही हिस्सा होता है। ऐसी स्थिति में सशक्त समाज के निर्माण के लिए यह भी चिंतन का विषय है कि आखिर हम और हमारा समाज, किस दिशा में जा रहे हैं ? एक युग था, जब मातृशक्ति की पूजा होती थी, लेकिन अब उन्हीं मातृशक्ति के प्रतिरूप को कुचला जा रहा है। इस अन्याय के खिलाफ लड़ाई जारी है, इसे आगे भी जारी रखना होगा। सरकार को भी सख्त कदम उठाने होंगे, तब कहीं जाकर प्रगतिशील समाज की मंशा साकार रूप ले सकेगी।

बातों-बातों में...

खाक तो छाननी पड़ेगी
मिशन 2013 के नजदीक आते ही जनता से मेल-मिलाप का ‘मिशन’ भी शुरू हो गया है। गांवों के खाक छानने के साथ ही गिले-शिकवे भी दूर करने की कोशिशें हो रही हैं। हालांकि, पिछले चुनाव होने के कई साल तक सोने के बाद, अब जागने का कितना फल मिलेगा, यह तो जनता ही बताएगी, लेकिन चुनावी चक्कर में क्या ‘चक्कर’ चलेगा, यह भी देखने वाली बात होगी।

‘अर्जी’ देने का दर्द...
हाल ही में जिले से लेकर राजधानी रायपुर तक गरजने वालों का दर्द की क्या कहें, एक तो सरकार ने अड़ियल रहकर उनकी मांगों पर सहमति नहीं जतायी। कुछ लालीपॉप देने की कोशिश हुई, उस पर बात नहीं बनी। आलम यहां तक आ गया कि रण छोड़ना पड़ा, मगर मन की टीस खत्म नहीं हुई। सरकार पर चुनाव में भड़ास निकालने की चुनौती कायम है, किन्तु खुद की नौकरी वापस पाने की जद्दोजहद के बीच, अब उन्हें वापसी की ‘अर्जी’ देने का दर्द भी सालने लगा है। सरकारी नीति की आग में ऐसे जले कि छांछ को भी फूंक-फंूक कर पीते नहीं बन रहा है।

साहब बनने की ‘खुशनसीबी’
एक विभाग का अधिकारी ऐसा है, जिन्हें प्रभार का ‘साहब’ बनने का ही नसीब हासिल हुआ है। जब भी विभाग का कोई साहब कुर्सी संभालता है, उसके बाद, वे खुद को कतार में पाते हैं। कुछ महीने तक ‘साहब’ की कुर्सी खाली हो जाती है, फिर अधिकारी की बांछें खिल जाती हैं। साहब बनने का उनका सपना एक बार फिर साकार हो जाता है। ऐसा ही सिलसिला कई साल से चल रहा है और उन्हें ‘साहब’ बनने की ‘खुशनसीबी’ हासिल हो रही है। इतना ही नहीं, किसी भी बड़े साहब को साधना उन्हें बखूबी आता है, तभी तो वे उनके खास माने जाते हैं।

ग्रामीण ‘नेतागीरी’ का चस्का
एक नेता ऐसे हैं, जिन्हें पार्टी संगठन ने बड़े ओहदे पर बिठा तो दिया है, लेकिन उनकी ग्रामीण ‘नेतागीरी’ करने का चस्का खत्म ही नहीं हुआ है। लिहाजा, संगठन में जो सक्रियता नजर आनी चाहिए, वह दिखती नहीं है। इस तरह आने वाले चुनाव में संगठन की सुस्ती का कहीं खामियाजा, उन नेताओं को न भुगतना पड़ जाए, जो चुनावी वैतरणी पार लगाने की जुगत में लगे हैं। संगठन ने जो बड़ी जिम्मेदारी सौंपी, उसके बाद ग्रामीण नेतागीरी ने जरूर जोर पकड़ी, क्योंकि जहां से पकड़ है, वहीं तो जुगत की तलाश होती है। आखिर, वे करें तो क्या करें, आदत में जो शुमार हो गई है, ग्रामीण नेतागीरी। अब संगठन को ही सोचना होगा...