गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

आदर्श पुलिस की संकल्पना अब भी अधूरी

छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण को दस साल हो गए हैं और प्रदेश ने विकास के कई आयाम गढ़े हैं, लेकिन पुलिस की चुनौती कहीं से कम नहीं हुई हो, नजर नहीं आती। प्रदेश के हालात को देखें तो पुलिस की जवाबदेही पहले से अधिक और बढ़ गई है। बढ़ते औद्योगीकरण के कारण अपराध में वृद्धि हो रही है, दूसरी ओर साइबर अपराध से निपटने राज्य की पुलिस के पास तकनीक का अभाव है। लिहाजा ऐसा कोई मामला आने के बाद पुलिस उस तरीके से छानबीन नहीं कर पाती, जिस तरीके से वे अन्य अपराधों के सुराग तलाशते हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस में निश्चित ही इन बीते बरसों में कई परिवर्तन हुए हैं तथा कई उपलब्धि हासिल हुई हैं और संसाधन भी बढ़े हैं, मगर में समाज शांति व्यवस्था बनाने के लिए दिन-रात एक करने वाली पुलिस की स्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं हुए हैं। आलम यह है कि बढ़ती बेरोजगारी के कारण युवाओं में पुलिस सेवा के प्रति रूझान तो है, लेकिन उनके मन में एक कसक भी देखी जाती है, जिसे समझकर सरकार को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। तब कहीं जाकर पुलिस के जवान ज्यादा उर्जा के साथ काम करेंगे। आम जनता के समक्ष बरसों से जो धूमिल छवि पुलिस की बनी हुई है, उसे दूर किए जाने की जरूरत है। पुलिस और जनता के बीच समन्वय बनाने और दूरियां कम करने कई तरह के प्रयास किए गए हैं, लेकिन प्रदेश में पुलिस महकमे को वह सफलता हासिल नहीं हो सकी है, जिस तरह की मंशा थी। ऐसे में कहा जा सकता है कि आज भी आदर्श पुलिस की संकल्पना अधूरी नजर आती है। समाज में शांति स्थापित करने पुलिस का बड़ा दायित्व है, लेकिन जिस तरीके से भय, आम जनता के चेहरे पर पुलिस के नाम पर देखा जाता है, इस पर भी विचार किए जाने की जरूरत है कि कैसे आम जनता के मन में पुलिस के प्रति बरसों से बने उस चेहरे को उज्जवल छवि के रूप में उकेरा जाए।
छत्तीसगढ़ के दस बरस के साथ ही पुलिस महकमा का भी दस साल पूरे हो गए हैं और यह बात समझने की है कि केवल दिन बढ़ रहे हैं, लेकिन पुलिस की कार्यक्षमता बढ़ाने किसी तरह के प्रयास नहीं हो रहे हैं। पिछले कुछ सालों में पुलिस के जवानों की भर्ती हुई है, निःसंदेह इससे प्रदेश के बेरोजगारों को लाभ हुआ है, किन्तु आज भी पुलिस विभाग में हजारों की संख्या में अनेक पदों पर रिक्तियां बरकरार है। छग जैसे शांतिप्रिय प्रदेश में नक्सलवाद ने इस तरह से पैर पसार लिया है, जिससे पुलिस तंत्र को मजबूत बनाए जाने की आवश्यकता बढ़ गई है। प्रदेश की जेलों में बंदियों व कैदियों के फरार होने की बात सामने आती रही है, उस पर रोक लगाने तो पुलिस विभाग के ही अधिकारी-कर्मचारियों पर सख्ती बरती जा सकती है। दूसरी ओर यह बात भी स्पष्ट तौर पर कही जा सकती है कि यदि समाज में शांति व्यवस्था बनानी है या फिर अपराध पर रोकथाम करनी है तो यहां एक आम व्यक्ति की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि हजारों की संख्या में रहने वाली पुलिस, भला किसी सहयोग के इन होने वाले अपराधों को कैसे रोके। इस मामले पर गौर करें तो इसके दो पहलू हैं, जनता इसलिए पुलिस से दूर रहती है, क्योंकि कई बार पुलिस का रवैया उसके साथ भी अपराधियों की तरह रह जाता है। ऐसे में होना यह चाहिए कि पुलिस को आम लोगों से जुड़कर कार्य करना चाहिए। जब एक पुलिस आदर्श व्यक्ति की तरह किसी आम जनता से पेश आए तो कहीं भी गुजाइश नहीं बनती कि जनता भी अपने कर्तव्यों से विमुख हो। पुलिस, समाज का एक ऐसा हिस्सा है, जिसकी अहमियत हर पल है, लेकिन जब यह जनता के हितों को दरकिनार कर कार्य करने लगती है तो फिर पुलिस के प्रति लोगों का विश्वास उठना स्वाभाविक ही है। पुलिस की जो धूमिल छवि बनी हुई है, उस पर विचार करना चाहिए और जनता के प्रति सह्दयता की भावना रखनी चाहिए। वे भी मानवीय पहलू से जुड़ी हैं, किन्तु ऐसे कौन से हालात निर्मित हो जाते हैं कि पुलिस के कार्य करने का तरीका दिशाहीन हो जाता है, इस पर भी सोचने की जरूरत है। राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण भी पुलिस अपना कर्तव्य कई बार पूरी तरह से नहीं निभा पाता।
सरकार ने पुलिस को आम जनता के नजदीक लाने तमाम तरह के प्रयास किए हैं, जिसमें आदर्श पुलिस थाना की स्थापना को भी हम एक मान सकते हैं। लगभग हर जिले में एक थाने को आदर्श थाना घोशित किया गया है, मगर इन थानों में आदर्श संहिता के पालन की जो संकल्पना की गई थी, वह दिखाई नहीं देती। आदर्श थानों की हालत भी वैसी है, जेसे अन्य थानों की है। संसाधनों का अभाव भी बना हुआ है। पुलिस विभाग एक ऐसा समाज का अंग है, जिससे हर व्यक्ति जुड़ा हुआ है। संसाधनों की कमी के साथ स्टाफ की कमी, इस विभाग की सबसे बड़ी समस्या व मजबूरी कही जा सकती है, जबकि होना यह चाहिए कि इस विभाग में पर्याप्त पुलिस होनी चाहिए, जिससे समाज में शांति व्यवस्था सुदृढ़ किया जा सके, लेकिन छत्तीसगढ़ बनने के बाद जिस तेज गति से पुलिस विभाग का कायाकल्प होना चाहिए, वह नहीं हो सका है। पिछले सालों में पुलिस विभाग द्वारा आम लोगों के प्रकरणों पर त्वरित निराकरण करने के लिए चलित थाने जैसे आयोजन किए गए, इसके कुछ लाभ भी हुए, मगर जिस तरह की अपेक्षा इस आयोजन को लेकर थी, वह भी पूरी नहीं हो सकी। इसके अलावा कई बार पुलिस को गांधीगिरी भी करते देखा गया, जिसमें लोगों से कानून पालन करने अनुरोध किया गया। इन प्रयासों को पुलिस की छवि को बेहतर बनाने के लिए विभाग के महत्वपूर्ण निर्णयों में माना जा सकता है। समाज में जिस तरह से पुलिस की भूमिका है, उस लिहाज से उनका दायित्व भी बड़ा है, क्योंकि आम जन की सुरक्षा को जो सवाल है।
नए राज्य गठित होने के बाद शुरूआत में तो छत्तीसगढ़ में अपराध का ग्राफ कम ही था, लेकिन धीरे-धीरे यहां बढ़ते औद्योगीकरण के कारण स्थिति गंभीर होती जा रही है। इसके लिए पुलिस विभाग को पर्याप्त बल की जरूरत है। वैसे पुलिस के कार्य करने की अपनी शैली है और यह भी देखने में आता है कि पुलिस कई बार चौबीसों घंटे ड्यूटी पर रहती है, इस दौरान जाहिर सी बात है कि काम के बोझ का असर उनके मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। इन्हीं परिस्थितियों से निपटने पुलिस तंत्र को मजबूत बनाने, जनसंख्या के अनुपात में जितनी पुलिस होनी चाहिए, वह नहीं है। आंकड़े यही बताते हैं कि हजारों की जनसंख्या के लिहाज से एक पुलिस तैनात हैं, ऐसे में भला कैसे अपराध में कमी की जाए, यह एक बड़ा सवाल है, जिस पर सरकार को विचार करने की जरूरत है। यह बात तो सही है कि समाज में पहले भी अपराध होते थे, आज भी हो रहे हैं, मगर यह बात भी समझने की है कि यदि तंत्र मजबूत हो तो ऐसी किसी अप्रिय गतिविधियों को रोका जा सकता है। फिलहाल यही बात कही जा सकती है कि पहले तो राज्य में पुलिस की संख्या में वृद्धि की जाए तथा उन्हें संसाधन से पूरी तरह लैसा किए जाए। इसके अलावा पुलिस की छवि में आदर्श की भावना लाने नैतिक शिक्षा की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता। देश का 26 वां राज्य छत्तीसगढ़ को विकास की दृष्टि से देखें तो यह प्रदेश अभी शिशु अवस्था में है। खनिज संपदा से परिपूर्ण इस राज्य को विकास के नए आयाम गढ़ने हैं। आज के आधुनकि और प्रौद्योगिकी युग में संचार के साधनों में वृद्धि हुई है, वहीं संसाधनों के अभावों के बीच अपराधों को रोकने पुलिस कामयाब नहीं हो रही है। इस छोटे से प्रदेश में जिस तरह से साइबर अपराध के मामले बढ़ रहे हैं, उस लिहाज से नई तकनीक की कमी, प्रशिक्षण और जानकारी का अभाव, पुलिस की कार्यक्षमता को कम कर रही है। ऐसे में विचार करने वाली बात है कि कैसे इन सभी चुनौतियों से निपटा जाए। सरकार को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए और कुछ ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जिससे पुलिस की छवि भी बदले तथा समाज में शांति भी कायम रहे है।

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

महंगाई और दावे पर दावे

देश की सबसे बड़ी समस्या महंगाई ने बीते कुछ बरसों से इस कदर लोगों की फजीहत खड़ी की है, उससे घर का बजट ही बिगड़ गया है। हाल की महंगाई ने तो लोगों के कलेजे, चबड़े पर ला दिया है। जिस तरह देश में विकास का सूचकांक बढ़ने का दावा किया जा रहा है, उस लिहाज से महंगाई कई गुना ज्यादा बढ़ रही है और सरकार है कि दावे पर दावे किए जा रही है। एक बार फिर महंगाई के सुरसा ने मुंह फाड़ा तो जैसे-तैसे सरकार यह कह रही है कि मार्च तक महंगाई पर काबू पा लिया जाएगा, मगर यहां सवाल यही है कि इससे पहले सरकार ने कई बार जो दावे किए थे, उसका क्या हुआ ? फिलहाल महंगाई पूरे चरम पर है, किन्तु अभी जिस तरह से प्यास ने सूखी आंखों को भी रूला दिया है और टमाटर के लाल होते तेवर ने आम लोगों की मुश्किलों को बढ़ा दिया है, उससे भी सरकार गंभीर दिखाई नहीं दे रही है। आलम यह है कि चीजों के बढ़े हुए दाम इस सर्द मौसम में भी लोगांे के पसीने निकाल रहा है।
वैसे तो सरकार की नीतियों को ही अर्थशास्त्र के जानकार महंगाई के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं। स्थिति को देखकर ऐसा लगता भी है, क्योंकि जब कभी महंगाई बढ़ती है, उससे पहले कृषिमंत्री शरद पवार के बेतुके बयान मीडिया में आते हैं। इसके बाद यूपीए-2 के मुखिया प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की चुप्पी भी देखने लायक रहती है। ऐसे हालात में महंगाई की मार से केवल वह आम जनता ही पिसती है, जिसके नाम का नारा देकर यूपीए की यह सरकार सत्ता में दूसरी बार बैठी है, लेकिन सत्ता के मद में लगता है कि सरकार उन वादों को भूले नजर आ रही है। यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार, महंगाई से निपटने कोई कारगर नीति जरूर बनाती और विशेषज्ञों की राय लेकर महंगाई से पार पाने की सार्थक कोशिश करती।
महंगाई की बयार में आम जनता आज से ही प्रभावित नहीं है। महंगाई की आग धीरे-धीरे देश की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करने में कई बरसों से लगी है। शुरूआती दौर में ही कोई प्रयास होता तो उस दौरान काफी हद देश की इस बड़ी समस्या से निपटने में आसानी होती। आज हालात बदले हुए हैं, ठीक है विकास तेज गति से हो रहा है, परंतु सरकार को यह भी समझने की जरूरत है कि विकास तो आम जनता तक नहीं पहुंच रहा है, कई योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है, साथ ही देश में घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं और आम जनता की गाढ़ी कमाई सफेदपोश चेहरों के घरों की तिजोरियों की शोभा बनती जा रही है और देश के उन आम लोगों को क्या मिल रहा है, केवल महंगाई। देश के करदाता तो वही आम लोग हैं, जिनके रहमो-करम पर सरकार चलती है और वही नीति-नियंता सत्ता पर काबिज हैं, जो इन्हीं आम लोगों पर महंगाई जैसा बोझ लादने में भी नहीं झिझक रहे हैं। महंगाई की मार यदि कोई झेल रहा है तो वह है, आम लोग, क्योंकि देश में विकास की जितनी भी बातें की जाएं, लेकिन यह भी सच है कि देश के एक बड़ी आबादी के रोजाना की आमदनी महज 20 रूपये है। ऐसे में महंगाई के कारण उन पर कैसी मुसीबत बीते कई बरसों से बनी हुई है, इसे सहज तौर पर समझा जा सकता है। सरकार केवल विकास का ढोल पिट रही है और यह कहते नहीं थक रही है कि उसका हाथ, उन अंतिम तबके के लोगों के साथ है, जो विकास से अछूते हैं या कहें कि जिनके तक योजनाओं की चमक नहीं पहुंच सकी है। क्या यह बात किसी से छिपी है कि योजनाओं की एक बड़ी राशि कहां चली जाती है और किसकी जेबें गरम होती हैं ? नेता और अफसर, योजनाओं के क्रियान्वयन में हस्तक्षेप कर इस तरह से राशि का बंदरबाट करते हैं कि जो पात्र लोग होते हैं, उन्हें योजना का कोई लाभ नहीं मिलता और ऐसे लोग योजना का लाभ उठाते हैं, जो योजना के कायदों के लिहाज से अपेक्षित नहीं होते। यहां यह कहना जरूरी है कि ऐसे लोगों की इतनी हिम्मत नहीं कि योजनाओं का गलत तरह से लाभ ले ? इन लोगों को सह दिया जाता है, उन नेताओं व अफसरों द्वारा, जो योजनाओं के क्रियान्वयन में किसी तरह से अड़ंगा लगाने से बाज नहीं आते।
महंगाई को लेकर सरकार कहां है, यह पता ही नहीं चलता, क्योंकि उनके बयान तो ऐसे आते हैं, जिससे लगता है कि वे आम जनता के साथ ही नहीं है ? उनके बयानों से ही लगता है कि जैसे आम लोग उनके सौतेले हैं। अभी जब प्याज की दर में करीब डेढ़ गुना वृद्धि होने के बाद जहां प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने यह कहा कि आगामी कुछ महीनों में महंगाई पर लगाम लगा ली जाएगी। हालांकि उनका यह वक्तव्य इसलिए लोगों के गले नहीं उतरा, क्योंकि इससे पहले भी कई दफे ऐसे मुगालते में वे आम लोगों को रख चुके हैं। देश में जब-जब महंगाई बढ़ती है, उसके बाद प्रधानमंत्री यह कहने से परे नहीं रहते कि महंगाई जल्द खत्म हो जाएगी, परंतु यहां प्रश्न यही उठता है कि आखिर हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की कोई नीति क्यों काम नहीं रही है ? प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, जब कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार में वित्तमंत्री रहते कई तरह की आर्थिक नीतियों को बनाने में कामयाब रहे, लेकिन आज क्या हालात बन गए कि महंगाई से निपटने नीति बनाने में वे लगातार मात खा रहे हैं ?
एक बात और विपक्ष तथा अर्थशास्त्र के जानकारों का कहना है कि देश में जमाखोरों, घोटालों और मुनाफाखोरों पर बिना लगाम लगाए महंगाई पर काबू नहीं पाया जा सकता। यह एक तरह से सही भी लगता है कि क्योंकि सरकार जमाखोरों पर कार्रवाई करने के बजाय केवल इतना कहती है कि महंगाई की मार कुछ महीने और झेलनी पड़ेगी। जाहिर सी बात है कि मुनाफाखोरों को घर बैठे कमाई का नायाब तरीका मिल जाता है। इस मामले में देश के कृषिमंत्री शरद पवार खासे माहिर माने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने बीते दो बरसों में जितनी बार अपने मुंह खोले, उतनी बार महंगाई ने उंची छलांग लगाई। एक समय चीनी की कमी की बात कही गई तो चीनी के दाम कई गुना बढ़ गए। फिर दाल की बारी आई और वह भी लोगों की थाली से ही दूर हो गई। आम जरूरत की हर चीजों की दर आसमान छू रही है और सरकार केवल बेबस नजर आ रही है। हालांकि जानकारों की मानें तो सरकार, बाजार से कम बेबस है, बल्कि उन जमाखोरों व मुनाफाखोरों के सामने ज्यादा बेबस नजर आ रही है। यदि ऐसा नहीं होता तो महंगाई रोकने सरकार कड़े कदम उठाती और देश भर में जमाखोरों के खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई करती। यह बात अधिकतर तौर पर जब महंगाई बढ़ती है, तब कही जाती है कि जैसे ही किसी चीज का बाजार में आवक कम होता है, उसके बाद उसका दाम एकाएक बढ़ जाता है। महंगाई के कारण आम लोग ज्यादा पिस रहे हैं, क्योंकि जितने दाम में प्याज बिक रहा है, उतनी आमदनी उनकी दिन भर में नहीं होती। ऐसे में प्रश्न सरकार के समक्ष यही है कि आखिर क्यों उन्हें आम लोगों की थोड़ी भी फिक्र नहीं है ? सरकार केवल दावे पर दावे किए जा रही है और उन दावों के बाद जमाखोर ही मुनाफा कमा रहे हैं। इन परिस्थितियों में आम जनता तो बेचारी बनकर रह जा रही है। लगता है कि सरकार के कारिंदे भी उन आम लोगों से कोई सरोकार नहीं रखते, तभी तो सत्ता में काबिज होने के बाद वे ही जनता के हितों पर गुलाटी मारने से बाज नहीं आ रहे हैं।

रविवार, 26 दिसंबर 2010

कहां जा रहा हमारा समाज ?

आधुनिकता की चकाचौंध जिस तरह से समाज पर हावी हो रही है, उससे समाज में कई तरह की विकृतियां पैदा हो रही हैं। एक समय समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ राजा राममोहन राय जैसे कई अमर सपूतों ने लंबी जंग लड़ी और समाज में जागरूकता लाकर लोगों को जीवन जीने का सलीका सिखाया। आज की स्थिति में देखें तो समाज में हालात हर स्तर पर बदले हुए नजर आते हैं। भागमभाग भरी जिंदगी में किसी के पास समय नहीं है, मगर यह चिंता की बात है कि इस दौर में हमारी युवा पीढ़ी आखिर कहां जा रही है ? समाज में इस तरह का माहौल बन रहा है, जिससे कहीं नहीं लगता कि यह वही समाज है, जिसकी कल्पना हमारे समाज सुधारकों ने की थी। इस तरह आज जो घट रहा है, उससे समाज में नैतिक दिवालियापन बढ़ता दिखाई दे रहा है। इस तरह की करतूतों को किसी भी सूरत में स्वच्छ समाज के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता।
हाल ही में छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार में जो हादसा हुआ, उससे एक बार फिर सवाल खड़ा हो गया है कि हम कहां जा रहे हैं और हमारा समाज आज आखिर कहां जा रहा है और क्यों वह दोराहे पर खड़ा नजर आ रहा है ? इन सवालांे के जवाब खोजने कोई संजीदा नजर नहीं आता, यदि ऐसा नहीं होता तो समाज की मूल भावनाओं को रौंदने वाली घटनाएं बार-बार नहीं होती ? बुड़गहन गांव के एक शिक्षक माखन लाल वर्मा को कुछ युवकों ने महज इसलिए पीट-पीट कर मार डाला कि उन्होंने मनचलों को एक लड़की से छेड़खानी नहीं करने की नसीहत दे डाली। मीडिया में जिस तरह की बातें सामने आई हैं, उसके मुताबिक बलौदाबाजार के शिक्षा विभाग कार्यालय के पास शिक्षक माखन लाल वर्मा गुजर रहे थे, यहां कुछ युवक एक लड़की से फब्तियां कस रहे थे। शिक्षक माखन लाल ने उन युवकों से लड़की को इस तरह छेड़खानी नहीं करने की बात कही, उसके बाद तो उन्हीं पर आफत आ गई और युवकों ने उसकी जमकर पिटाई कर दी। स्थिति यहां तक बन गई कि शिक्षक को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया और वहां उन्होंने दम तोड़ दिया। मनचले युवाओं की घिनौनी कारस्तानी की वजह से समाज और एक परिवार ने आज एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया, जिनके मन में समाज सुधार की निःस्वार्थ भावना थी। यहां सवाल उठता है कि आखिर हमारी युवा पीढ़ी की सोच में इतना नकारात्मकता आने का कौन सी वजह है ? एक शिक्षक की नसीहत को इन मनचलों ने इस तरह से अपने दिमाग में भर लिया, जिससे एक परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और वे खुद सलाखों के पीछे हैं। बलौदाबाजार में जो घटा, उसे केवल आधुनिक समाज का घिनौना रूप ही कहा जा सकता है, जिसे ओढ़े हमारी युवा पीढ़ी गर्त में डूबती जा रही है, जिसका परिणाम इस तरह की घटनाओं के रूप में सामने आ रही है।
एक और घटना का यहां जिक्र करना जरूरी है, क्योंकि समाज में चौतरफा मानवीय मूल्यों की गिरावट होने का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता। कुछ महीने पहले की बात है, जांजगीर-चांपा जिले के एक गांव में ऐसी घटना हुई, जिसे कोई भी सुनकर सिहर उठा। दरअसल हुआ यह, बड़े भाई ने अपने छोटे भाई को घर के भीतर मजाक में यह बातें कही कि बाहर आंगन में सांप निकला है और वह उसे देखकर आ जाए। इसके बाद उस व्यक्ति का छोटा भाई आंगन में जाकर देखा तो सांप नहीं था। वह लौटा और अपने बड़े भाई से गुस्से भरे लफ्जों से पूछा कि वहां सांप नहीं है ? इस पर बड़े भाई ने मजाक की बात कही, इसके बाद तो उसके छोटे भाई इस तरह तुनक गया तथा सिर पर गुस्सा ऐसा सवार हुआ कि लाठी से पीट-पीटकर उसने अपने बडे़ भाई को अधमरा कर दिया। बाद में अस्पताल में उस व्यक्ति की मौत हो गई। मामूली विवाद के बाद इस तरह हुई घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। घटना के बाद उसके छोटे भाई की आंखें पश्चाताप से भरी थीं, लेकिन अब कहां उसका बड़ा भाई वापस आने वाला था ? यहां हमारा यही कहना है कि किस तरह लोग आवेश में आकर खून के रिश्ते को भी भूल जाते हैं और ऐसी घटनाओं को अंजाम दे जाते हैं, जिसकी परिणिति पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है। हालात यहां तक बन जाते हैं कि ये घटनाएं बरसों तक समाज में एक काला धब्बा बनकर रह जाती हैं।
कई रिपोर्टों में इन बातों का खुलासा हो गया है कि युवाओं में तनाव और अवसाद के कारण इस तरह की मानसिक विकृतियां घर कर रही है, जिससे समाज में शांति कायम होना मुश्किल हो जाता है। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए शिक्षा व्यवस्था में भी बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। साथ ही परिवार में भी सुसंस्कारित माहौल बनाए रखने की जरूरत है, तभी ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है। यह समय था, जब शिक्षक का भगवान की तरह पूजा किया जाता था और उनका कहा- एक लक्ष्मण रेखा मानी जाती थी। भला कैसे कोई द्रोणाचार्य तथा एकलव्य की शिष्य-गुरू भक्ति को भुला सकता है। वैसे भी गुरू को माता-पिता से बढ़कर समझा जाता है, इसका शास्त्रों में भी उल्लेख है। यह बात भी सही है कि अभिभावक, बच्चों में संस्कारित शिक्षा दिलाने कोई भी कुर्बानी देने को हर पल राजी रहा करते थे, किन्तु आज की परिस्थितियां काफी हद तक बदल गई हैं और आज अभिभावकों की नजर में शिक्षक, गुरू न होकर महज एक ककहरा सिखाने वाला व्यक्ति बनकर रह गए हैं, क्योंकि अनुशासन की बात आती है तो वहां अभिभावकों की दुलार बाधक बनती है। इसका अंजाम फिर उन अभिभावकों को भुगतना पड़ता है, क्योंकि पहले तो उदंड बच्चे, शिक्षक के हाथ से निकल जाते हैं, फिर वे एक उम्र के बाद अभिभावकों के बस से बाहर हो जाते हैं। हमारा मानना है कि यदि बचपन से ही संस्कारित शिक्षा और समाज के प्रति किसी व्यक्ति का कितना दायित्व होता है, इसके बारे में बताए जाने से ऐसे हालात निर्मित होना कम हो जाएगा। एक और बात है, आज की शिक्षा महज रोजगार देने वाली ही रह गई है और यह बड़ी आसानी से रोटी तो दे जाती है, लेकिन वह जगह खाली रह जाती है, जिससे मानवता की पाठ को समझा जा सके। यही कहा जा सकता है कि शिक्षा में नैतिक मूल्यों को बचाने की कवायद जरूरी है, क्योंकि इसके बिना स्वच्छ समाज के निर्माण की बात बेकार लगती है।
बदलते परिवेश के साथ युवा पीढ़ी में नैतिक पतन हो रहा है, वह सामाजिक मूल्यों के लिहाज से ठीक नहीं है। ऐसे में सरकार, समाजसेवी और शिक्षाविदों को नई पीढ़ी को एक गहरी खाई में गिरने से बचाने की पहल किए जाने की जरूरत हैं, कहीं ऐसा न हो जाए कि युवा पीढ़ी के सिर पर जब हम हाथ रखें, तब तक काफी देर हो जाए। समाज में बढ़ रही आपराधिक घटनाओं को लेकर अधिकतर तौर पर यह बातें सामने आती हैं कि नशाखोरी के चलते ऐसी वारदात घटित होती हैं। साथ ही गांव-गांव में शराब की आसानी से उपलब्धता भी इसके लिए जिम्मेदार मानी जा रही है। समाज में एक-दूसरे के प्रति वैमन्यस्यता को और बढ़ाने में नशाखोरी एक बड़ा कारण बनकर सामने आ रही है। ऐसे हालात में सरकार को भी समाज में बढ़ती इन सामाजिक कुरीतियों से निपटने कारगर कदम उठाने की जरूरत है। इस लिहाज से देखें तो सरकार की मंशा केवल राजस्व प्राप्ति की नहीं होनी चाहिए, उन्हें समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभावों पर भी विचार करने की आवश्यकता है। अब सवाल यही है कि आखिर हमारा समाज कहां जा रहा है ?

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

दो बरस क्यों चुप रहे दिग्गी राजा ?

ऐसा लगता है, जैसे कांग्रेस महासचिव तथा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को सुर्खियों में बने रहना ही रास आता है, तभी तो वे मीडिया में आए दिन कुछ ऐसे बयान दे जाते हैं, जिससे एक नई बहस छिड़ जाती है। मीडिया को भी चटपटे मसालेदार खबरों की तलाश रहती है, लिहाजा दिग्विजय सिंह के बयानों को इतनी तरजीह दी जाती है। उनके बयानों के कारण आए दिन राजनीतिक गलियारे का तापमान अचानक बढ़ जाता है और माहौल ऐसा गरमा जाता है, इसके बाद तो कांग्रेस का पूरा कुनबा भी सकते में आ जाता है। उत्तप्रदेश प्रभारी होने के नाते वहां की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती के खिलाफ जुबानी आग उगली जाती है तो कभी ऐसा बयान दे जाते हैं, जिससे लगता है कि वे विपक्षी पार्टी के खासे हमदर्द हैं। पिछले दिनों वे जब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर क्षेत्र के दौरे पर आए तो पहले यहां उन्होंने राज्य की भाजपा सरकार के विकास कार्यों की तारीफ की और बाद में अपनी ही बातों से पलट गए। वैसे भी वे इस मामले में माहिर माने जाते हैं, क्योंकि हर विवादास्पद बयान के बाद उससे कैसा बचा जाए, उन्हें बखूबी आता है। हालांकि कई बार हालात बिगड़ जाते हैं और इसका नुकसान वे खुद तो उठाते ही हैं, साथ ही कांग्रेस भी लपेटे में आ जाती है, क्योंकि कोई भी उट-पटांग बयान देने के बाद विपक्षियों के निशाने में ये दोनों होते हैं। हाल ही में कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपने बयान में जो कहा, उससे कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं। 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए हेमंत करकरे को लेकर दो बरस बाद, दिग्विजय सिंह ने यह कहा कि उन्हें हिन्दू संगठनों से खतरा था और उन्हें धमकियां दी जा रही थीं। उनका यहां तक कहना था कि घटना के पहले हेमंत करकरे से उनकी बात हुई थी। मीडिया में उनका बयान आने के बाद राजनीतिक गलियारे में इस तरह माहौल गरमाया, जिससे कई प्रश्न खड़े हो गए। यहां पहला सवाल तो यही है कि आखिर दो बरस बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने इस तरह खुलासा क्यों किया ? इससे पहले जांच एजेंसियों को भी उन्होंने क्यों यह सारी बातें नहीं बताई ? आज कौन सी मजबूरी आन पड़ी कि उन्होंने इस तरह की बातें कही ? राजनीति के गलियारे में इस बात की चर्चा है कि कहीं न कहीं, विपक्षी पार्टियों का ध्यान बंटाने के लिए ऐसा बयान दिया गया है, क्योंकि केन्द्र की यूपीए सरकार के जी का जंजाल, इन दिनों कई तरह के घोटालों के कारण बना हुआ है। इसी के चलते कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, जो बयानों में सुर्खियों में बने रहने के आदी हैं, उन्होंने ऐसा कुछ कह दिया, जिसके बाद विपक्षी नेताओं का ध्यान घोटालों के मामलों से हट गया, क्योंकि मीडिया में कई दिनों तक यह बहस चलती रही कि क्यों दिग्गी राजा ने ऐसा बयान दिया है ? बयान आने के बाद तात्कालिक तौर पर कांग्रेस ने बयान से किनारा कर लिया और कहा गया कि वह बयान दिग्विजय सिंह का व्यक्तिगत है। यहां यक्ष प्रश्न यही है कि कांग्रेस से क्या उनका महासचिव अलग है ? फिलहाल इस मामले में कांग्रेस के बड़े नेताओं ने चुप्पी साध रखी है और यही कोशिश की जा रही है कि इस बयान से कांग्रेस को कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन इस बयान के राजनीतिक अर्थ भी तमाम तरह के निकाले जा रहे हैं और उनकी मंशा भी सीधे तौर पर समझ आ रही है। दिग्विजय सिंह के बयान के बाद शहीद हेमंत करकरे की पत्नी ने भी इसे केवल सुर्खियां बटोरने वाली करतूत ही करार दिया और यह भी कहा कि उनके पति आतंकवादियों के निशाने पर आकर शहीद हुए हैं, इसमें ऐसे किसी भी संगठन का हाथ नहीं है, जैसा दिग्विजय सिंह कह रहे हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि बयान के कुछ दिनों बाद एक बार फिर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने मीडिया में अपना पक्ष रखते हुए यहां तक कह दिया कि उनके पास पूरे सुबूत हैं और उन्होंने जो कहा है, उस पर अडिग हैं। यहां भी प्रमुख रूप से एक ही सवाल खड़ा है, जिसका जवाब दिग्गी राजा नहीं दे रहे हैं और वह है कि वे इतने दिनों चुप क्यों रहे ? वे हर तरह का खुलासा तो कर रहे हैं, मगर इतने दिनों तक चुप रहने की उनकी क्या मजबूरी थी ? वे किसके कहने पर अपनी जुबान बंद रखे थे और आज क्यों वे अपनी जुबान खोले हैं ?
ऐसे कई सवाल हैं, जिसके जवाब आना बाकी है। जनता भी देख रही है कि कैसे बार-बार कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह अनाप-शनाप बयान दे जाते हैं और देश की राजनीति में एक नया बखेड़ा खड़ा हो जाता है। कांग्रेस के कुनबे में दिग्विजय सिंह का एक अहम स्थान है, यही कारण है कि मीडिया भी उनकी जुबान को पूरी तवज्जो देता है और राजनीतिक सरगर्मी तेज करने में मीडिया भी भला कहां पीछे रहने वाला है। मीडिया भी राजनीतिक आग को हर तरह से हवा देने का काम करता है, क्योंकि सवाल खबर का ही नहीं है, बल्कि टीआरपी का भी है। जनता तक खबर पहुंचाने के नाम पर मीडिया भी यह सोचने की कोशिश नहीं करता कि कौन सी बातों को प्रमुखता दी जाए। हालांकि जब खबर पर व्यक्ति हावी हो जाता है, तो उसकी मूल बातें गौण हो जाती हैं। इन सब बातों का कांग्रेस महासचिव कैसे लाभ उठाने पीछे रह सकते हैं और होता वही है, जो अब तक होता आ रहा है। बयान के बाद बयान का दौर चल ही रहा है और राजनीतिक माहौल में गरमाहट कायम है।
कुछ महीनों पहले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी, मध्यप्रदेश के दौरे पर आए थे और यहां उन्होंने आरएसएस की तुलना आतंकवादी संगठन सिमी से कर दी थी। एक बात तो है कि राहुल गांधी की जुबान से कभी इस तरह के बयान नहीं आए थे, लेकिन क्यों उनके द्वारा ऐसा कहा गया ? इस दौरान राजनीतिक हल्कों में इस बात की जोरदार चर्चा रही कि यह सब बातें दिग्विजय सिंह के कहे अनुसार कही गई। इस बयान के बाद भाजपा और आरएसएस ने पूरे देश भर में प्रदर्शन किया और विरोध दर्ज कराया। यहां भी सवाल यही है कि राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश में ही आकर ऐसी बातें क्यों की थीं ? वैसे राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह उत्तरप्रदेश में एक साथ जुटकर पार्टी को मजबूत करने लगे हैं और अधिकतर दौरे पर वे साथ होते हैं, क्योंकि दिग्गी उत्तरप्रदेश के कांग्रेस प्रभारी हैं। मध्यप्रदेश में दस बरसों तक सत्ता में भी दिग्विजय सिंह, मुख्यमंत्री के तौर पर रह चुके हैं।
एक बात तो है कि आज की राजनीति के हालात पूरी तरह बिगड़ गए हैं और नेताओं में जुबानी जंग ही चल रही है। कभी कोई पार्टी के नेता, दूसरी पार्टी के नेता के खिलाफ ऐसा कह जाते हैं कि दूसरे पक्ष से भी उसी तरह के बयान सामने आते हैं। यह सिलसिला इसी तरह चलता रहता है। इसे किसी भी सूरत में इन सुर्खियां बटोरने वाले बयानों को बेहतर नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि दिग्विजय सिंह के दो बरसों बाद आए बयान को लेकर तरह-तरह कयास लगाए जा रहे हैं और अब यह बहस का मुद्दा बन गया है कि नेताओं की जुबान पर आ रहे ऐसे बयानों पर कैसे लगाम लगाया जाए।

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

दमदार निर्णय और सशक्त भारत

भारत ने दुनिया में एक विकासशील तथा लोकतांत्रिक देश के रूप में पहचान बनाई है और विकसित देशों के बीच भारत की सशक्त छवि भी कई अवसरों पर सामने आई है। पिछले दिनों अमेरिका के राष्टपति बराक हुसैन ओबामा ने भी अपनी यात्रा के दौरान दुनिया के शक्तिशाली देशों में शामिल करते हुए भारत की कई उपलब्धियों को लेकर प्रशंसा के कसीदे गढ़े। यह बात भी सही है कि भारत को सशक्त देश के तौर पर दुनिया में एक अरसे पहले बेहतर मुकाम नहीं मिल पाया था और भारतीय विदेश नीति पर आए दिन कई तरह के सवाल खड़े किए जाते रहे हैं, लेकिन हाल ही में भारत के दो दमदार निर्णय ने विदेशी मामलों के जानकारों समेत दुनिया में विकसित देश का तमगा ओढ़कर विकासशील देशों पर तानाशाही रवैया अपनाने वालों को सकते में डाल दिया है। ऐसे में कूटनीतिक दृष्टि से इन निर्णयों से सशक्त भारत के निर्माण में कई तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं।

कुछ दिनों पहले पाकिस्तान के राष्टपति रहे परवेेज मुसर्रफ ने भारत दौरे पर आने की पेशकश करते हुए वीजा देने की मांग की थी, जिसे विदेश मंत्रालय ने ठुकरा दिया। मुसर्रफ कह रहे थे कि वे भारत के अनेक धरोहरों का भ्रमण करना चाहते हैं। वैसे मुसर्रफ करीब दो साल पहले भारत के यात्रा पर आए थे और उस दौरान भारत-पाक संबंध सुधर जाएंगे, ऐसा हर किसी को लग रहा था, मगर वार्ता का कोई प्रतिफल नहीं निकला। एक बात छिपी नहीं है कि पाकिस्तान अपने नापाक इरादे से आए दिन आतंकी हमलों से भारत को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते रहा है और आतंकी गतिविधियों को भारत में संचालित करने की जानकारी खुफिया एजंेसी भी देती रही हैं। भारत-पाक संबंधों में लंबे समय से खटास कायम है, इसका एक ही कारण समझ में आता है कि आतंकी घुसपैठ। यही कारण है कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने दो टूक शब्दों में मुसर्रफ को वीजा देने से मनाही कर दी और यह भी जता दिया कि पाक की नापाक मंशा को किसी तरह भारत पर हावी होने नहीं दी जाएगी। भारत, शुरूआत से ही लोकतांत्रिक उसूलों का पुरोधा रहा है और वार्ता से कभी पीछे नहीं हटा है, किन्तु पाक ने हमेशा भारत को इसका सिला आतंकी हमले के तौर पर दिया है। दुनिया के अमेरिका समेत चीन व अन्य सभी देश जानते हैं कि किस तरह पाकिस्तान आतंकियों का शरणगाह है, फिर भी वे कई अवसरों पर तटस्थ रहने का कोशिश करते हैं और भारत के हितों को दरकिनार कर नीति बनाते हैं। पाकिस्तान का आतंकी हमले के दोशी सिद्ध होने के बाद भी अमेरिका व चीन जैसे देशों का रवैया भारत के प्रति रूखा ही रहता है, इसी के चलते भारत का विदेश मंत्रालय भी कुछ सख्त होता नजर आ रहा है, जिसे भारत के लिहाज से ठीक ही कहा जा सकता है। आखिर कब तक उनकी गीदड़ भभकी को भारत दरकिनार करता रहेगा।
मुसर्रफ को भारत आने का वीजा नहीं देने का मामला चर्चा में ही था, वैसे ही चीन ने अपनी शक्तिशाली होने का दंभ भरते हुए यह कहा कि भारत ओस्लो में आयोजित होने वाले नोबेल पुरस्कार समारोह में शामिल न हों। इस बार के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित ल्युशाओ पो ने चीन में लोकतंत्र बहाली तथा बहुप्रणाली लागू करने को लेकर अभियान चला रखे हैं, इसी कारण से चीन के तानाशाही शासन ने उन्हें जेल में डाल दिया है। फलस्वरूप, भारत भी लोकतंत्र का हिमायती है और उसकी सोच अमन-चैन बहाली की है, ऐसे में भला चीन को कैसे, भारत को मिला आमंत्रण भा सकता था और हुआ वही कि चीन ने समारोह में भारत के शामिल होने पर दबंगाई दिखाई, लेकिन भारत ने उसका एक न सुना और आखिरकार भारतीय राजदूत नोबेल पुरस्कार समारोह में शामिल हुए। इस समारोह का एक दुखद पहलू यही था कि जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिलना था, वे ल्यशाओ पो, जेल में बंद होने के कारण नहीं पहुंच सके। साथ ही उनकी पत्नी को भी नजरबंद करने से वे भी ओस्लो नहीं जा सकीं। नोबेल पुरस्कार में इससे पहले एक बार ऐसी स्थिति बनी थी, जब नामांकित जर्मन पत्रकार 1936 में नाजी कैंप कैद होने के कारण पुरस्कार लेने नहीं पहुंच सके थे।

खैर, भारत ने फिलहाल जिस तरह दो दमदार निर्णय लिया है, उससे तो यही लगता है कि भारत को अब दुनिया का कोई भी देश हल्के में ना लें। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है कि, इससे पहले भारत ने शायद ही कभी इतनी सख्ती बरती हो और दुनिया के शक्तिशाली देशों में शुमार चीन के दबंगई को एक सिरे से खारिज किया हुआ। यहां यह बताना लाजिमी है कि ओस्लो में आयोजित नोबेल पुरस्कार समारोह में चीन के फरमान के आगे दुनिया के दर्जन भर से ज्यादा देशों ने, वहां जाने से किनारा कर लिया। इसे इस दृष्टि से दुर्भाग्य कहा जा सकता है कि क्या ये देश चीन के कहा अनुसार ही शासन चलाते हैं ? या फिर चीन के रहमो-करम पर हैं ? हमारा मानना है कि आर्थिक हालात और कई कूटनीतिक कारणों से कमजोर देश, किसी दबंक देश से तटस्थ रह सकता है, लेकिन ऐसा भी नहीं होना चाहिए, जिससे उन देशों की छवि शर्मसार हो। ओस्लो के समारोह में नहीं जाकर उन देशों ने ऐसा ही कुछ परिचय दिया है, इन्हीं कारणों से चीन जैसे देश इतना मुखर हो पाता है।

ठीक है कि दुनिया में चीन की जनसंख्या सबसे अधिक है और वहां की सैन्य नीति भी अन्य देशों पर हावी है, मगर इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि कोई भी देश, इस तरह किसी अड़ियल रवैये के समक्ष नतमस्तक हो जाए। जो भी हो, चीन की दादागिरी का जिस तरह भारत ने जवाब दिया है, उसकी जरूरत बनी हुई थी, क्योंकि ऐसा नहीं किए जाने से वे हर बार की तरह ऐसी ही करतूत करने पीछे नहीं हटता। चीन अब भारत और विदेश नीति के बारे में कुछ कहने से पहले निश्चित ही सौ बार सोचेगा और इतने हल्के ढंग से भारत को लेने कभी भी हिम्मत नहीं जुटा पाएगा।
वर्तमान में चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ, भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। यहां कई नीतियों पर चर्चा होंगी, लेकिन यहां एक बात सामने आ रही है कि आर्थिक उदारीकरण को बढ़ावा देने का ही प्रयास होगा। इस तरह कहा जा सकता है कि उनकी यह यात्रा, शुद्ध व्यापारिक यात्रा है। हालांकि यहां यह भी चर्चा जोरों पर है कि इस यात्रा से भारत-चीन के संबंधों में थोड़ी मिठास तो जरूर आएगी।

क्यों नहीं जनता की चिंता ?

भारत में लगातार घोटाले के मामले सामने आते जा रहे हैं और हालात यहां तक बन गए हैं कि दुनिया में भ्रष्ट देशों की सूची में भारत चौथे पायदान पर है। ऐसे में समझा जा सकता है कि सफेदपोश चेहरे किस तरह देश को लूटने का कीर्तिमान स्थापित करते जा रहे हैं, लेकिन सरकार है कि ऐसे कृत्यों पर लगाम नहीं लगा पा रही है। इस साल प्रमुख रूप से कामनवेल्थ गेम्स में सुरेश कलमाड़ी की अफरा-तफरी का कमाल, आदर्श सोसायटी के फ्लैट रिश्तेदारों को बांटने के मामले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हाण का धमाल। 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में करीब 1 लाख 76 हजार करोड़ का गोलमाल। इन घोटालों के सामने आने के बाद केन्द्र की यूपीए सरकार पूरी तरह घिरी हुई है, क्योंकि घोटालों पर घोटालों के बाद भी सरकार के रवैये को बेहतर नहीं कहा जा सकता। स्पेक्ट्रम मामले में संसद का शीतकालीन सत्र पूरी तरह हंगामे का भेंट चढ़ गया, क्योंकि विपक्ष, खासकर भाजपा जेपीसी अर्थात् संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की मांग करते रहा और सत्र के 21 दिन संसद में कोई कार्य नहीं हो सका और ही कोई प्रस्ताव पारित किया जा सका। ऐसी परिस्थिति में आने वाले दिनों में होने वाला सत्र को क्या विपक्ष चलने देगा ? या फिर सरकार अपने अड़ियल रवैये से उबकर जेपीसी गठित करने पर राजी हो जाएगी। इस तरह के कई सवाल हैं, जो आम जनता के जेहन में है, क्योंकि संसद के नहीं चलने से जनता के हितों पर कुठाराघात हुआ है। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? संसद सत्र नहीं चलने से जनता के टैक्स से मिले करोड़ों रूपये हो-हल्ला की भेंट चढ़ गया। देखा जाए तो विपक्ष के हंगामे और सरकार की मनमानी का खामियाजा केवल जनता भुगत रही है, क्योंकि किसी तरह के कार्य योजना पर चर्चा नहीं होने से उसे लागू कराने में भी कई दिक्कतें सामने आएंगी।
संसद में सत्र नहीं चलने का परिणाम यह सामने आ रहा है कि राज्यों के विधानसभाओं के सत्रों में भी यही हाल देखा जा रहा है। केन्द्र में कांग्रेसनीत यूपीए सरकार सत्ता में काबिज है और यहां विपक्ष में बैठी भाजपा जैसी पार्टी की कई राज्यों में सरकार है। लोकसभा के संसद सत्र में विपक्ष के नाते भाजपा ने जेपीसी की मांग को लेकर पूरे दिन हंगामा किया। कुछ इसी तरह के हालात छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों में हालात बने, विधानसभा के चार-पांच दिनों के सत्र में इस तरह विपक्ष में बैठी कांग्रेस हंगामा करती रही, जिससे किसी तरह के प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हो सकी है। स्थिति यह हो गई कि बहुमत के आधार पर सरकार ने प्रस्ताव पारित तो कर ली, लेकिन यहां यदि विपक्ष चर्चा में अपनी भागीदारी निभाता तो जनता के हितों की कई और बातें सामने आतीं और कार्ययोजना को सही तरीके से क्रियान्वित किया जा सकता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और विधानसभा का यह सत्र केवल औपचारिकता बनकर रह गया। अभी उड़ीसा विधानसभा में विपक्ष द्वारा ऐसा प्रदर्शन किया गया, जिससे संसदीय परंपरा के साथ लोकतंत्र की गरिमा को भी आघात लगा। यहां विपक्ष के एक विधायक, अध्यक्ष के डेस्क में पैर पसारकर ऐसे सो गया, जैसे वह उसका घर या कार्यालय हो। ठीक है, विपक्ष को किसी नीति के विरोध में प्रदर्शन और हंगामा करने का अधिकार है, मगर यह अधिकार नहीं है कि संसदीय प्रक्रिया पर अडं़गा लगाए और कुछ ऐसा करे, जिससे लोकतंत्र की गरिमा को ठेस पहुंचे। जनता की दुहाई देकर विधानसभा या फिर संसद में हंगामा करने वाले ऐसे जनप्रतिनिधियों को क्या तनिक फिक्र नहीं रहती कि वे जनता के एक प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे हैं और सत्रों के दौरान जनता की समस्या को सरकार के समक्ष रखने के बजाय, अपनी वजूद की लड़ाई लड़नी शुरू कर देते हैं, क्या इसे जनता के हितों की दृष्टि से उचित कहा जा सकता है ? इस बात को इन प्रतिनिधियों को समझने की जरूरत है।
चाहे वह केन्द्र की सरकार हो या फिर राज्य की सरकार, एक बात का तो उन्हें ध्यान देना चाहिए कि जहां जनता के पैसों की बर्बादी हो रही है, वहां सख्ती से पेश आए, न कि ढुलमुल का रवैया अपनाए। देश में फिलहाल भ्रष्टाचार और घोटाले का मुद्दा पूरी तरह छाया हुआ है। इन घोटालों से सबसे ज्यादा पीस रही है तो वह है, आम जनता, क्योंकि देश में गरीबी के हालात किसी से छिपा नहीं है और भारत में जिस तरह से अरबपति व करोड़पति राजनेताओं तथा नौकरशाहों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, कुछ इसी तरह गरीबी भी भारत जैसे विकासशील माने जाने वाले देश में उसी गति से बढ़ रही है। कुल-मिलाकर देश में उसी तरह से आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है, जिससे जनता बेचारी व बेबस बनकर रह जा रही है, इसे विडंबना ही कहा जा सकता है। देश में घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं और जांच पर जांच हो रही है, लेकिन किसी भी मामले में कोई परिणाम सामने नहीं आ रहा है। बरसों से यही खेल तो भारत में चल रहा है, भला अब तक किसी घोटाले में किसी घोटालेबाज को सजा मिल पाई है ? वैसे तो अधिकतर घोटाले जनता के सामने आ नहीं पाते और जो मामले आ जाते हैं, उन्हें जांच के नाम पर ऐसे दबाया जाता है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। शायद जांच में लगे अफसरों को लगता है कि जनता कुछ दिनों बाद चुप हो जाएगी और अपना सवाल पूछना बंद कर देगी ? यही कारण है कि किसी भी घोटाले के लिए जब जांच टीम बनती है तो तमाम तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं ? जनता भी जानना चाहती है कि देश में हुए घोटाले और उनके पैसों को हजम करने वालों का क्या हुआ, किन्तु अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि उन मामलों में कार्रवाई तो दूर, आम जनता के समक्ष जानकारी भी सामने नहीं लाई जाती है। हां, इतना जरूर किया जाता है कि जांच का एक पुलिंदा बना दिया जाता है और उसे किसी बड़े ओहदे पर बैठे राजनेता या फिर नौकरशाह के समक्ष पेश कर दिया जाता है। यहां स्थिति यह रहती है कि जांच की वह फाइल धूल खाती पड़ी रहती है और धीरे-धीरे घोटाले और घोटालेबाजों के चेहरे छिपाने की कोशिश की जाती है।
इन परिस्थितियों के अलावा देखा जाए तो देश में भ्रष्टाचार और घोटालों पर अंकुश लगाने केन्द्र की यूपीए सरकार की मंशा भी साफ नजर नहीं आती, यदि ऐसा होता तो प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह इस मसले पर इस तरह कठोर नहीं बने रहते। जेपीसी गठित करने के मामले में सरकार इतना कह रही है कि इससे पहले भी जेपीसी बनी है, लेकिन उससे कुछ हासिल नहीं हुआ। आखिर इन नाकामियों के लिए किसे जिम्मेदार माना जा सकता है, सरकार उन बातों का हवाला देकर कहीं-कहीं अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रही है। केन्द्र की यूपीए सरकार इसलिए भी कठघरे में खड़ी होती है, क्योंकि सीवीसी अर्थात सतर्कता आयुक्त के रूप में ऐसे व्यक्ति के नाम पर सहमति जता दी गई है, जिनका नाम 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में आया है। सीवीसी बना दिए गए पीजे थामस पर सुप्रीम कोर्ट के कड़क मिजाज का भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। ऐसे में समझा जा सकता है कि थामस, आखिर ऐसी कारस्तानी करने की हिम्मत कहां से जुटा रहा है ? निष्चित ही जनता की अदालत में केन्द्र की यूपीए सरकार पूरी तरह कटघरे में खड़ी है और इसका जवाब जनता, सत्ता के मदखोरों को आने वाले चुनाव में जरूर देगी।



सोमवार, 13 दिसंबर 2010

ऐसे ही बनेगा सशक्त समाज

भारत जैसे विशाल देश का समाज भी उतना ही बड़ा है। ऐसे में हर किसी का दायित्व बनता है कि वे स्वच्छ समाज के निर्माण में सकारात्मक योगदान दें। देखा जाए तो आधुनिक समाज में कई तरह की अपसंस्कृति हावी हो गई है, इन्हीं में से एक है, नशाखोरी। यह बात आए दिन कई रिपोर्टों से सामने आती रहती है कि नशाखोरी से व्यक्ति और समाज को किस तरह नुकसान है। बावजूद, लोग अपसंस्कृति के दिखावे में ऐसे कृत्य कर जाते हैं, जिससे समाज शर्मसार तो होता ही है, खुद उस व्यक्ति का भी भविष्य दांव पर लग जाता है। नशाखोरी की प्रवृत्ति के कारण समाज में शांति कायम करने मुश्किलें किस तरह उत्पन्न होती हैं, यह किसी से छिपी नहीं हैं। विचारणीय बात यह है कि शिक्षा के अभाव में कुछ ऐसे बच्चे भी नशाखोरी के आदी हो जाते हैं, जो जिंदगी की अहमियत के बारे में कुछ जानते तक नहीं है। इस तरह के हालात में सशक्त समाज के लिए हाल के दो अनुकरणीय निर्णय तथा प्रयास महत्वपूर्ण माने जा सकते हैं। एक नाम क्रिकेट के भगवान माने जाने वाले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेन्दुलकर हैं, तो दूसरे नाम हैं, विप्रो कंपनी के प्रमुख बेंगलूर के अजीम प्रेमजी।

हाल ही में सचिन तेन्दुलकर ने एक शराब कंपनी के लिए विज्ञापन करने से इंकार कर दिया, जबकि उन्हें इस करार से साल भर में 20 करोड़ रूपये मिलने वाले थे। समाज हित में लिए गए उनके इस निर्णय को काफी महत्वपूर्ण माना जा सकता है, क्योंकि वे आज अधिकांश युवाओं के प्रेरणास्त्रोत हैं और उनकी इस सकारात्मक सोच से समाज में बढ़ रही इस कुुरीति से दूर रहने, सबक के तौर पर लिया जा सकता है। सचिन तेन्दूलकर की ओर से मीडिया में जो बयान आया है, उसके अनुसार- उन्होंने अपने पिता से यह बातें कहीं थीं कि चाहे उन्हें विज्ञापन के लिए कितनी भी रकम मिले, लेकिन वे समाज के अहित में होने वाले कुप्रभावों के पक्ष में कोई भी विज्ञापन नहीं करेंगे। वैसे इस बात का कभी खुलासा नहीं हुआ था कि वे किसी शराब कंपनी का विज्ञापन नहीं करेंगे, लेकिन जब उन्हें पहली बार इस तरह का ऑफर मिला तो सचिन तेन्दुलकर ने शराब से समाज को होने वाले नुकसान के कारण ऐसे विज्ञापन से किनारा कर लिया। यह बात सही है कि कई नामचीन शख्सीयत हैं, जो शराब का विज्ञापन कर रहे हैं और उन्हें इसके एवज में करोड़ों रूपये भी मिल रहे हैं, मगर उन जैसों को क्रिकेट के क्षेत्र में दुनिया में परचम लहराने वाले महान सचिन से कुछ सीखने की जरूरत है, उन्होंने इस तरह निर्णय लेकर एक मिसाल ही पेश की हैं। कुछ बरस पहले जब सचिन का खराब दौर चल रहा था, उस दौरान कईयों ने यह कहा था कि सचिन तेन्दुलकर का ध्यान केवल विज्ञापन पर है, न कि खेल पर है। हालांकि उन्होंने उस हालात से उबककर भारत के लिए ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए, जिसके किनारे दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता। आज की स्थिति में देखें तो उन लोगों की जुबान पर जरूर ताला लग गया होगा, जो कभी सचिन जैसे महान खिलाड़ी को लेकर कटाक्ष किए करते थे। देश और समाज हित में आज सचिन तेन्दुलकर द्वारा जिस तरह निर्णय लिया गया है, वह आने वाली पीढ़ी के लिए भी काफी मायने रखेगा, क्योंकि आज के लाखों युवा इस कुप्रवृत्ति के जाल पर फंस चुके हैं। सचिन के इस प्रयास को निश्चित ही सशक्त समाज निर्माण में सार्थक माना जा सकता है।

एक ओर जहां सामाजिक क्षेत्र में क्रिकेट के साथ सचिन तेन्दुलकर ने महानता का परिचय दिए हैं, कुछ ऐसे ही समाज हित में कार्य किए हैं, बेंगलूर के आईटी क्षेत्र के दिग्गज जाने माने वाले विप्रो कंपनी के मालिक अजीम प्रेमजी। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के अपनी दौलत में से करीब 88 सौ करोड़ रूपये एक ट्रस्ट को दिया है, जो काबिले तारीफ है। ऐसा कम देखने को मिलता है, जब कोई बड़ा उद्योगपति अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा परोपकार के लिए दें और लोगों के दुख-दर्द में सहभागी बनें। समाजसेवी अजीम प्रेमजी का परोपकार की सोच, आज के आधुनिक समाज, जहां किसी को दूसरे के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है, के लिए बड़ी मिसाल है, जिससे अन्य उद्योगपतियों के बीच एक ऐसा संदेश गया है कि वे भी कुछ इसी तरह कार्य कर समाज के प्रति अपना दायित्व प्रदर्शित करें।

अधिकतर यह देखा जाता है कि रकम हाथ में होने के बाद उसके प्रति व्यक्ति का मोह कायम हो जाता है, साथ ही वह अपनी सौ-दो सौ पीढ़ी के बारे में सोचने लगता है। ऐसे में यह भी समझने की जरूरत रहनी चाहिए कि हम अपनी पीढ़ी को निकम्मी बनाने की कोशिश करते हैं। यहां एक बात बताना जरूरी है कि अमेरिका के माइक्रोसाफ्ट कंपनी के मालिक बिल गेट्स एक अरसे से दुनिया के उद्योगपतियों के बीच यह अभियान चला रहे हैं कि उद्योगपति अपनी दौलत परोपकार में भी लगाएं, जिससे समाजसेवा के प्रति उनकी समर्पण की भावना सीधे लोगों से जुड़ सकें। कुल-मिलाकर यही कहा जा सकता है कि कुछ लोग समाजसेवा के नाम पर अस्पतालों तथा आश्रमों में फल व कपड़ा बांटकर वाह-वाही लुटने की कोशिश करते हैं, उनके लिए यह सबक है। ऐसा नहीं है कि परोपकार के लिए अधिक राशि चाहिए, कम राशि होने के बाद भी लोगों के बीच समाजसेवा किया जा सकता है, लेकिन उसमें किसी तरह का दिखावा नहीं होना चाहिए।

निश्चित ही ऐसे व्यक्तित्व भारतीय समाज और देश के लिए गौरव की बात हैं, क्योंकि जिस देश में आज की स्थिति में जहां भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो गई हों और धनपुरूशों में पैसा बटोरने का ऐसा बुखार चढ़ गया है, जिससे गरीब जनता पीस रही है। देश के धन को विदेशी बैंकों में जमा कर, उसे काला धन बनाने का जो कुत्सित प्रयास बरसों से जारी है, ऐसे में लोगों को इनकी परोपकारी भावना से रूबरू होना चाहिए। इनकी सोच सशक्त समाज के लिए बहुत हितकारी है।

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

बेनकाब शीर्ष चेहरे

देखा जाए तो देश में एक के बाद, एक भ्रश्टाचार के मामले सामने आते जा रहे हैं। इन घोटालों के चलते यूपीए सरकार और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह पूरी तरह घिरे नजर आ रहे हैं और विपक्ष के निशाने पर हैं तथा संसद तक 18 दिनों से नहीं चलने दे रहे हैं, वही नीरा राडिया फोन टेप मामले ने भी भारतीय पत्रकारिता में खलबली मचा दी है। पखवाड़े भर पहले जब मीडिया में 2 जी स्पेक्ट्रम को लेकर, ए. राजा को दूरसंचार मंत्री बनाने, लांबिंग करने का जो मामला उजागर हुआ है, उससे पत्रकारिता के शीर्ष ओहदे पर बैठे तथाकथित चेहरे बेनकाब हुए हैं। देश के नामी-गिरामी शख्सियतों के साथ ही कुछ पत्रकारों द्वारा भी नीरा राडिया से बातचीत किए जाने की बात सामने आई है, हालांकि कई पत्रकार, मीडिया से अपनी सफाई में यह बातें कह रहे हैं कि वे केवल, कुछ जानकारियां जुटाने के लिए चर्चा की गई है। यहां सवाल यही है, क्या किसी पत्रकार का यह दायित्व है कि कोई नेता को मंत्री का पद दिलाने लांबिंग करे और उसका नाम हाईकमान को प्रस्तावित करने जैसी बातें करें ?
मीडिया में जो जानकारी आई हैं, उसके मुताबिक नीरा राडिया की बातचीत, प्रमुख रूप से रतन टाटा से हुई है, जिनके कभी वह लॉयजनिंग अर्थात सरकार व मीडिया मैनेजमेंट का कार्य करती रही हैं। साथ ही नीरा, मुकेश अंबानी की कंपनी के लिए कुछ ऐसी ही जिम्मेदारी संभालती रही हैं। खुलासे से वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावल, बरखा दत्त तथा वीर सांघवी से खुले तौर दूरसंचार मंत्री की ताजपोशी और नफा-नुकसान की चर्चाएं इस लहजे में करते, मीडया में फोन टेप इस तरह सामने आया है, जैसे वे उनकी सरकार में व्यापक दखल है। साथ ही वीर संघवी को, नीरा राडिया के कहे अनुसार पत्रकारिता करने जैसी बेहुदा बातें करते भी बताया जा रहा है। फिलहाल नीरा राडिया संबंधी फोन टेप सुप्रीम कोट के पास है। कुछ दिनों पहले रतन टाटा ने यह कहते हुए कोर्ट में याचिका दायर की थी कि फोन टेप की सार्वजनिकता पर रोक लगाई जाए। इस पर कोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है। हालांकि इस मामले में कोर्ट का निर्णय आना बाकी है।
यहां एक बात और सामने आई है कि आयकर विभाग को नीरा राडिया के बहुत की कम समय में व्यापक धन-राशि होने की खबर मिली, इसके बाद केन्द्रीय प्र्रत्यक्ष कर बोर्ड अर्थात सीटीबीटी से राडिया की आय की जांच की अनुमति मांगी गई। इसके बाद राडिया के फोन टेप किए गए और करीब 3 सौ दिनों तक फोन टेप किए जाने की जानकारी अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट को दिया है। अधिकारियों ने बताया है कि करीब 5 हजार टेप में से 3 हजार टेप ही सुन पाए हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि इन टेपों में से महज 100 टेप ही मीडिया के हाथ लगे हैं। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस तरह इन टेपों से ऐसा खुलासा हुआ तो यदि सभी टेपों की बातें जनता के सामने आएंगी तो 2 जी स्पेक्ट्रम में हुए घोटाले में व्यापक खुलासे होंगे और ऐसे कई बेनकाब चेहरे भी बेपर्दा होंगे, जो शीर्ष चेहरे देश ही नहीं, वरन् पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। इधर पत्रकारिता पेशे में लगे दाग से पत्रकारों के बीच अलग-अलग चर्चा हैं, क्योंकि कुछ चेहरे हाईप्रोफाइल हैं।
जिन पत्रकारों के नाम इस घोटाले से जुड़ रहे हैं और नीरा राडिया से बातचीत करने का खुलासा हुआ है, वे लगातार सफाई दे रहे हैं। ये शख्स ऐसे चेहरे हैं, जिन्हें भावी पत्रकार अपने आई-कॉन मानते हैं ? लेकिन यहां हमारा यही कहना है कि पत्रकारिता के आई-कॉन ऐसे चेहरे होते हैं तो इनसे तो तौबा ही करना चाहिए। नीरा राडिया फोन टेप मामले के बाद कुछ पत्रकार, जिन पत्रकारों का नाम आया है, उनका अपने तर्कों व बातों से बचाव करते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि यह तो जांच का विषय है कि दोषी कौन है ? लेकिन इस खुलासे ने पत्रकारिता जगत को शर्मसार जरूर कर दिया है।

रविवार, 5 दिसंबर 2010

मुलायम और अमर की नूराकुस्ती

अक्सर कहा जाता है कि राजनीति में कभी भी अपने बेगाने हो जाते हैं और बेगाने, कभी भी अपने हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ देखने को मिला, उत्तरप्रदेश की राजनीति में। कल तक आजम खान की पार्टी से जो गांठ टूट गई थी, वह अब जुड़ गई है। हालांकि सपा प्रमुख मुलायम सिंह और महासचिव रहे अमर सिंह एक-दूसरे पर जुबानी प्रहार लगातार किए जा रहे हैं। पार्टी की बिगड़ती स्थिति को शायद मुलायम सिंह ने भांपा होगा, तभी तो वे आजम खान को पार्टी में वापिस बुलाए हैं, जाहिर सी बात है कि इससे आजम खान का कद, पार्टी में पहले से बढ़ गया है, किन्तु एक सवाल है कि क्या आजम खान की तर्ज पर अमर सिंह की भी वापसी हो जाएगी ? क्या मुलायम सिंह, कभी पार्टी के लिए गठजोड़ की भूमिका निभाने वाले अमर सिंह को मनाएंगे ? ऐसा यदि होता है तो क्या अमर सिंह, बड़े भाई मुलायम सिंह का कहना मानेंगे ? इस तरह कई सवाल इन समय समाजवादी पार्टी को लेकर खड़े हो रहे हैं। साथ ही दोनों नेताओं के बीच महीनों से जारी जुबानी नूराकुस्ती से भी कई तरह के प्रश्न उठ रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य में वैसे तो समाजवादी पार्टी का काफी वजूद है और यही कारण है कि सपा, राज्य की सत्ता पर भी काबिज हो चुकी है, लेकिन मायावती की सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले ने सपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उत्तरप्रदेश में सपा के हाथ से सत्ता क्या गई, पार्टी के नेताओं में आपसी घमासान मच गया और कुछ ही महीनों में पार्टी में जैसे विवादों का दौर शुरू हो गया। इन विवादों का ही परिणाम रहा कि समाजवादी पार्टी, उत्तरप्रदेश की विधानसभा में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका भी नहीं निभा सकी।
पार्टी के भीतर अंदरूनी कलह के कारण महासचिव रहे अमर सिंह और आजम खान के बीच तनातनी शुरू हो गई और हालात यहां तक बन गए कि सपा के मुखिया मुलायम सिंह को आजम खान को पार्टी से निष्कासित करना पड़ा। बाद में अमर सिंह का भी नाता सपा से टूट गया और उनके साथ सपा कुनबे के कई नेता भी साथ हो लिए। आलम यह रहा कि सिने अभिनेत्री रही और सांसद जयाप्रदा, अभिनेता संजय दत्त, भोजपुरी अभिनेता मनोज तिवारी समेत कई विधायकों ने भी पार्टी से अलविदा कह दिया। इस तरह समाजपार्टी के हालात दूबर बर दू आषाढ़ की तरह हो गए और फिर शुरू हुआ मुलायम तथा अमर के बीच वाक्युद्ध का दौर। एक-दूसरे पर कई तरह के आक्षेप इन नेताओं द्वारा लगाया गया। हालांकि राजनीतिक गलियारे में कमोबेश यही चर्चा रही कि मुलायम से अमर का साथ नहीं छूट सकता और सपा में चल रहा ड्रामा कुछ समय बाद खत्म हो जाएगा, मगर हुआ यह है कि दोनों सपा नेताओं के बीच उल्टे रिश्ते बिगड़ गए और काफी नोंक-झोंक के बाद आखिरकार अमर ने समाजवादी पार्टी से संबंध तोड़ ही लिए। वैसे समाजवादी पार्टी में अमर सिंह की छवि, एक कार्पोरेट जगत के व्यक्ति रही है, जो फण्ड जुटाने में माहिर माने जाते रहे, क्योंकि उनकी ऐसी कई हस्तियों से बेहतर ताल्लुकात हैं, जिसका फायदा भी सपा मिलता रहा। अमर ने जब पार्टी छोड़ी तो कहा जाने लगा कि आखिर अब सपा की वित्तीय नाव राजनीति की वैतरणी कैसे पार लगेगी ?
आज के हालात में देखें तो समाजवादी पार्टी में कभी वरिष्ठ नेता रहकर अलविदा कह गए, आजम खान की वापसी हो गई है। मुलायम सिंह ने खुद ही आजम खान को पार्टी में आने की पेशकश की, इससे तो समझा जा सकता है कि अमर की दूरी बनाने के बाद, पार्टी की स्थिति ठीक नहीं है। इसी के चलते मुलायम को अपने पुराने साथी आजम खान की याद ही गई। हालांकि मुलायम ने जब आजम को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया था, उस दौरान उनके मुंह से आजम खान के लिए आग निकली, लेकिन आज माहौल कुछ बदला-बदला सा है। आज वे दोनों राम-सुग्रीव की तरह नजर आ रहे हैं। जब आजम खान पार्टी के मंच पर आकर सपा में शामिल हुए, उसके बाद यह देखकर हर कोई हैरत में पड़ गया कि दोनों की आंखों से आंसू बह रहे हैं। सपा के इतिहास में शायद ही ऐसा, राम-सुग्रीव मिलाप हुए होंगे, लेकिन सवाल यही है कि क्या ये आगे भी राम-सुग्रीव जैसी मित्रता के धर्म को निभा पाएंगे ? क्योंकि आजम खान जिस तरह अपने ही कूचे से बेगाने कर निकाले गए थे, शायद ही वह जख्म उनके दिल से निकल पाया होगा ?
अब बात करें सपा में महासचिव रहे अमर सिंह सिंह की, तो पार्टी से अलग होने के बाद मुलायम और अमर में जो वाक्युद्ध शुरू हुआ, वह अब भी जारी हैं। एक तरफ अमर सिंह, मुलायम सिंह को अपना बड़ा भाई होने की बात कहते हैं और दूसरे क्षण ही उन्हें अपना सबसे बड़ा विरोधी करार देते हैं, यह तो आम जनता के पल्ले पड़ता नहीं है। जब अमर ने पार्टी छोड़ी तो सबकी जुबान पर था कि मुलायम, उन्हें मनाएंगे, लेकिन मान-मनौव्वल कुछ नहीं हुआ और अमर सिंह ने पार्टी छोड़ने का कारण सपा प्रमुख मुलायम के भाई को बताया। इन हालातों के बाद से पार्टी के लिए अमर सिंह, इस तरह बेगाने हो गए कि अब केवल बातों का जहर एक-दूसरे पर उगलने का सिवाय कुछ नहीं हो रहा है। जब भी इन नेताओं को मौका मिलता है, तो किसी तरह कटाक्ष किए बगैर नहीं रहते। यह बात तो सही है कि अमर सिंह की पार्टी छोड़कर जाने के बाद सपा को कई तरह से नुकसान हुआ है, भले ही इस बात को मुलायम सिंह सीधे तौर पर न स्वीकारें, लेकिन वे जरूर समझते हैं कि अमर सिंह ने किस तरह पार्टी को कार्पोरेट जगत से लाभ पहुंचाया है और ऐसे चेहरों को पार्टी से जोड़ने का काम किया, जिनके बदौलत पार्टी को वोट बटोरने में सहूलियतें हुईं।
फिलहाल समाजवादी पार्टी में आजम खान की वापसी होने के बाद एक फिर मुलायम सिंह और अमर सिंह के बीच तकरार शुरू हो सकते हैं, क्योंकि आने वाले महीनों में उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं। इस तरह एक-दूसरे की कमियों को गिनाने से भला राजनेता कैसे चूक कर सकते हैं। वैसे भी सपा की टिकट से सांसद बनीं जयाप्रदा ने यह कहकर कुछ नेताओं को जरूर चौंका दिया है कि जब वे मुंह खोलेंगी तो कईयों का पासा ही पलट जाएगा और पोल खुल जाएगी। एक बात और है कि अमर सिंह ने खुद भी एक नई पार्टी बनाने की बात कही है, हालांकि इस दिशा में कोई गतिविधि नजर नहीं आ रही है, ऐसे में आने वाले दिनों में उनकी भी वापसी हो जाने का कयास लगाना, गलत नहीं होगा। मुलायम सिंह इतना तो जान गए होंगे कि पार्टी की कोई शाखा टूटती है, तो किस तरह नुकसान होता है। इसके इतर, उनकी कांग्रेस में भी शामिल होने की चर्चा खूब रही, हालांकि अमर सिंह ने इस बात पर सीधे तौर पर कहा कि वे कांग्रेस में शामिल नहीं होंगे। जो भी हो, मुलायम और अमर के बीच आरोप-प्रत्यारोप के साथ देश की जनता यह भी देख रही है कि इन दोनों नेताओं के मध्य कैसी नूराकुस्ती चल रही है।
यहां हमारा यही कहना है कि समाजवादी पार्टी से अमर सिंह के गुडबाय कहने से निश्चित ही पार्टी समेत मुलायम सिंह यादव को काफी नुकसान हुआ है, इसके अलावा खुद, अमर सिंह भी कोई खास नफे में नहीं हैं, क्योंकि सपा से अलग होने के बाद वे भी न यहां के रहे और न वहां के। मीडिया में छाए रहने वाला अमर सिंह का वह चेहरा पूरी तरह गायब हो गया है, हालांकि वे मीडिया में बने रहने कुछ न कुछ बयान दे जाते हैं, जिससे कुछ सुर्खियां बटोरी जा सके। इस तरह कहा जा सकता है कि मुलायम सिंह और अमर सिंह की नूराकुस्ती से केवल सत्ता में बैठी मायावती लाभ उठा रही है, ठीक उसी तरह, जैसे छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं की आपसी लड़ाई का फायदा भाजपा सरकार उठा रही है। इतना तो है कि इन नेताओं की नूराकुस्ती से मीडिया को कुछ मसाला तो मिल ही जाता है और जनता को चर्चा के लिए कुछ चटपटे बयान।

बेअसर हुआ युवराज का जादू

कांग्रेस महासचिव और पार्टी के युवराज माने जाने वाले राहुल गांधी का जादू बिहार विधानसभा में कहीं नहीं चला। इसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि प्रचार में दिन-रात एक करने के बाद भी कांग्रेस की सीटें, बढ़ने के बजाय और उल्टे घट गई। राहुल गांधी के चुनावी प्रचार का जादू 14 वीं लोकसभा चुनाव में सर-चढ़कर बोला था और इसके बाद देश के राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा छिड़ गई कि अब अगले प्रधानमंत्री राहुल गांधी हो सकते हैं ? इस तरह कई राज्यों में राहुल गांधी ने युवाओं को पार्टी के प्रति आकर्षित करने नई तरकीब निकाली और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को जोड़ने टैलेंट हंट कार्यक्रम चलाया। साथ ही युवा कांग्रेस पदाधिकारियों के चुनाव में पारदर्शिता लाने प्रयास किए गए। बीते साल तक लग रहा था कि राहुल गांधी, आने वाले दिनों में कांग्रेस के नए सितारे होंगे, लेकिन बिहार चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस के मुगालते को खत्म कर दिया कि राहुल गांधी का जादू हर जगह चल सकता है ?
बिहार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने दम पर चुनाव लड़े और सभी 243 सीटों पर उम्मीद्वार खड़े किए गए। कांग्रेस आलाकमान तथा यूपीए प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी का कहना था कि बिहार में पार्टी, नए सिरे से अपना जनाधार बनाएगी। इसी के साथ खुद सोनिया गांधी ने चुनाव की कई सभाएं लीं। साथ ही कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भी दर्जनों सभाएं लीं, लेकिन कांग्रेस के हितों की दृश्टि से देखें तो इन सभाओं में पहुंची हजारों की भीड़, वोटों में नहीं बदलीं। नतीजा यह रहा कि बिहार चुनाव में कांग्रेस दूर-दूर तक नहीं ठहरी। पिछले चुनाव में कांग्रेस को 9 सीटें हासिल हुई थीं, लेकिन इस चुनाव में तो कांग्रेस प्रत्याशी हाथ मलते रह गए और पार्टी के खाते में केवल चार सीटें ही आ सकीं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि बिहार चुनाव के प्रचार शुरू होने के पहले कांग्रेस यह कह रही थी कि प्रदेश में विकास नहीं हुए और जो हुए, वह केन्द्र सरकार की योजना की राशि से हुए। इन बातों के भावार्थ समझें तो यही कहा जा सकता है कि किसी तरह विपक्षी पार्टी, विकास होने की बात तो मान रही है। बिहार की जनता की सोच तो तरक्की की है और उन्हें उन बातों से क्या लेना-देना, कि किस सरकार के फण्ड से विकास के कार्य हो रहे हैं। इसके इतर जनता को केवल विकास होते दिखना चाहिए।
बिहार चुनाव के परिणाम के अलावा कांग्रेस के हालात का जायजा लें तो कांग्रेस, राज्य में जदयू-भाजपा गठबंधन के आगे कहीं नहीं ठहरी। चुनावी नतीजे आते ही वैसे भी यूपीए प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी ने यह कहा कि हम शून्य से शुरूआत करेंगे, लेकिन यहां एक बात सोचने पर विवश करती है कि पिछले बरस कांग्रेस की चुनावी जीत जारी रही और कई राज्यों मंे कांग्रेस की सरकार बनीं, लेकिन यहां सवाल यही है कि आखिर इतनी माथा-पच्ची चुनाव में करने के बाद भी क्यों कांग्रेस की सीटों में इजाफा नहीं हुआ ? ऐसे नतीजे की उम्मीद शायद सोनिया गांधी, राहुल गांधी तथा डा. मनमोहन सिंह को नहीं रही होगी, क्योंकि यह तो कांग्रेस के चुनावी इतिहास में इसे अब तक की सबसे बड़ी बदहाली कही जा सकती है, क्योंकि जो सीटें मिली हुई थीं, उसे भी कांग्रेस नहीं बचा सकीं।
बिहार चुनाव के परिणाम के बाद राहुल गांधी के नाम पर सिर चढ़कर बोलने वाले जादू की चर्चा राजनीति जानकारों के बीच खूब हो रही है, क्योंकि आने वाले साल में आधा दर्जन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसमें सबसे अहम है, उत्तरप्रदेश का चुनाव। भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश पर पार्टी की निगाहें इसलिए ज्यादा टिकी हुई हैं, क्योंकि बरसों से यहां कांग्रेस सत्ता में नहीं लौट सकी है। यही कारण है कि कांग्रेस की चिंता ज्यादा नजर आ रही है। उत्तरप्रदेश के रायबरेली और अमेठी से श्रीमती सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी सांसद हैं। यहां कांग्रेस के कुछ बड़े नेता चुनाव जरूर जीत रहे हैं, मगर इससे कांग्रेस की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है। आगामी कुछ महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राहुल गांधी, लगातार उत्तरप्रदेश के दौरे कर रहे हैं और दलितों के घरों में जाकर खाना खा रहे हैं। इस तरह लगता है, राहुल गांधी की कोशिश सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला आजमाने की भी है, जिसमें वे कुछ हद तक सफल भी हुए हैं, लेकिन क्या यह सब प्रयास वोट में बदल पाएंगे, क्योंकि बिहार विधानसभा के नतीजे ने कांग्रेस को फंूक-फूंककर कदम रखने पर मजबूर कर दिया है।
यह बात तो सही है कि कांग्रेस के पास फिलहाल सोनिया गांधी और राहुल गांधी के सिवाय कोई और चेहरे नहीं है, जिसके नाम पर जनता से वोट मांगे जा सकें, किन्तु सवाल यहां यही है कि कांग्रेस की चुनावी वैतरणी पार इन चेहरों के सहारे नहीं हो रही है तो आने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस कौन सी रणनीति अपनाएगी, यह देखने वाली बात होगी। कांग्रेस ने राहुल गांधी की छवि को भुनाने की कोशिश लगातार बीते साल हुए चुनावों में की, लेकिन आखिर उनका जादू अब क्यों नहीं चल रहा है ? हालांकि कई जानकार यह भी कह रहे हैं कि बिहार के राजनीतिक हालात अलग थे, जिसके कारण कांग्रेस का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा, लेकिन प्रश्न यहां भी वही है कि ऐसे में उत्तरप्रदेश में देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, कैसे अपना परचम फहरा पाएगी, क्योंकि बिहार जैसे हालात उत्तरप्रदेश में भी कांग्रेस के हैं।
उत्तरप्रदेश की सत्ता से कांग्रेस लंबे अरसे से दूर है, यही कारण है कि कांग्रेस धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। साथ ही कांग्रेस नेताओं में बिखराव का भी आलम है। कांग्रेस का प्रयास होगा कि आने वाले चुनावों में बिहार जैसा दोहराव न हो, जिससे पार्टी की फिर किरकिरी हो, क्योंकि केवल एक ही नतीजे के बाद जनता के मन में कांग्रेस की साख पर असर पड़ने संबंधी तमाम तरह की बातें चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि यहां यह भी विचार करने की जरूरत है कि किस तरह केन्द्र में सुप्तप्राय हो गई कांग्रेस को सोनिया गांधी ने उबारा और लगातार दो बार यूपीए गठबंधन की सरकार बनाने में सफल रहीं। लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी के प्रचार तथा युवाओं को जोड़ने का लाभ भी कांग्रेस को मिला था। ऐसे में यह भी कयास लगाना गलत नहीं है कि कांग्रेस की सत्ता में लौटने की पूर्ण क्षमता है, भले ही वह मुश्किल हो, लेकिन नामुमकिन नहीं हो सकती। इसी आस को लेकर शायद, कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी लगातार दौरे कर रहे हैं और युवा कार्यकर्ताओं समेत सभी वर्ग के लोगांे से मिलकर भांप रहे हैं कि किस तरह कांग्रेस को सशक्त बनाया जाए और आने वाले विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर कांग्रेस की सरकार बनाई जाए।

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

तरक्की और जनमत की ताकत

लोकतंत्र में वोट की ताकत महत्वपूर्ण मानी जाती है और जब इस ताकत का सही दिशा में इस्तेमाल होता है तो इससे एक ऐसा जनमत तैयार होता है, जिससे नए राजनीतिक हालात अक्सर देखने को मिलते हैं। हाल ही में बिहार के 15 वीं विधानसभा के चुनाव में जो नतीजे आए हैं, वह कुछ ऐसा ही कहते हैं। देश में सबसे पिछड़े माने जाने वाले राज्य बिहार में तरक्की का मुद्दा पूरी तरह हावी रहा और प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का जादू ऐसा चला, जिसके आगे राजनीतिक गलियारे के बड़े से बड़े धुरंधर टिक नहीं सके और वे चारों खाने मात खा गए। हालांकि बिहार में जो चुनावी नतीजे आएं हैं, इसकी उम्मीद शायद नीतिश कुमार और उनके एलायंस एनडीए को भी नहीं रही होगी। नीतिश कुमार की अगुवाई में जदयू तथा भाजपा के गठबंधन ने 243 विधानसभा सीटों में से 206 सीटें जीतकर यह जता दिया है कि तरक्की से जनमत बेहतर ढंग से तैयार होता है। चुनावों में विकास का कार्ड इससे पहले कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में खेला जा चुका है, चाहे वह भाजपा शासित राज्य हो, या फिर कांग्रेस शासित। बिहार के चुनावी माहौल में बरसों से जाति समीकरण हावी रहा है, वह इस बार छह चरणों के चुनाव में कहीं नजर नहीं आया। साथ ही मुस्लिम वोटरों का भी दिल जीतने में नीतिश कामयाब रहे, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि जदयू और भाजपा को पहली बार वहां इतने अधिक वोट मिले हैं। जाति कार्ड पर 15 बरसों तक बिहार में एकक्षत्र राज करने वाले लालू यादव व राबड़ी यादव, नीतिश कुमार द्वारा तरक्की के नाम पर मांगे वोट के आगे कहीं ठहर नहीं सके और उन्हें बिहार के मतदाताओं ने पूरी तरह से नकार दिया। मतदाताओं ने राबड़ी देवी को दोनों सीटों से हार का स्वाद चखाया। यहां उन्होंने यह जताने की कोशिष की है कि अब वे जाति के नाम पर झांसे में आने वाले नहीं है, उन्हें तो बस तरक्की चाहिए। राजद के साथ कंधे से कंधे मिलाकर चलने वाले लोजपा के रामविलास पासवान भी मतदाताओं के वोट की मार से जरूर सबक सीख गए होंगे, क्योंकि जनता अब सब समझने लगी है। बिहार में तो ऐसा लग रहा है, जैसे लोजपा की नाव पूरी तरह डूब रही है, क्योंकि 2009 में हुए 15 वीं लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने रामविलास पासवान को अपनी वोट की ताकत पहले ही बता दी है और उन्हें देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में भेजने रूचि नहीं दिखाई थी। इस तरह मौका परस्ती की राजनीति से भी उन्हें सबक लेने की जरूरत समझ में आती है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि बरसों तक बिहार में शिक्षा और कानून व्यवस्था समेत विकास के क्या हालात रहे हैं, हर मामले में बिहार, अंतिम श्रेणी में रहता आया है। पिछला विधानसभा चुनाव नीतिश कुमार ने प्रदेश में अपराधमुक्त राज्य बनाने तथा विकास के नाम पर लड़े और उन पर जनता ने भरोसा भी जताया। इन बीते पांच बरसों में निश्चित ही बिहार में कानून के हालात सुधरे हैं और यह राज्य तरक्की की राह पर अग्रसर हो गया है। इस चुनाव में भी नीतिश कुमार, तरक्की और व्यवस्थित शासन व्यवस्था को मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में उतरे। इस तरह छह चरणों में हुए चुनावों में बिहार की जनता ने तरक्की पर सहमति जताते एनडीए गठबंधन को एक और मौका दिया। मीडिया में पहले से ही यह कयास लगाए जा रहे थे तथा कई रिपोर्ट से बताई जा रही थीं कि बिहार में फिर नीतिश कुमार की सत्ता में वापसी हो रही है। यहां यह बात तो सच है कि बिहार में इस तरह के परिणाम की उम्मीद न ही राजद प्रमुख लालू यादव को थी और न ही, खुद नीतिश कुमार को। वे यह तो भांप गए थे कि वे दोबारा बिहार की सत्ता पर काबिज हो रहे हैं, किन्तु उन्हें मतदाताओं का इतना रूझान मिलेगा, यह तो उनके मन में भी दूर-दूर तक नहीं रहा होगा। इस चुनाव में कांग्रेस, राजद तथा लोजपा का सूफड़ा साफ होता नजर आया, क्योंकि जितनी सीटें इन पार्टियों को मिली हैं, उससे तो यह भी सवाल उठने लगा है कि आखिर ये पार्टियां कैसे विपक्ष की भूमिका निभाएंगी ? कुछ अन्य पार्टी बसपा और निर्दलीय प्रत्याशी तो कहीं ठहरे ही नहीं। बिहार के चुनाव में सबसे ज्यादा बुरे हालात में कोई पार्टी रही तो वह है, कांग्रेस। कांग्रेस ने इस चुनाव में पिछले विधानसभा चुनाव के हिसाब से 5 सीटें गंवा दी हैं और कांग्रेस के केवल चार ही प्रत्याशी जीत का सेहरा बांध सके। दिलचस्प बात यह है कि बिहार चुनाव में पूरी 243 सीटों पर कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी उतारे थे और कांग्रेस ने पार्टी महासचिव राहुल गांधी के एकला चलो नीति के तहत चुनाव में खूब हाथ आजमाया, किन्तु यह कांग्रेस के लिए ऐसा चुनाव साबित हुआ, जो पार्टी के सबसे खराब प्रदर्शन के रूप में माना जा रहा है। इतिहास के पन्नों में देखें तो देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की हालत, शायद ही कभी इस तरह की हुई होगी, क्योंकि हाई-प्रोफाइल सीटों और बड़े नामों को जिताने खुद कांग्रेस के युवराज माने जाने वाले राहुल गांधी तथा यूपीए प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी ने दर्जनों सभाएं ली तथा कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। साथ ही प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भी कई सभाएं लीं, मगर इनकी सभाओं में जुटी हजारों की भीड़ कांग्रेस के लिए वोट में नहीं बदल सकी। बिहार चुनाव के बाद तरक्की के मुद्दे की बात करें तो यही है कि अब कोई भी पार्टी, विकास को दरकिनार नहीं कर सकती। चुनावों में बरसों से कायम जाति समीकरण का जोर भले ही कुछ इलाकों में हो, लेकिन बिहार चुनाव के नतीजे के बाद इस बात पर मुहर लग गई है कि जनता भी तरक्की और शांति चाहती है। यही कारण है कि बिहार की जनता ने नीतिश कुमार पर दोबारा भरोसा जताया है। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार पर अब दोहरी जिम्मेदारी बन गई है कि जनता के विश्वास पर खरे उतरें और बिहार को विकास की एक ऐसी दिशा में ले जाएं, जहां बिहार की जनता के साथ, उन्हें खुद को भी सुकून मिलंे। एक बात और भी है कि बीते कुछ बरसों में आधा दर्जन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। जिन-जिन प्रदेशों में व्यक्ति व जाति के बजाय, विकास के नाम पर जनता से वोट मांगे गए, वहां-वहां जनता का समर्थन मिला। चाहे वह 2008 में हुए दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान के विधानसभा चुनाव हो। इन राज्यों में जनता ने तरक्की पर अपनी मुहर लगाई और विकास के नाम पर ऐसा जनमत बना, जिसके आगे किसी तरह के और मुद्दे बचे ही नहीं। आम जनता को राजनेता भले ही किसी तरह इस्तेमाल कर लेने की मंशा रखते हों, मगर यह बात भी सही है कि पब्लिक भी सब जानती तथा समझती है और अब वह यह समझदार नजर आ रही है कि बिना तरक्की के कुछ नहीं हो सकता। यही कारण है कि देश में हो रहे अधिकांश चुनावों में तरक्की के नाम पर जनमत की ताकत दिखाई दे रही है, जो भारतीय लोकतंत्र की नींव मजबूती का आधार साबित हो रही है। इस तरह उन राजनेताओं को सबक सीखने की जरूरत आन पड़ी है कि जो राजनीति केवल जाति कार्ड खेलकर करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं चल सकता, क्योंकि जनता को तो बस अब तरक्की चाहिए।

रविवार, 28 नवंबर 2010

आवाम, पुलिस और सरकार

छत्तीसगढ़ ने जिस तरह विकास के दस बरस का सफर तय कर देश में एक अग्रणी राज्य के रूप में खुद को स्थापित किया है और सरकार, विकास को लेकर अपनी पीठ थपथपा रही है, मगर यह भी चिंता का विषय है कि छत्तीसगढ़िया, सबसे बढ़िया कहे जाने वाले इस प्रदेश में अपराध की गतिविधियों मंे लगातार इजाफा होता जा रहा है। राजधानी रायपुर से लेकर राज्य के बड़े शहरों तथा गांवों में निरंतर जिस तरह से बच्चों समेत लोगों के अपहरण हो रहे हैं तथा सैकड़ों लोग एकाएक लापता हो रहे हैं और पुलिस उनकी खोजबीन करने में नाकामयाब हो रही है, ऐसे में आम जनता के मन में भय बनना स्वाभाविक है। जिनके कंधे पर लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, यदि वही अपराध रोकने में अक्षम साबित हो रहे हैं, तो आम लोग भला किसके पास जाएं। इस नये राज्य में वैसे ही नक्सलवाद के कारण हालात बिगड़े हुए हैं, उपर से आपराधिक घटनाओं में हो रही बढ़ोतरी ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, लेकिन सरकार को शायद कोई चिंता नहीं है। यदि ऐसा होता तो अब तक राज्य में बेहतर पुलिसिंग तथा आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए नीति बना ली गई होती। प्रदेश में एक के बाद एक अपहरण जैसे गंभीर अपराध की घटना घटित हो रही हैं, लेकिन पुलिस के लंबे हाथ अपराधियों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।
छत्तीसगढ़ को बरसों से एक शांत इलाका माना जाता है। राज्य के निर्माण के बाद जिस तरह से विकास की गति तेज हुई है, उसी लिहाज से प्रदेश में दूसरे राज्यों से लोगों का आना शुरू हुआ है। दस बरस पहले के हालात अलग थे और आज अलग है। एक समय रायपुर को अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रमुख शहरों में गिना जाता रहा। छग बनने के बाद राजधानी के तौर पर रायपुर की बसाहट में कई गुना वृद्धि हुई। जाहिर सी बात है कि यहां की आबो-हवा में बदलाव आना ही था तथा छग में आपराधिक गतिविधियों में इजाफा होने से यहां की शांत प्रिय जनता के मन में भय पैदा हो गया है। हाल ही में हुई कुछ घटनाओं से प्रदेश के लोगों का विश्वास पुलिस से उठ रहा है, क्योंकि घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है और प्रदेश की पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है।
पिछले दिनों राजधानी रायपुर में हुई ब्लास्ट की घटनाओं को लोग भूले नहीं थे कि प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में अपहरण, बलि जैसे गंभीर मामले सामने आने लगे हैं। रायपुर, अंबिकापुर, भिलाई, बिलासपुर समेत जांजगीर-चांपा तथा कई अन्य जिलों में बच्चों, युवतियों एवं लोगों के गायब होने की जानकारी सामने आ रही है। कुछ मामलों में अपहरण के बाद फिरौती की भी मांग की गई। ऐसे कई मामलों में पुलिस की मुस्तैदी नजर नहीं आई। पुलिस केवल खोजबीन करने की बात कहकर अपने दायित्वों से मुंह मोड़ लेती है, यही कारण है कि पुलिस न तो अपहृत लोगों को बचा पा रही है और न ही, उन अपराधियों को पकड़ पा रही है। जांजगीर-चांपा जिले में भी एक आंकड़े के अनुसार करीब 137 लोगों के लापता होने की जानकारी है। इनका पता पुलिस नहीं लगा सकी है, ऐसे में किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इन लोगों को जमीं निगल गई या फिर आसमां खा गया। पुलिस कहती है कि उसका तंत्र मजबूत है, लेकिन यहां सवाल यही है कि जब तंत्र इतना मजबूत है तो फिर कैसे अपहरण जैसे मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
अंबिकापुर के हृदय विदारक घटना ने पूरे प्रदेश के लोगों को हिलाकर रख दिया है। झारखंड से फिरौती मांगने के बाद बच्चे को जान से मारने की घटना से भी न तो पुलिस जाग पाई है और न ही सरकार। यहां लोगों के गुस्से का सामना पुलिस समेत कई अफसरों को करना पड़ा, क्योंकि लोगों का कहना है कि पुलिस ने तत्परता दिखाई होती तो इस घटना को रोका जा सकता था। इसके बाद आए भिलाई में बच्चे की बलि के मामले ने पुलिस की उपस्थिति पर सवालिया निशान लगा दिया है। रायपुर से अपहृत बालक रोशन की लाश मिलने के बाद लोगों में आक्रोश और बढ़ गया है। प्रदेश में अपहरण के दर्जनों मामले दर्ज हैं और राज्य में सैकड़ों लोग लापता हैं, जिनके बारे में पुलिस पता लगाने में कामयाब नहीं हो सकी है। हालात यह हैं कि लापता होने तथा अपहरण के मामले सामने आने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। देखा जाए तो ऐसे हालात, राज्य में हर साल बनते हैं, लेकिन फिर भी सरकार क्यों आपराधिक घटनाओं को रोकने प्रयास नहीं करती ? प्रदेश में गृहमंत्री ननकीराम कंवर अपने बयानों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन राज्य में कानून व्यवस्था को सुदृढ़ नहीं बनाने उनका ध्यान नजर नहीं आता। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है, जब किसी का सपूत, अपराधियों की कारस्तानियों से उनसे दूर चला गया हो, उपर से ग्रामीण विकास मंत्री रामविचार नेता का अंबिकापुर में गैरजिम्मेदाराना बयान आना, इसे निंदनीय ही कहा जा सकता है।
प्रदेश में दिनों-दिन बिगड़ रही कानून व्यवस्था को लेकर विपक्ष भी सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया है। ग्रामीण विकास मंत्री के बयान को कांग्रेस नेताओं ने गलत करार दिया है। अंबिकापुर में हुई घटना के बाद कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष धनेन्द्र साहू तथा नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे, रितिक ( अपहरण के बाद मार दिए गए बालक ) के परिजनों से मिलने गए, यहां उन्होंने प्रदेश के हालात को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। जिस तरह छत्तीसगढ़ में आपराधिक गतिविधियां बढ़ रही हैं, उसके बाद अब लोगों की जुबान पर यह बात भी आने लगी है कि छग, अब बिहार बनने लगा है। उनका कहना है कि कुछ बरस पहले बिहार में अपहरण समेत आपराधिक घटनाएं आम थी, उसी तरह स्थिति अभी छत्तीसगढ़ में बनी हुई है।
इन घटनाओं पर गौर करते हुए सरकार को गंभीर होने की जरूरत है, राज्य की सवा करोड़ जनता के मन में जो भरोसा सरकार के प्रति कायम है, वह कहीं टूट न जाएं। आपराधिक घटनाओं को रोकने पुलिस तंत्र को मजबूत किया जाना जरूरी है, क्योंकि कहीं न कहीं पुलिसिंग में कमियां बरकरार नजर आती हैं, जिसका लाभ सीधे तौर पर अपराध करने वाले असामाजिक तत्व उठा रहे हैं और कई घरों के चिराग को खत्म कर अनेक परिवारों को उजाड़ने का कारण भी बन रहे हैं।
हमारा मानना है कि राज्य की कानून व्यवस्था को बनाने तथा आपराधिक गतिविधियों पर लगाम लगाने प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को अपने हाथ में लेना चाहिए, क्यांेकि बीते कुछ बरसों से पुलिस विभाग का जो हाल है, वह किसी से छिपा नहीं है। प्रदेश के गृहमंत्री ननकीराम कंवर, नक्सली मामले में इसे राश्ट्रीय समस्या बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन प्रदेश में हो रही अपहरण की घटनाएं तो छत्तीसगढ़ से जुड़ी हैं, ऐसे में अब समय आ गया है कि प्रदेश में बेहतर कानून व्यवस्था कायम करने माकूल प्रयास किए जाएं। समय रहते ऐसा नहीं हुआ तो शांतप्रिय माने जाने वाली जनता को कहीं सड़क पर न उतरना पड़ जाए।

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

विदेशी शिक्षा और भारतीय छात्र

भारत के विकास में शिक्षा का अहम योगदान रहा है और आगे भी रहेगा। इस लिहाज से देखें तो देश की सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था को लेकर गहन विचार किए जाने की जरूरत है, मगर अफसोस, भारत में अब तक मजबूत शिक्षा नीति नहीं बनाई जा सकी है। नतीजतन, हालात यह बन रहे हैं कि भारतीय छात्रों को विदेशी जमीन तलाशनी पड़ रही है। स्कूली शिक्षा में भारत की मजबूत स्थिति और गांव-गांव तक शिक्षा का अलख जगाने का दावा जरूर सरकार कर सकती है, लेकिन उच्च शिक्षा में भी उतनी ही बदहाली कायम है। उच्च शिक्षा नीति और व्यवस्था में किसी तरह का बदलाव नहीं होने का परिणाम है कि भारतीय छात्रों का रूझान विदेशों में जाकर शिक्षा ग्रहण करने की तरफ बढ़ता जा रहा है। भले ही उन्हें इसके एवज में कोई भी कीमत चुकानी पड़े। बीते साल आस्ट्रेलिया में एक के बाद एक भारतीय छात्रों पर हमले हुए, उसके बाद भी विदेशी धरती में शिक्षा प्राप्त करने का मोह कम होता नजर नहीं आ रहा है। इस स्थिति के लिए कई पहलू जिम्मेदार हो सकते हैं। साथ ही सरकार की नीति के कारण भी ऐसे हालात भारत में बरसों से बनते आ रहे हैं। शिक्षा के नाम पर भारतीय छात्रों द्वारा विदेशों में अरबों रूपये खर्च किए जा रहे हैं और इस तरह वहां की आर्थिक समृद्धि बढ़ाने में भागीदार बन रहे हैं। जिसे भारतीय हितों की दृष्टि से देखें तो यह कदापि ठीक नहीं है। बीते दिनों भारत आकर अमेरिका के राश्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने इस देश को दुनिया का एक शक्तिशाली राश्ट्र जरूर बताया हो, लेकिन उच्च शिक्षा के लिहाज से आंकलन किया जाए तो भारत की मजबूत स्थिति कहीं नजर नहीं आती। हमेशा से कहा जाता रहा है कि जिस देश में शिक्षा की नींव मजबूत होगी, वह नित नए विकास के आयाम स्थापित करेगा। इस बात को अमेरिका के विकास से जोड़कर देखा जा सकता है। अमेरिका में आज दुनिया भर के छात्रों का उच्च शिक्षा के लिए रेला लगा हुआ है, उसमें भारतीय छात्रों की संख्या कहीं अधिक है। अमेरिका की एक रिपोर्ट बताती हैं कि वहां पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या हर बरस बढ़ रही है। ऐसे में समझा जा सकता है कि भारत में उच्च षिक्षा के क्षेत्र में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। रिपोर्ट में दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी छात्रों का भारतीय शिक्षा से मोह भंग हो रहा है। यही कारण है कि भारत आकर अध्ययन करने अमेरिकी छात्रों की संख्या में बीते साल से करीब 15 फीसदी कमी हुई है। ऐसे में अंदाज लगाया जा सकता है कि भारतीय शिक्षा के क्या हालात हैं ? और भारतीय शिक्षा व्यवस्था तथा नीति में काफी कुछ बदलाव की जरूरत है। आजादी के बाद की स्थिति पर नजर डालें तो देखा जा सकता है कि भारत में केवल जनसंख्या में हर बरस बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन शिक्षा की गुणात्मकता के हिसाब से विचार करें तो ऐसी किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं हो सकी है। हर पांच बरस में सरकार बनती है और सरकार नई हो या फिर पुरानी, सभी शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त कमियों को दूर करने की बात कहते हैं, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि शिक्षा का बजट बहुत कम होता है। पिछले साल बजट में ऐसा कुछ देखने को मिला। इस तरह शिक्षा की बदहाली भला कैसे सुधर सकती है ? भारत में जनसंख्या के लिहाज से वैसे तो विश्वविद्यालयों की संख्या कम ही नजर आएगी, किन्तु यह भी जरूरी नहीं, कि हर व्यक्ति की पहुंच तक, जिस तरह स्कूल शिक्षा की व्यवस्था की गई है। वैसी कोई व्यवस्था उच्च शिक्षा क्षेत्र में हो पाए, ऐसा सोचना हर स्थिति में मुश्किल ही लगता है। यदि उच्च शिक्षा को केवल बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों की संख्या को बढ़ाया जाएगा तो उच्च शिक्षा के नाम पर केवल दुकानें ही खुलेंगी। वैसे भी छात्र संगठन का एक वर्ग, शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ सड़क पर लड़ाई लड़ रहा है और इसे देश के लाखों छात्रों का समर्थन भी मिल रहा है। ऐसे समय में सरकार को रोजगारपरक शिक्षा के क्षेत्र में नई नीति बनाने की जरूरत है। उच्च शिक्षा में बरसों से जो कमियां बरकरार है, उसे सरकार को दूर करने की पहल करनी चाहिए, नहीं तो विकासशील भारत को विकास के जो आयाम तय करना है, वह पूरा नहीं हो पाएगा। बीते साल उच्च शिक्षा क्षेत्र में विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता को तय करती एक और रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें दुनिया के 200 विश्वविद्यालयों की सूची में भारत के एक भी विश्वविद्यालयों का नाम नहीं था। इसे विडंबना ही तो कहा जा सकता है कि कभी जिस देश की धरती में शिक्षा के लिए विदेशों से पढ़ने वाले छात्र बड़ी संख्या में आते रहे हांे, यदि उसी देश के विश्वविद्यालयों की इस तरह बदहाली होगी तो यहां उच्च शिक्षा में व्याप्त काली छाया का अंदाज लगाया जा सकता है। यहां यह भी बताना जरूरी है कि मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने देश में उच्च शिक्षा में लगातार हो रही कमी को देखते हुए विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने का हवाला दिया था, लेकिन यह देश की उच्च शिक्षा के हालात सुधारने कोई कारगर कदम नहीं हो सकता। आंकड़े बताते हैं कि स्कूली शिक्षा की दहलीज भारत में करीब 22 करोड़ छात्र पार करते हैं, जिनमें महज 12 से 14 छात्र ही उच्च शिक्षा ले पाते है। सबसे पहले तो इस दूरी को पाटने तथा कम किए जाने पर गहन विचार करना चाहिए। सरकार के साथ शिक्षाविदों को भी इस मसले पर हस्तक्षेप किए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि शिक्षा की नींव मजबूत करने, ऐसा किया जाना अहम है। हमारा मानना है कि विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने के बजाय यदि सरकार देश में चल रहे विश्वविद्यालयों की बदहाली दूर करे, तो शायद भारतीय छात्रों को विश्वास हो कि अब भारत में भी विदेशों में मिलने वाली शिक्षा की तरह सुविधा बढ़ गई है। फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है और आलम यह बना हुआ है कि भारतीय छात्रों का विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाने, देश से पलायन बद्स्तूर जारी है। इस बात पर सरकार ने कई अवसरों पर अपनी चिंता जाहिर की है, मगर सवाल यही है कि आखिर अब तक इस समस्या को दूर करने किसी तरह का प्रयास क्यों नहीं किया गया है ? विदेशी धरती पर नस्लभेद जैसे जख्म लेने के बाद भी विदेशी शिक्षा से छात्रों की दिलचस्पी में कमी नहीं आ रही है, इसका कारण यही लगता है कि इन छात्रों को केवल भविष्य की चिंता है, लेकिन बदलते समय के साथ सरकार को उच्च षिक्षा में व्याप्त खामियों को दूर कर पुरानी नीति में बदलाव करना चाहिए, जिससे भारत की प्रतिभा देश में ही रहकर अपना हुनर दिखा सके। यह बात कहीं नहीं छिपी है कि भारतीय प्रतिभा ही है, जो दुनिया में परचम फहरा रही है, लेकिन इन प्रतिभाओं की काबिलियत के हिसाब से शिक्षा व्यवस्था करने में सरकार पंगु बनी हुई है। ऐसे में भला, कैसे भारतीय छात्रों में विदेश जाकर शिक्षा लेने की होड़ न हो, लेकिन हमारा यह भी कहना है कि उस स्थिति में इस देश की सरकार, नेताओं और हमें, ढिंढोरा पीटने का कोई हक नहीं बनता कि किसी भारतीय मूल के प्रवासी नागरिक का विदेशी धरती में उपलब्धि हासिल करने पर सीना चौड़ा करें और गौरव की बातें करें।

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

क्यों चुप हैं प्रधानमंत्री ?

भारत में वैसे तो भ्रष्टाचार की जड़ें एक अरसे से गहरी हैं, मगर बीते एक दशक के दौरान इस बीमारी ने हर तबके को अपने चपेट में ले लिया है। भ्रष्टाचार को लेकर यदि सुप्रीम कोर्ट को यह टिप्पणी करना पड़े कि क्यों ना, किसी काम के एवज में रिश्वत की राशि तय कर दी जाए, जिससे यह कार्य अंध कोठरी में न चले। सुप्रीम कोर्ट का सीधा आशय यही था कि देश में भ्रष्टाचार पूरे तंत्र में हावी हो गया है, यदि ऐसा ही चलता रहा तो देश में मुश्किल हालात उत्पन्न हो जाएंगे। इन दिनों भ्रष्टाचार के मामले में तीन प्रकरण लोगों के दिमाग के लिए सिरदर्द बना हुआ है। पहला, काॅमनवेल्थ गेम्स में सुरेश कलमाड़ी केकरोड़ों की गड़बड़ी का कमाल। दूसरा, आदर्श सोसायटी में शहीदों के हिस्से के फ्लैट को अपने परिजनों को देने के मामले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हाण का नाम आना और फिर उन्हें कुर्सी गंवाना। तीसरा भ्रष्टाचार का मसला रहा, केन्द्र की यूपीए सरकार में दूरसंचार मंत्री रहे ए. राजा का, जिसका 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में करीब 1 लाख 76 हजार करोड़ के गड़बड़झाले में फंसना। यह तो भ्रष्टाचार के बड़े मामले रहे, लेकिन धरातल के हालात काफी बिगड़ गए हैं। यही कारण है कि देश के अरबों-खरबों रूपये विदेशी बैंकों में जमा है। आखिर यह पैसा कहां से आया, इसे तो सीधे तौर पर समझा जा सकता है कि यह भ्रष्टाचार कर, जुटाई गई राषि है। इस ब्लैक मनी के कारण ही देश में गरीबी छाई हुई है, लेकिन किसी को इस बात की चिंता नहीं है कि आखिर कैसे काला धन को वापस लाया जाए। एक बात और है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जब भी कोई मुद्दा उठाता है, तो उसे बड़ी कुर्बानी देनी पड़ती है। एक आरटीआई कार्यकर्ता सतीश शेट्ठी को कुछ भ्रष्टाचारियों का दंश झेलना पड़ा और उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी, फिर भी कहीं से सरकार के नुमाइंदें सबक लेते नजर नहीं आते, यह विचार किसी के मन में नहीं आ रहा है। यहां तक की, जब योग गुरू बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना अभियान चलाने की बात कही तो उन्हें धमकियां मिलने की बात सामने आ रही है, ऐसे में देश में सुशासन की सरकार कहां है, यह समझा जा सकता है। यहां तो केवल यही कहा जा सकता है कि सरकार, भ्रष्टाचारियों के सामने अपंग बनकर रह गई है। भ्रष्टाचार के खुलासे करने, सूचना का अधिकार एक बड़ा अस्त्र है, लेकिन नौकरशाही तथा लालफीताशाही के कारण यह अस्त्र भी अचूक साबित हो रहा है। हालांकि कुछ मामले में यह लोगों को मिले अधिकार के कारण अफसरों और मंत्रियों, या कहें कि सत्ता की ऊंची कुर्सी में बैठे धनपशुओं को यह रास नहीं आता कि कोई उनके किए गए भ्रष्टाचार की पोल खोले। साल भर की स्थिति को देखें तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले कई सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी है, किन्तु सरकार ने इस बात की फिक्र कभी नहीं की कि धनपशुओं की ऐसी करतूतों को कैसे रोका जाए और भ्रष्टाचार के खिलाफ एकमत कैसे तैयार किया जाए। यह बात भी सही है कि आज के हालात में भ्रष्टाचार को पूरी तरह खत्म करना, उसी तरह से हो जाएगा, जैसे पत्थर से पानी निकालना, क्योंकि भ्रष्टाचार, अधिकांश तबकों की नसों में खून बनकर दौड़ रहा है। भ्रष्टाचार की समस्या, देश की सबसे बड़ी समस्या है, लेकिन सरकार ने कभी इस मुद्दे के लिए न तो अपने स्तर पर पहल की और ना ही, कभी ऐसी कोई नीति बनाती नजर आई, जिससे कहा जा सके कि भ्रष्टाचार के सुरसा मुंह पर लगाम लग जाएगा। देश में यह बात लगातार मीडिया के माध्यम से सामने आ रही है कि कहीं न कहीं बेनामी संपत्ति मिल रही है। आयकर छापे तथा ईओडब्ल्यू की कार्रवाई में छोटे-छोटे अफसरों के पास करोड़ों की संपत्ति मिल रही है, जबकि वह पूरी जिंदगी नौकरी करे तो भी इतनी संपत्ति नहीं जुटाई जा सकती। यह बात तो किसी से छिपी नहीं है कि कैसे कोई अफसर या कर्मचारी, नौकरी में आने के पहले पूरी तरह कड़का होता है, लेकिन कुछ ही बरसों बाद वह करोड़ों की संपत्ति का मािलक बन जाता है। कुछ इसी तरह के हालात राजनीतिक कर्णधारों के साथ भी देखने को मिलता है। अब तक जितने भी मामले सामने आते जा रहे हैं, उन मामलों में सरकार का रवैया नकारात्मक ही रहा है। सरकार, यदि भ्रष्टाचार को खत्म करने के बारे में कुछ भी निर्णय लेती तो सबसे पहले संसद में किसी सख्त कानून के पक्ष में होती, लेकिन भारत जैसे देश के लिए विडंबना ही है कि अब तक जितनी भी सरकार ने सत्ता की कमान संभाली है, किसी ने ऐसी किसी कानून की हिमायत नहीं की। चुनावों मे जरूर भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बनाया जाता है और बड़े-बड़े दंभ भरे जाते हैं कि उनकी सत्ता में काबिज होते ही भ्रष्टाचार मुक्त सरकार बनेगी, लेकिन वही ढाक के तीन पात। ऐसे कर्णधारों की सरकार तो बन जाती है, लेकिन उनकी सरकार भ्रष्टाचार से मुक्त तो नहीं होती, बल्कि वह सरकार, भ्रष्टाचारमय सरकार जरूर बन जाती है। भ्रष्टाचार की एक तस्वीर देश में लगातार बढ़ते करोड़पति सांसदों को लेकर भी देखी जा सकती है, क्योंकि हर नेता सांसद बनने के पहले न तो करोड़पति होता है और न ही, कोई उद्योगपति। यहां स्थिति अलग होती है, कई सांसदों की कुछ बरसों की संपत्ति और आय के बारे जानकारी ली जाए तो दूध का दूध तथा पानी का पानी हो जाएगा। अब बात प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की। यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल के बाद इस दूसरे कार्यकाल में भी उनकी चुप्पी बनी हुई है। उनकी चुप्पी पर वैसे तो विपक्ष द्वारा आए दिन कटाक्ष किया जाता रहा है और उन पर कई तरह से कमजोर प्रधानमंत्री होने की बातें की जाती रही हैं। निश्चित ही, प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों से देश की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है, लेकिन जब उनकी ही पार्टी व सरकार में जमे मंत्रियों पर करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोप लगे और वह रिपोर्टों से स्पश्ट भी हो, उसके बाद भी यदि प्रधानमंत्री अपनी चुप्पी न तोड़े, तो फिर यह तो इस देश की उस आम जनता के साथ नाइंसाफी है, जिनके नाम का नारा लेकर वे यूपीए सरकार के मुखिया बने बैठे हैं। भ्रष्टाचार से आम जनता ज्यादा पीसती है, क्योंकि महंगाई की मार उसे ही झेलनी है, क्योंकि उन्हें कोई महंगाई भत्ता तो नहीं मिलता। काॅमनवेल्थ गेम्स के गड़बड़झाले में सुरेश कलमाड़ी का नाम आयोजन के पहले आ जाने के बाद भी उसे नहीं हटाया गया और ना ही, उससे अधिकार छिने गए। इस भ्रष्टाचार की कालिख को यूपीए सरकार धो भी नहीं पाई थी, या कहंे कि सरकार तटस्थ रहने के मूड में थी, उसी समय महाराष्ट्र में आदर्श सोसायटी के फ्लैट घोटाला का मामला सामने आ गया। शहीदों के नाम के फ्लैट को जब सेना के अफसरों द्वारा भी गलत तरह से लिया गया हो तो फिर इसे भ्रष्टाचार और मनमानी की हद ही कही जा सकती है। इस मामले में मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हाण की छुट्टी के साथ सुरेश कलमाड़ी भी आंख का तारा ना होकर, सरकार के लिए आंख का कीड़ा बन गए, जिसे सरकार ने अपने से बाहर फेंकने में ही भलाई समझी, क्योंकि विपक्ष, सरकार को संसद में इन मुद्दों पर लगातार घेर रहा था और सरकार की किरकिरी हो रही थी। इसके बाद दूरसंचार मंत्री रहे ए. राजा के मामले ने तो सरकार की बेबसी की पोल खोलकर रख दी। कैग की रिपोर्ट के बाद भी प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की चुप्पी बनी रही। हालात यहां तक बन गए कि भ्रष्टाचार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए प्रधानमंत्री की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि जब ए. राजा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति सरकार से मांगी गई तो उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया। इसके बाद तो प्रधानमंत्री ही सवालों के घेरे में आ गए। शायद ऐसा पहली बार हुआ होगा, जब इस तरह किसी प्रधानमंत्री की भूमिका और चुप्पी पर सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह टिप्पणी की हो। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक ताकीद कर दी है कि कभी सरकार यह ना कहें कि उन्हें हलफनामा के लिए मौका नहीं मिला। कुल-मिलाकर सुप्रीम कोर्ट की भ्रष्टाचार को लेकर जो रूख है, उसे सरकार को भी समझने की जरूरत है, क्योंकि ऐसे में विकसित राष्ट्र, भारत को कभी नहीं बनाया जा सकता। भ्रष्टाचार ही है, जिसके कारण विदेशी बैंकों में भारत के गरीबों के हिस्से का पैसा जमा है। इस मामले में भी केन्द्र की यूपीए सरकार और प्रधानमंत्री को सुध लेने की जरूरत है, तभी देश की जनता का उन पर विश्वास कायम हो सकेगा। कहीं ऐसा ना हो कि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की चुप्पी से यूपीए सरकार को जनता की दरबार में बड़ी कीमत ना चुकानी पड़ जाए। सरकार और प्रधानमंत्री, जरा इन बातों पर विचार करें।

सोमवार, 15 नवंबर 2010

टीआरपी और पाखंड चेहरा

बात एक साल पुरानी है। सदी के महानायक अभिनेता अमिताभ बच्चन फिल्म पा दिसंबर 2009 में रिलीज हुई थी, जिसमें उन्होंने आॅरो के किरदार को निभाया है। इस फिल्म की दर्षकों में खासी चर्चा रही और पहली बार इस फिल्म के माध्यम से ऐसी अजीबो-गरीब बीमारी प्रोजेरिया, लोगों के सामने आया, जिसे जानकर हर कोई सोच में पड़ गया, क्योंकि डाॅक्टरों की मानें तो यह बीमारी, एक करोड़ में एक व्यक्ति को होती है। पा फिल्म में प्रोजेरिया बीमारी को दुनिया के सामने लाया गया है और इस फिल्म मे अभिनेता अभिताभ बच्चन ने 13 वर्षीय एक ऐसे बालक का किरदार निभाया है, जिसे प्रोजेरिया बीमारी रहती है और वह बचपन में ही बूढ़ा दिखाई देता है। पहले इस बीमारी के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी थी, लेकिन पा फिल्म की चर्चा के बाद मीडिया भी भला कहां दूर रहने वाला था। अमिताभ बच्चन के पा फिल्म में अभिनय किए जाने से इसे और प्रसिद्धि मिली। तभी तो कल तक जिसे महज एक बीमारी समझ कर, कोई भी मीडिया खबर बनाना नहीं चाहता था, उस फिल्म की चर्चा में आने के बाद इस पर खबर बनाने मीडिया मंे होड़ मची रही। यह केवल टीआरपी बढ़ाने का चक्कर है और ऐसे में एक बार फिर मीडिया का पाखंड चेहरा उजागर हुआ है। पिछले बरस अमिताभ बच्चन अभिनीत पा फिल्म की जैसे ही चर्चा षुरू हुई तो मीडिया की नजर में प्रोजेरिया बीमारी से पीड़ित छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के छोटे से गांव भिलौनी का कुलजीत आ गया। इस बीच डेढ़ दर्जन से अधिक मीडिया के कर्ता-धर्ता पहुंचे और फिर मची टीआरपी की होड़। उस दौरान पखवाड़े भर में ऐसा कोई दिन नहीं गया, जिस दिन कोई चैनल के लोग रिपोर्टिंग के लिए नहीं पहुंचे हांे। यह बात तो सही है कि जब कोई महत्वपूर्ण खबर मीडिया पर आती है तो हर मीडिया उसका हिस्सा बनता चाहता है, लेकिन टीआरपी के चक्कर में मीडिया का पाखंड चेहरा उजागर हो तो उसे क्या कहा जा सकता है। कुलजीत लंबे अरसे से एक अजीबो-गरीब बीमारी से ग्रसित है, इन वर्षों तक उसकी खबर या उस परिवार की बेबषी की खबर किसी चैनल ने दिखाने की सुध नहीं ली, लेकिन जब यह महानायक अमिताभ बच्चन की अभिनीत फिल्म पा से जुड़ा नजर आया तो सभी ने कुलजीत के घर की ओर रूख कर लिया। हद तो तब हो गई, जब अपनी टीआरपी या फिर दर्षकों को उसका एटीट्यूड दिखाने के चक्कर में उससे करतब जैसे कार्य कराया गए। खबर बनाने के लिए मीडिया के लोगों को यह ख्याल नहीं रहा, जिस बालक पर वे खबर बनाना चाह रहे हैं और वह गंभीर बीमारी से ग्रसित है और एकदम कमजोर है। इन सब बातों को दरकिनार कर, प्रोजेरिया से पीड़ित बालक कुलजीत को कभी कोई मीडिया के नुमाइंदे नचा रहा है तो कोई दौड़ा रहा है। उससे ऐसा कराया गया, जो उसका रोज की दिनचर्या में सामिल नहीं था। एक चैनल से पहुंचे लोगों ने केवल खबर बनाने के लिए ही कुलजीत की पसंद का ख्याल रखा और वह जो पसंद करता था, उसे लाने के लिए गांव के एक व्यक्ति को पचास रूपये दिए और खबर बनाने को लेकर उंचे लोगों से सहयोग दिलाने का हवाला दिया। यह कोई एक दिन की बात नहीं है, हर दिन पहुंचने वाले मीडिया के लोग केवल खबर बनाने तक कुलजीत के परिवार की खोज खबर ले रहा है। उसके बाद तो उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है। खबर बनाने पहुंचे कई चैनल वालों ने आर्थिक मदद दिलाने की बात कुलजीत के परिवार को कही, लेकिन जैसे लौटे, अब इस बारे में सोचने वाला कोई नहीं है। यहां सवाल यही है कि क्या किसी मीडिया वाले की इतनी ही भूमिका है कि वे खबर बनाने के लिए एक गरीब परिवार को सब्जबाग दिखाए और वहां से खबर बनाने के बाद इस बात को भूल जाए। ऐसा ही कुछ हुआ, भिलौनी के कुलजीत के परिवार वालों के साथ। अमिताभ बच्चन की फिल्म पा की चर्चा होने के बाद कुलजीत के परिवार वाले भी मीडिया के सुर्खियां बने रहे, लेकिन मीडिया वाले जिस तरह उनकी खोज खबर लेने पहुंचे थे, वह उनके जाने के बाद से ही गांव के रास्तों पर कहीं ठहर गया है। मीडिया में काम करने वाले लोगों का काम खबर बनाना है, लेकिन किसी को खबर बनाने के नाम पर झूठी सब्जबाग दिखाए जाने को किसी भी सूरत में मीडिया जगत के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता। एक परिवार वैसे ही गरीबी के बाद अपने चहेते का इलाज कराने में हर वो जुगत बनाने की कोषिष कर रहा है, जो उसके बस में है, लेकिन मीडिया द्वारा केवल टीआरपी और खबर के नाम पर जो पाखंड चेहरा दिखाया गया, उसे स्वच्छ पत्रकारिता की नींव मजबूत नहीं हो सकती। एक मीडिया के लोगों द्वारा यहां तक कहा गया कि कुलजीत को वे महानायक अभिताभ बच्चन से मिलाएंगे, अंतिम स्थिति में उन लोगों की बात फोन से जरूर करा दी जाएगी, लेकिन आज कुलजीत और उसके परिवार के लोगों के हालात तो वैसे ही हैं और कुलजीत तथा उसका परिवार बीमारी की लड़ाई में लगे हैं, लेकिन उन मीडिया के लोगों का वादा अब तक पूरा नहीं हो सका है। कुलजीत और उसके परिवार वालों के मन में अब भी अमिताभ बच्चन से मिलने की चाहत बाकी है, लेकिन सवाल यही है कि आखिर पहल करे तो करे कौन ? अभी हाल ही में कुलजीत के परिवार वालों ने 10 नवंबर को उसका जन्मदिन मनाया, इस दौरान भी उनकी आंखों में अमिताभ बच्चन से मिल पाने का सपना दिखाई दिया। उनकी आंखों की पलकें उन्हें आज भी निहार रही हैं। कुलजीत के भाई सुजीत का कहना है कि खबर के नाम पर डेढ़ दर्जन से अधिक मीडिया वाले उनके घर पहुंचे और कईयों ने उन्हें प्रषासन र्से आिर्थक मदद दिलाने में सहयोग दिलाने की बात कही, लेकिन एक-दो को छोड़कर किसी ने दोबारा संपर्क करने की कोषिष नहीं की। यहां बताना लाजिमी है कि पाॅ फिल्म मंे जिस प्रोजेरिया बीमारी को रेखांकित किया गया है, इसी बीमारी से छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम भिलौनी (पामगढ़) के कुलजीत भी पीड़ित है। श्री दिलीप बंजारे का 12 साल का पुत्र कुलजीत बचपन से बीमारी से पीड़ित है, लेकिन डाॅक्टरों ने 2005 में प्रोजेरिया बीमारी होने की पुष्टि की। गरीबी होने के बाद भी कुलजीत का इलाज उसके परिजन कराते आ रहे हैं। डाॅक्टरों ने प्रोजेरिया से पीड़ित की अधिकतम उम्र 20 साल बताया है। बावजूद परिजन उसके इलाज के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह से भी गुहार लगाई है। तीसरी में पढ़ने वाला कुलजीत का जुड़वा बहन भी है, उसका नाम बिंदिया है और वह छठवीं में पढ़ रही है। कुलजीत बीमारी से ग्रस्त है, जबकि ंिबंदिया स्वस्थ है। कुलजीत का प्रोजेरिया बीमारी के चलते सारीरिक विकास रूक गया है और वह महज 7 किलो का है और उसकी उंचाई ढाई फीट है। उसके दांत टूट गए हैं तो सिर व सरीर पर बाल नहीं है। कान बड़े हैं तो नाक लंबी है। गाल पिचके हुए हैं और चेहरे पर झुर्रियां छाई हैं। नसें तनी हुई हैं, जैसे वह बूढ़ा हो गया हो। प्रोजेरिया बीमारी से व्यक्ति बचपन में ही बूढ़ा हो जाता है। कुलजीत का वजन में कमी होती जा रही है। इस परिवार को आर्थिक मदद की जरूरत है, लेकिन फिलहाल कोई हाथ का सहारा इन्हें नहीं मिल सका है।

रविवार, 14 नवंबर 2010

भारत के बेरोजगारों का क्या होगा ?

भारत, दुनिया का एक विशाल देश है और आबादी के लिहाज से देखें तो पूरे संसार में चीन के बाद इसका दूसरा स्थान है। इस तरह भारत में आज की स्थिति में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, जिसे सत्ता पर काबिज होने के पहले हर पार्टी के नेता खत्म करने की दुहाई देते हैं, मगर हालात में किसी तरह का बदलाव नहीं होता। देश में केवल साल-दर-साल आबादी बढ़ती चली जा रही है और रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है। ऐसे में देश के करोड़ों युवा, बेरोजगार हो गए हैं और इसका सीधा असर देश के विकास पर पड़ रहा है। यह भी माना जाता है कि पूरी दुनिया में युवाओं की जो संख्या है, उसमें भारत आगे है, लेकिन युवाओं को रोजगार देने का जो कार्य होने चाहिए, वह कमी अब भी बरकरार है। अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने तीन दिवसीय दौरे पर पहली बार भारत आए। बराक के भारत आने के पहले और आने के बाद राजनीतिक हलकों के साथ कूटनीतिक तौर पर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे कि अमेरिकी नीति जरूर भारत के हित में होगा। बराक के भाषणों में अधिकतर यही बात रही कि भारत में सांस्कृतिक विरासत है, जो दुनिया के किसी अन्य देशों में देखने को नहीं मिलता और उन्होंने महात्मा गांधी का गुणगान कर लोगों का मन मोह लेने की कोशिश की और वे इसमें सफल भी हुए। ओबामा जब भारत आए तो उन्होंने शुरूआत में ही कहा कि वे अमेरिका में बढ़ते बेरोजगारी को लेकर भारतीय कंपनियों के साथ करार करने आए हैं। इस नीति में भी बराक हुसैन, होशियार साबित हुए और करीब 20 कंपनियों ने अपनी हामी भरते हुए करोड़ों रूपये का निवेश करने की बात कही। इससे निश्चित ही अमेरिकी राश्ट्रपति गदगद हो गए हैं, किन्तु यहां भारत में इस बात की इन कंपनियों को चिंता नहीं है कि जो वे, देश में ही अपनी कंपनी का काम फैलाएं और भारत में बढ़ती बेरोजगारी को दूर करने में सहयोग दें। केन्द्र में बैठी सरकार भी बराक ओबामा की इस नीति को नहीं समझ पाई कि वह केवल भारत को सशक्त राश्ट्र होने का हवाला देते हुए अपना काम साधने आए हैे। यही कारण है कि सरकार ने भी इस बात की चिंता नहीं की कि भारत में बेकार बैठे युवा बेरोजगारों का क्या होगा ? आखिर सरकार क्यों उनकी चिंता नहीं करती नजर आई। जब भारत में ही बेरोजगारी की समस्या ने विकराल रूप अख्तियार कर लिया है और यहां की सरकार उस गंभीर समस्या से निपटने कामयाब नहीं हो पा रही है, इस स्थिति में भी भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में निवेश की बात तो बेमानी लगती है। भारतीय कंपनियों के निवेश के बाद अमेरिका में करीब 50 हजार बेरोजगारों को रोजगार मिल जाएगा, इस प्रयास से तो अमेरिकियों की बांछें निश्चित ही खिल जाएंगी, लेकिन भारत में स्थिति किस तरह बिगड़ रही है, इस बात की फिक्र ऐसे हालात में कौन करेगा, यह कह पाना मुश्किल लगता है। यह तो वही हो गया, दिया तले अंधेरा या यूं कहें कि खुद के घर में अंधेरा छाया हुआ हो और हम दूसरों के घर का अंधेरा दूर करने निकल पड़ें। यह बातें भारत के किसी राज्य द्वारा किसी अन्य राज्यों के सहयोग की बात होती तो अलग थी, लेकिन यह मुद्दा एक देश से दूसरे देश का है। यहां पर भारत सरकार के नेतृत्वकर्ताओं को कूटनीतिक तौर पर लाभ-हानि क्या हो सकते हैं, यह भी विचार करने की जरूरत थी। सवाल यही है कि भारत में बीते कुछ दशकों में बेरोजगारी के हालात बद्तर हुए हैं और जिस तरह से आबादी भारत की बढ़ रही है, वह तो बेरोजगारी जैसी समस्या के तौर पर किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। आज भारत की आबादी केवल चीन से कम है और देश की जनसंख्या सवा अरब से ऊपर पहुंच गई है। यह भी माना जा रहा है कि भारत की आबादी आने वाले दस बरसों में करीब 2 अरब होने जाएगी। इस बात की कल्पना करने भर से जानकार सोच में पड़ जा रहे हैं, मगर सत्ता के मद में मशगूल नेताओं को इस समस्या की चिंता भला कैसे हो सकती है, उन्हें फिक्र जो अपनी कुर्सी की बनी रहती है। आंकड़ों के तौर पर भारत में आने वाले कुछ सालों में बेरोजगारी की समस्या किस रूप में निर्मित हो जाएगी, यह तो समझा ही जा सकता है, लेकिन देश की ऊंची कुर्सी में बैठे नीति-निर्धारकों की समझ में आए, तब ना। देश में तीन प्रमुख समस्या ज्यादा गंभीर बन गई है, एक भ्रष्ट्राचार, दूसरी महंगाई और तीसरी बेरोजगारी। आबादी की दृष्टि से विचार करें तो बेरोजगारी की समस्या ज्यादा भयावह नजर आती है। बेरोजगारी को लेकर सरकार भी समय-समय पर चिंता जताती है, लेकिन इसके बाद, वही ढाक के तीन पात। बेरोजगारी जैसे मुद्दे में तल्खी आते ही सरकार में सत्ता की चाशनी के रस में डूबे राजनेता, यह भूल ही जाते हैं कि देश में कोई बेरोजगारी जैसी समस्या भी है। हर चुनाव के समय यह बात दोहराई जाती है कि भारत में बेरोजगारी खत्म कर दी जाएगी और ऐसी नीति बनाई जाएगी और स्वरोजगार को बढ़ाने का दंभ भरा जाता है, लेकिन जब चुनाव हो जाता है और सरकार बन जाती है, उसके बाद फिर तो इस दावे की ही हवा निकल जाती है। बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्या के बारे में भूलकर भी कोई राजनेता बात करना नहीं चाहता, क्योंकि अब तक तो केवल नेताओं द्वारा दावे किए जाते रहे हैं, इस बीमारी की कोई दवा ही ढूंढने की कोशिश नहीं की गई है। इसी का परिणाम है कि देश में आबादी जिस गति से बढ़ रही है, उसी गति से बेरोजगारी भी बढ़ रही है। बेरोजगारी के कारण देश के युवा गलत दिशा में मुड़ रहे हैं, आखिर इसका जिम्मेदार कौन है ? देश की कुर्सी के कर्णधारों को यदि इस समस्या से निजात दिलाने की मंशा होती तो निश्चित ही इस बात का खुले तौर पर विरोध होता कि क्यों भारतीय कंपनियां, अमेरिका में निवेश करे। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अमेरिका, भले ही शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में अपनी छवि बना लिया हो, लेकिन यह भी बात सही है कि 2008 में आई मंदी का असर अमेरिका के आर्थिक ढांचा को तहस-नहस कर दिया है। दो बरस पहले जब पूरी दुनिया में मंदी का दौर चला तो केवल दो ही देश ही गंभीर आर्थिक आफत से दूर रहे, वो थे, भारत और चीन। आर्थिक मंदी के कारण अमेरिका में लाखों युवा रातों-रात सड़क पर आ गए और बेरोजगार हो गए, क्योंकि अमेरिका जैसे देश में काम के लाले पड़ गए। मंदी का थोड़ा भी असर भारत पर नहीं पड़ा, लेकिन भारतीय आर्थिक हालात में जैसा सुधार होना चाहिए, वैसा नहीं हुआ। नतीजा के रूप में देखा जा ही सकता है कि मंदी के बावजूद अमेरिका ने खुद को किस तरह संभाल लिया है और नए रोजगार के अवसर तलासने में जुट गया है, लेकिन भारत में इन परिस्थितियों के नहीं होने के बाद भी कभी किसी को यह सोचने की फुर्सत नहीं रही कि भारत में बढ़ती बेरोजगारी को कैसे रोका जाए ? ना ही उस समय सरकार कोशिश करती नजर आई और न ही अब कोई नीति बनाने के बारे में चिंतन करती दिख रही है। ऊपर से अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सुर के सुर मिलाते हुए अमेरिका में भारतीय कंपनियों द्वारा करोड़ों रूपये का निवेश की जाती है तो यह तो भारत के बेरोजगारों के लिए सरकार की छलावा नीति ही कही जा सकती है। यहां सवाल यही है कि ऐसे हालात में भारत के बेरोजगारों का क्या होगा ?